महाकुंभ: भारत की एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक- नंदकुमार जी और रिन पोचे जी ने साझा किए अपने विचार भारत की सांस्कृतिक विविधता और महाकुंभ की अद्वितीयता
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महाकुंभ: भारत की एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक- नंदकुमार जी और रिन पोचे जी ने साझा किए अपने विचार

कुंभ भारत की एकता और अखंडता से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस भावना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम सभी पर है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Mar 12, 2025, 06:20 pm IST
inउत्तर प्रदेश
श्री नंदकुमार जी और रिन पोचे जी

श्री नंदकुमार जी और रिन पोचे जी

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में महाकुंभ पर आयोजित पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइजर के ‘मंथन’ कार्यक्रम में वैचारिक कुंभ में नंदकुमार जी और रिन पोचे जी ने वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा जी के साथ अपने विचार साझा किए। प्रस्तुत है उनके बातचीत के प्रमुख अंश…

नंदकुमार जी ने कुंभ मेले की ऐतिहासिक निरंतरता पर चर्चा की और यह बताया कि यह एक अविच्छिन्न आध्यात्मिक है, जिसे अलग से नहीं देखा जा सकता। उनका कहना था, “हम एक ऐसी महान घटना का विश्लेषण अलग-थलग नहीं कर सकते जो सदियों से चली आ रही है। यह एक निरंतर प्रवाह है, जो समय के साथ बदलता और विकसित होता रहता है। कोई नहीं जानता कि यह कब शुरू हुआ, लेकिन हम यह जानते हैं कि कुंभ मेला हिंदू और सनातन संस्कृति की एकता का प्रतीक है, जो पूरी दुनिया को प्रभावित करता है।” उन्होंने यह भी बताया कि कैसे कुंभ मेले ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित किया। 1856-57 के कुंभ में हरिद्वार में राष्ट्रवादी एकत्र हुए थे, और नानाजी देशमुख जैसी महत्वपूर्ण हस्तियाँ इसकी भावना से प्रेरित हुईं। इसके बाद, उन्होंने यह भी कहा कि स्वामी विवेकानंद ने 1916 में कुंभ मेले को अपने पहले सामाजिक कार्यक्रम के रूप में इस्तेमाल किया, जहाँ उनकी मुलाकात पूज्य श्रद्धानंद जी से हुई। यहां तक कि कुंभ मेले के दौरान हिंदू महासभा की पहली योजना बैठक में महात्मा गांधी ने भी भाग लिया था।

नंदकुमार जी ने इस बात पर जोर दिया कि, “कुंभ भारत की एकता और अखंडता से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस भावना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम सभी पर है। इस कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए आयोजकों और पाँचजन्य की पहल अत्यंत सराहनीय है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय समाज प्रचार से नहीं, बल्कि विचार से प्रभावित होता है। हिंदू धर्म से जुड़ी सभी परंपराएँ और प्रथाएँ हमारे लिए निरंतर सीखने की प्रक्रिया का काम करती हैं। “एकता – हम सब एक हैं” का विचार लोगों की चेतना में गहराई से समाया हुआ है, और इस एकता को प्रदर्शित करने वाले कार्यक्रमों में भाग लेना स्वाभाविक रूप से आकर्षण का कारण बनता है। उन्होंने जूना अखाड़े के साथ महाकुंभ में प्रज्ञा प्रवाह द्वारा आयोजित युवा कुंभ, विद्युत कुंभ और सेवा विभाग के ज्ञान कुंभ जैसे बौद्धिक सम्मेलनों का उल्लेख किया, जो हिंदू दार्शनिक प्रवचन को बढ़ावा देने में सहायक थे। उन्होंने कहा कि आज आध्यात्मिक और बौद्धिक पुनर्जागरण की अत्यंत आवश्यकता है। विचारशील प्रवचन और वैचारिक संवाद की परंपरा को जीवित और फलता-फूलता रहना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सनातन धर्म का सार जीवित रहे और भविष्य को आकार देने में प्रभावशाली बने।

