दुर्दम्य महारथी आजाद का स्व के लिए महासमर और रूह कंपाती दर्दनाक गाथा"
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होम भारत आजादी का अमृत महोत्सव

दुर्दम्य महारथी आजाद का स्व के लिए महासमर और रूह कंपाती दर्दनाक गाथा”

महारथी चंद्रशेखर आज़ाद के बलिदान दिवस - 27 फरवरी पर यह लेख महारथी चंद्रशेखर आजाद का अपनी माँ जगरानी देवी से आत्मिक और मार्मिक संवाद है। शैली - संवाद शैली

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Feb 27, 2025, 10:13 am IST
inआजादी का अमृत महोत्सव
भारत माता के अमर सपूत चंद्रशेखर आजाद

भारत माता के अमर सपूत चंद्रशेखर आजाद

” भारत की फिजाओं को सदा याद रहूँगा, आज़ाद था, आज़ाद हूँ, आजाद रहूँगा। “

“मैं आजाद हूँ”। देश भी आजाद हो गया है, आज मेरा बलिदान दिवस है मेरी माँ जगरानी देवी को मुझ पर गर्व है परंतु कभी-कभी नाराज हो जाती हैं,कहतीं हैं” चंदू तू नहीं आया..मैंने भी अपनी दो उंगली बाँध कर कसम खाई थी, कि जब तक तू नहीं आयेगा.. मैं दोनों उंगली बांधे रखूंगी।” मुझे खबर लगी है कि “27 फरवरी सन् 1931 को इलाहाबाद में अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेज ए. एस. पी. नाट बावर के साथ लगभग 75 सिपाहियों से 1 घंटे के भयंकर युद्ध में 15 को गोली मारी है और तूने स्वयं वीरगति पायी है..चंदू तू अब कभी नहीं आएगा..पर मैं भी अपनी बंधी उंगलियाँ कभी नहीं खोलूंगी ” इसलिए मृत्युपर्यन्त जगरानी देवी ने अपनी 2 ऊंगली बाँधे रखीं थीं..यह प्रामाणिक सत्य चंद्रशेखर आजाद के साथी सदाशिव के अनुसार उद्धृत किया है।

….माँ!!!…मैं कैंसे आता? 16 वर्ष की उम्र में ही मैं आजाद हो गया था..मैंने न्यायालय में बताया था कि मेरा नाम – आजाद है.. पिता का नाम- स्वतंत्रता.. पता- कारावास है। फिर याद करो माँ बचपन में एक दिन तुमने ही तो कहा था कि मातृभूमि “बड़ी माँ” है!..
माँ इधर पंडित जी (रामप्रसाद बिस्मिल) की बातें अच्छी लगती हैं,वो कहते हैं “हम अमन चाहते हैं..जुल्म के खिलाफ अगर फैसला जंग से होगा, जंग ही सही”।

माँ ! मैंने एच. आर. ए. संस्था में प्रवेश ले लिया है, माँ देश में हम लोग स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हैं और बाकी एक दल विशेष के लोग अंग्रेजों का समर्थन कर सत्ता का उपभोग कर रहे हैं, सत्ता में अधिक भागीदारी हो इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन छेड़ने का नाटक करते हैं और अहिंसा की आड़ में आंदोलन वापस लेकर राष्ट्रवाद से खिलवाड़ करते हैं।

एक दल विशेष के समर्थन से गांधी जी अहिंसा की बात करते हैं परंतु वहीं दूसरी ओर प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए भारतीय सैनिकों को भेजने का आव्हान करते हैं,हिंसा में साथ देते हैं। ये दोहरे मापदंड हैं।
ताकि अंग्रेज अपनी सत्ता उन्हीं को सौंपकर जायें.. इसलिए डोमिनियन स्टेट्स की मांग करते हैं..और हम सभी क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के साथ मिलकर आतंकवादी कहते हैं..।

माँ, असहयोग आंदोलन के असफल होने के बाद.. अब स्वाधीनता संग्राम की बागडोर हमारे हाथ में है, हमारी प्रजातांत्रिक समाजवादी विचारधारा है।

माँ, स्वतंत्रता संग्राम के लिए शस्त्रों की जरूरत है इसलिए “काकोरी यज्ञ” आवश्यक था और सफल भी हुआ,परंतु चूक और अपने ही लोगों की मुखबिरी के कारण पंडित जी (रामप्रसाद बिस्मिल) और साथियों को फांसी हो गयी है.।
अब तो माँ मिलना और भी नहीं हो पाएगा.. पंडित जी (रामप्रसाद बिस्मिल) के न रहने पर अब सारा बोझ मुझ पर आ गया है..

भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के आने से संगठन और मजबूत हो गया है.. पूरे देश में 30 हजार का संगठन है.. और मुझे 8 राउंड के अमेरिकन पिस्तौल -कोल्ट आटोमेटिक केलिवर 32, रिमलैस एण्ड स्मोकलेस पिस्टल मिली है और 2 मैग्जीन..मैंने अपने साथियों से कह दिया है कि मैं गिरफ्तार होकर बंदरिया जैसे नाच नहीं नाचूंगा.. 16 गोलियों में से 15 दुश्मन पर चलाऊंगा और सोलहवीं अपने ऊपर..आजाद हूँ.. आजाद रहूँगा।

सब कुछ ठीक ही चल रहा था माँ! पर दुर्भाग्यवश अंग्रेजों ने साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय की हत्या कर दी..माँ हम लोगों ने इसे राष्ट्रीय अपमान और निहत्थे बेकसूर पिता की हत्या माना.. इसलिए सोण्डर्स का वध कर दिया.. क्या यह गलत था? यदि नहीं तो फिर हमारे ही देश के महान नेताओं ने हमारा ही विरोध किया और अंग्रेजों का समर्थन किया..

यह हम लोगों के लिए बहुत दुखद रहा.. इधर सभी को अपनी बात सुनाने के लिए! सही बात समझाने के लिए! असेम्बली में बम फेंका गया है..सभी प्रमुख साथियों की गिरफ्तारियां हो गयीं हैं ताकि इंकलाब आ सके, परंतु मैं हमेशा इन सभी को समझाता था कि गिरफ्तार नहीं होना! अंग्रेजों और अपनों से भी न्याय न मिलेगा!.. माँ वही हुआ है भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई है..

मेरी माँ मैं सभी नेताओं के पास गया कि निर्दोषों को सजा से बचायें… पर किसी नहीं सुनी.. माँ आज इलाहाबाद में भी एक वरिष्ठ नेता पं जवाहर लाल नेहरु के पास आया हूँ कि फाँसी से माफी मिल जाये.. मेरे पास 22 रुपये हैं मुझे 1200 रुपये चाहिए हैं ताकि मैं रुस चला जाऊँ और स्वतंत्रता संग्राम की नई रुपरेखा बनाऊं.. पर सब व्यर्थ रहा..

27 फरवरी सन् 1931, मैं थोड़ा असावधान हो गया और भावुक इसलिए अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव के साथ बैठा था मुझे नहीं मालूम था कि मुखबिरी हो गयी.. नाट बावर ने 75 पुलिसवालों के साथ अल्फ्रेड पार्क का घेरा डाल दिया.. कुछ बख्तरबंद गाड़ियों की आवाज सुनाई दीं.. मैं समझ गया कि अब आखिरी जंग का दिन आ गया.. उसने मुझे आत्म समर्पण करने को कहा मैंने जवाब में फायर खोल दिया.. वो मुझसे बहुत दहशत में थे..

मैं अकेला 1 घंटे लड़ा और 15 को गोली मारी जिसमें 3 अंग्रेज मारे गए और सोलहवीं गोली स्वयं ग्रहण कर वीरगति को प्राप्त हुआ” वो इतनी दहशत में थे कि मेरे मरने 10 मिनट बाद भी मृत शरीर पर कई गोलियां मारी उसके बाद ही मेरी लाश के पास आ सके!.. इसलिए मैं तुझसे न मिलने आ सका माँ.. अलविदा! अलविदा!.. नाराज मत हुआ करना माँ!,माँ! मेरे मरने के बाद मेरे मित्रों ने एक चित्र बनवाया है वो तो मुझे देवता मानते थे.. पर आप लोग क्या मानते हैं?

माँ एक बात का दुख सदैव रहेगा! मेरे जाने के बाद तू बहुत निर्धनता में रही, किसी ने नहीं पूँछा.. तूने लकड़ी बेचकर गुजारा किया इतना ही नहीं माँ तुझे डकैत की माँ कहा गया!! और मेरा सिपाही सदाशिव ने तेरा ख्याल रखा! पर मैं तेरे लिए कुछ न कर सका.. लिखते लिखते मन भारी और भावुक हो गया है,और लेखनी भी बोझिल हो रही है, इसलिए अब नहीं लिखा जाता!!!

परंतु अब समय आ गया है कि महा महारथी श्रीयुत चंद्रशेखर आजाद और उनकी माँ के साथ न्याय हो, इतिहास में समुचित स्थान मिले और इन पर कालिख पोतने वाले एक दल विशेष के समर्थक सत्ता के भूखे राजनीतिज्ञों और परजीवी तथा वामी इतिहासकारों को उनके गुनाहों का उचित दंड मिले। एतदर्थ ही स्वाधीनता के अमृत काल पर विरुपित इतिहास का पुनर्लेखन हो रहा है। महा महारथी श्रीयुत चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस पर शत् शत् नमन है.!

 

Topics: Chandrashekhar Azadचंद्रशेखर आजादपाञ्चजन्य विशेषpainful sagaचंद्रशेखर आजाद बलिदान दिवसचंद्रशेखर आजाद की मांमां जगरानी देवी
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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