महाकुंभ 2025 में पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए अनोखे प्रयास!
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पाञ्चजन्य महाकुंभ-2025 मंथन : पर्यावरण और नेत्र स्वास्थ्य के लिए अनोखे प्रयास- गोपाल आर्य और प्रवीण रेड्डी के विचार

अंत में हमने 20,000 पुलिसकर्मियों और 15,000 स्वच्छताकर्मियों, रेलवे कर्मियों को भी 15,000 थालियां, एनडीआरएफ आदि को भी पर्यावरण स्वच्छता के लिए थालियां दी।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Mar 12, 2025, 04:58 pm IST
in भारत, उत्तर प्रदेश, पाञ्चजन्य इवेंट
Panchjanya manthan Gopal arya and Praveen reddy

प्रवीण रेड्डी और गोपाल आर्य जी (बाएं से)

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में महाकुंभ पर आयोजित पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइजर के ‘मंथन’ कार्यक्रम में ‘पावन धाम-अनेक आयाम’ विषय पर गोपाल आर्य और लेफ्टिनेंट कर्नल डॉ प्रवीण रेड्डी ने अपने विचार रखे। पेश हैं उसके अंश-

(गोपाल आर्य) आज के इस विमर्श में कुंभ के साथ पर्यावरण को जोड़ना, जिस प्रकार से देश और परिस्थिति के हिसाब से कई नई परिभाषाएं गढ़ी जाती हैं। मौजूदा परिस्थिति में कुंभ से पर्यावरण के लिए क्या निकल सकता है, इससे मुझे लगता है कि हम उसे पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। पहले कुंभ के मंथन से आध्यात्म, धर्म पर चर्चा होकर समाज के लिए संदेश जाता था। वर्तमान में कुंभ से पर्यावरण के लिए एक नया संदेश निकलकर जाए, उसकी अपेक्षा की जा रही है। महाकुंभ के दौरान छोटा से गिलहरी प्रयास वहां हुआ, जिसकी केस स्टडी मैं बताता हूं।

क्या एक ऐसा छोटा सा प्रयास हो सकता है, जिसमें एक भी पैसा खर्च न हो और जीरो बजट हो? क्या कोई ऐसा छोटा सा प्रयास हो सकता है, जिसने कोई ऑफिस नहीं बनाया हो? क्या कोई ऐसा अभियान हो सकता है कि विश्व का सबसे बड़ा एक थाली और थैले से कुंभ को कचरा मुक्त कर सकता है? क्या एक ऐसा छोटा सा प्रयास हो सकता है कि घर घर से कपड़े के थैले को इकट्ठा करके कुंभ में पॉलीथिन रूपी 8000 टन कचरे को कम कर सकता है। ये छोटा सा प्रयास हुआ है। हमने उसे नहीं किया, लेकिन वो समाज के माध्यम से हुआ। इसकी शुरुआत तीन चरणों से हुई। पहले चरण में हम जन-जन में कुंभ को कैसे ले जा सकते हैं? दूसरे चरण में घर-घर में कुंभ कैसे हो सकता है? और तीसरे चरण में कुंभ में कुंभ कैसे हो सकता है, ऐसे तीन पार्ट में हमने विचार किए।

मैं कुंभ में करीब 25 दिन रहा, उस दौरान मुझे जो अनुभूत हुआ कुंभ अद्भुत, अलौकिक और अकल्पनीय घटना है, जिसकी कल्पना बिना देखे नहीं की जा सकती है। हमारी कल्पना थी कि हम जन जन में कुंभ को कैसे ले जा सकते हैं, मीडिया सोशल मीडिया के माध्यम से इतना किया जा सकता है कि वहां आने वाला श्रद्धालु वहां कचरा न डाले। गंगा मां को प्रदूषित न करे, इसके लिए हमारा प्रयास था। इस जनजागरण से असर ये हुआ कि वहां आने वाले श्रद्धालु इसके लिए जागरूक हुए। दूसरा कुंभ न पहुंच पाने वाली जनता को इससे कनेक्ट करने के लिए इसके लिए हर घर से एक थाली अभियान शुरू किया। हमने सोचा भी नहीं था कि ये इतना बड़ा हो जाएगा।

हमारे अंदर तक हमारे संस्कारों में सनातन धर्म बैठा हुआ है। इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है पूरे देश से 14,17000 स्टील की थालियां वहां इकट्ठा होकर गई थीं। हमारे अभियान के कारण करीब 13,50,000 कपड़े के थैले वहां पहुंचे थे। इन सभी को हमने श्रद्धालुओं को वितरित किया। 14 थालियों को वहां 90 फीसदी अखाड़ों और भंडारों और अन्न क्षेत्रों में हमने बांटा। इसका सकारात्मक असर ये हुआ कि 85 फीसदी डिस्पोजेबल कचरा कम हो गया। पूरे कुंभ के दौरान 29,000 टन डिस्पोजेबल कचरे की कमी आई। अगर इसकी कॉस्ट निकालें तो करीब 140 करोड़ रुपए के दोने पत्तलों की खरीद में कमी आई।