रिन पोचे जंगचुप चोएडेन, जो अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महासचिव हैं, ने कहा कि भारत अन्य देशों से अलग है। इसके विचारक, परंपराएँ और दर्शन पूरे विश्व में आस्था उत्पन्न करते हैं। भारत ने जो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का विचार दुनिया को दिया है, वह इस भूमि की एक अनोखी विशेषता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में विभिन्न विचारधाराएँ मौजूद हैं, लेकिन वे “व्यावहारिक समानता” के तहत सह-अस्तित्व में हैं। उन्होंने इसे उन देशों से जोड़ा, जहां एक ही विचारधारा का प्रभुत्व है, और भारत की समावेशिता की विशेषता को उजागर किया। रिन पोचे जी ने कहा, “अगर हम अपने देश के नागरिकों के बीच एकता नहीं बढ़ा सकते, तो हम अन्य देशों में भी ऐसा नहीं कर सकते। इसके लिए हमें अपने इतिहास और धरोहर पर गर्व करना चाहिए।”

वैश्विक बौद्ध दृष्टिकोण से रिन पोचे जंगचुप चोएडेन ने भारत को ‘बौद्ध धर्म की मातृभूमि’ कहा, जो एक ऐसी सांस्कृतिक धरोहर है, जिसकी कोई दूसरी तुलना नहीं की जा सकती। उन्होंने सनातन धर्म में मौजूद विविधता पर विचार करते हुए कहा कि शैव और वैष्णव जैसे संप्रदायों में धार्मिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं। यही बात भारत को अद्वितीय बनाती है। कुछ संस्कृतियों के विपरीत, जहां मतभेदों से संघर्ष उत्पन्न होता है, भारतीय परंपराएँ पारस्परिक सम्मान और समझ पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “हम वैचारिक मतभेदों के कारण एक-दूसरे के पीछे हथियार लेकर नहीं भागते, हम विविधता का सम्मान करते हैं और सह-अस्तित्व में विश्वास करते हैं।”

महाकुंभ के आयोजन के विशाल पैमाने पर विचार करते हुए रिन पोचे जी ने कहा, “हम अक्सर पश्चिम को देख कर खुद को पिछड़ा हुआ मानते हैं, लेकिन अगर हम किसी काम में पूरी लगन से जुट जाएं, तो हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं। भारत ने महाकुंभ का आयोजन जिस बड़े पैमाने पर किया, वह अभूतपूर्व है। किसी और देश ने ऐसा कुछ नहीं किया है। अगर भारत यह कर सकता है, तो वह कुछ भी कर सकता है।” उन्होंने यह भी कहा कि मानवता का नेतृत्व आत्मविश्वास पैदा करने से शुरू होता है: “मानवता का नेतृत्व करने के लिए, हमें उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि हम यह कर सकते हैं।” यही एकता का असली मतलब है।

कुंभ मेले में अपने व्यक्तिगत अनुभव को याद करते हुए रिन पोचे जी ने कहा, “कुंभ मेले की मेरी यात्रा अविस्मरणीय थी। यह मेरी दूसरी यात्रा थी। पहली बार मैं दलाई लामा के साथ त्र्यंबकेश्वर गया था और इस बार मैं कुंभ में आयोजित भव्य समागम में भाग लेने आया था। वहां लोगों का एक साथ, पूरी तरह से अनुशासन में और बिना किसी अव्यवस्था के चलते हुए दृश्य बहुत ही मंत्रमुग्ध कर देने वाला था।” उन्होंने कुंभ में मंडला प्रदर्शनों और भिक्षुओं द्वारा किए गए अनुष्ठानों की तुलना दलाई लामा द्वारा आयोजित कालचक्र दीक्षाओं से की और कहा, “कुंभ के बारे में खास बात यह है कि यह किसी भी बौद्ध आध्यात्मिक समागम से एक लाख गुना बड़ा है।” जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, कुंभ की विरासत एक मार्गदर्शक शक्ति के रूप में काम करती है, जो दुनिया को देश की सांस्कृतिक लचीलापन, आध्यात्मिक गहराई और एकता की स्थायी भावना की याद दिलाती है।

Topics: महाकुंभ 2025Mahakumbh 2025बौद्ध धर्ममहाकुंभभारतीय संस्कृति
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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