अब ये थाली कई साल तक इसे ले जाने वालों के काम आएगी। इसके आगे कुंभ में कुंभ का परिणाम ये निकला जब हमने थालियां मांगी तो लोगों ने बकायदा उसकी आरती उतारकर भेजा। एक बूढ़ी मां आती है और कहती है कि सात दिन से एक थैला हाथ से सिल रही हूं, उन्होंने इसे देना चाहा। जब उन्हें पता चला कि वो सामान तो कुंभ के लिए रवाना हो गया तो उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता कि कुंभ में जा पाऊंगी कि नहीं, लेकिन कैसे भी करके मेरा ये थैला पहुंचा दो। इस प्रकार की भावना ही कुंभ में कुंभ है। कुंभ में हमने लगभग सवा 10 लाख थालियां बांटी। ये जीरो बजट ऐसे रहा कि हर दानकर्ता ने अपने पैसे से इसे खरीदकर हमें दान किया।

सवाल ये भी है कि थाली की कल्पना कहां से आई तो थाली की कल्पना अयोध्या के राम मंदिर से आई, जब हम वहां एक संत के पास गए थे। उन्होंने बताया कि हमारे पास प्रतिदिन 500 लोग खाते हैं। उन्होंने बताया कि हम स्टील की थाली का इस्तेमाल करते हैं, जिससे प्रदूषण कम हुआ और पैसा बचा। वहीं से ये आइडिया आया। इसी तरह से किसी अखाड़े में हम गए थे, जहां थाली को लेकर बहस हुई। उसके बाद महाराज जी ने पूछा कि आप आए कहां से हो, जब हमारे स्वयंसेवक ने बताया कि हम तो आरएसएस से हैं तो उन्होंने कहा कि आरएसएस वाली है एक थाली के लिए मुझसे बहस कर सकता है। मतलब ये कि जब समाज का मानस परिवर्तन होता है तो व्यवहार परपिवर्तन हो जाता है।

परिणाम ये निकला कि धर्म के द्वारा भी समाज में व्यवहार की प्रतिष्ठा हो सकती है। हमने देखा है कि लगभग 10-15 जगह खुद ही बर्तन बैंक चालू हो गए हैं। गोपाल आर्य बताते हैं के मेला शुरू होने से पहले जब हम मेला अधिकारी से मिलने गए तो उन्होंने बताया कि 40,000 टन कचरा निकलेगा। मैंने कहा कि अगर कचरा हो ही नहीं तो। इस पर काफी बहस के बाद वो तैयार हो गए। अंत में हमने 20,000 पुलिसकर्मियों और 15,000 स्वच्छताकर्मियों को थाली दी। रेलवे कर्मियों को भी 15,000 थालियां, एनडीआरएफ आदि। हम थैला और थाली वाले के नाम से फेमस हो गए थे। बात थैला और थाली की नहीं है, बल्कि इसके जरिए समाज में जाने वाला वो संदेश है कि एक छोटे से प्रयास से समाज स्वच्छ हरित और पवित्र हो सकता है।

(प्रवीण रेड्डी) महाकुंभ के आयोजन में नेत्र कुंभ का आयोजन हुआ। ये तीसरा अनुभव है। 2019 में भी ऐसा आयोजन हुआ था। 2021 हरिद्वार कुंभ में भी हुआ। महाकुंभ सनातन धर्म का परिचय है, वैसे ही स्वास्थ्य की दृष्टि में हमारे देश में स्वास्थ्य, शिक्षा और न्याय पर कभी व्यापार नहीं होता था। धीरे-धीरे बदलती हुई दुनिया में व्यापार की दृष्टि या उपभोक्तावाद आ गया है। चारधाम यात्रा में 2012 के पहले की बात करूं तो कई श्रद्धालुओं को अपनी जान गंवानी पड़ती थी। इसी पर चिंतन करके कुछ डॉक्टरों ने एक छोटी सी स्वास्थ्य शिविर शुरू किया। इसमें स्वामी विवेकानंद हेल्थ मिशन सोसायटी नाम दिया गया। वर्तमान में 14 हॉस्पिटल इस संस्था का संचालन करती हैं। पहले चारधाम की यात्रा में ढाई से तीन हजार लोग अपनी जान गंवाते थे, लेकिन ये अभी शून्य हो गई है। ये यात्रा चैत्र से शुरू होकर दीपावली तक चलती है। ये संस्था साढ़े तीन से चार लाख श्रद्धालुओं की सेवा करती है।

देश भर से डॉक्टर इसमें अपनी सेवाएं देते हैं। इसी को आगे बढ़ाते हुए कुछ डॉक्टरों ने 2019 कुंभ के दौरान सोचा था कि इसमें हम क्या कर सकते हैं। इसी के तहत 2019 में 52 ने ढाई से तीन लाख श्रद्धालुओं की आंखों की जांच करके करीब डेढ़ लाख को चश्मा वितरित किया गया। कई लोग सवाल करते थे कि कुंभ में चश्मा पहनने कौन आएगा। लेकिन, कुंभ में हमने दो लाख से अधिक लोगों की जांच की और उन्हें चश्मा दिया।

2025 महाकुंभ हमने नेत्र कुंभ के जरिए लोगों की आंखों की उच्चकोटि की जांच की और उन्हें समय पर चश्मा प्रदान किया। करीब 80 फीसदी आंखों की जो बीमारियां है, वो मोतियाबिंद जैसी हैं, जिनका उपचार किया जा सकता है। पीएम स्वास्थ्य योजना में भी आजकल 2000 रुपए में एक सर्जरी हो जाती है। नेत्र कुंभ में 2,40,000 के आसपास लोगों की आंखों की जांच की गई। इसमें 53 संगठन शामिल हुए।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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