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मित्रता को मिली नई ‘ऊर्जा’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12-15 फरवरी तक फ्रांस और अमेरिका के दौरे पर रहे। इस दौरान उन्होंने नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर कई समझौते किए। इससे भारत के ऊर्जा क्षेत्र को गति मिलने की पूरी संभावना

Written byललित मोहन बंसलललित मोहन बंसल
Feb 26, 2025, 07:11 pm IST
in विश्व
अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पेरिस और वाशिंगटन दौरे के बाद एक आस बंधी है कि भारत में अनवरत विद्युत और गैस आपूर्ति से आर्थिक विकास दर में वृद्धि होगी। एक वक्त था जब एक उद्यमी अपने कल-कारखाने में उत्पादन कार्य से पहले अनवरत विद्युत आपूर्ति के लिए भागदौड़ में जुटा रहता था। आज एक ओर जलवायु परिवर्तन के कारण कार्बन-रहित विद्युत उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है, वहीं आणविक विद्युत आपूर्ति के लिए बड़े संयंत्र की जगह छोटे-छोटे आणविक संयंत्रों की मांग बढ़ रही है।

ललित मोहन बंसल
अमेरिका से

मोदी ने अपने दौरे के पहले पड़ाव में पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति एमेन्युअल मैक्रां से द्विपक्षीय वार्ता में नवीकरणीय ऊर्जा के अंतर्गत छोटे-छोटे आणविक संयंत्रों की आपूर्ति पर अहम समझौता कर कार्बन-रहित संस्कृति को गति दी है। इससे निस्संदेह मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ मंत्र को नई दिशा मिलेगी, वहीं देश के विभिन्न राज्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) के लिए ढांचागत सुविधाएं बढ़ाई जा सकेंगी। ए.आई. के लिए चौबीस घंटे अनवरत विद्युत आपूर्ति की जरूरत होगी, जो डाटा सेंटर और विशाल कंप्यूटर सेंटर को सजीव रख सके। भारत के आर्थिक विकास में ऊर्जा के क्षेत्र में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति एक प्राथमिकता है।

भारत में आने वाले दिनों में ऊर्जा, विशेषकर कच्चे तेल की मांग चीन से ज्यादा होगी। ‘इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी’ की मानें तो नि:संदेह तीन साल में भारत के कारोबार में वृद्धि होने से परिवहन और उद्योग में कच्चे तेल की मांग बढ़ेगी, एक तेजी से खड़ी होने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए परिष्कृत ऊर्जा और और विद्युत ऊर्जा की जरूरत होगी। पेरिस स्थित इस एजेंसी के अनुसार भारत को मौजूदा 15.380 करोड़ बैरल से बढ़ कर 2030 में 16.640 करोड़ बैरल तेल प्रतिदिन की जरूरत होगी। मोदी ने वार्ता के दौरान अगले पांच साल में विकसित भारत-2047 तक दोगुने व्यापार बढ़ने की आशा जताई है। बता दें कि मोदी और ट्रम्प वार्ता में व्यापार संधि में भारत ने अब अमेरिका से कच्चा तेल खरीदने पर सहमति जताई है। भारत अमेरिका से कितना तेल और गैस खरीदेगा, इस पर विचार जारी है। दुनिया में कच्चे तेल के आयात में चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरा बड़ा आयातक देश है।

मोदी-ट्रम्प वार्ता में ऊर्जा

कच्चे तेल पर आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए अमेरिका से होकर क्षितिज पर पहुंचना होगा। दुनिया में तेल के आयात में भारत तीसरा (10.1 प्रतिशत) बड़ा देश है। भारत 2023-24 में 88 प्रतिशत तेल के आयात पर निर्भर रहा। 2023-24 में कच्चे तेल का बिल 139.3 अरब डॉलर था, जिसे भारत के कुल आयात मूल्य 678 डॉलर का 21 प्रतिशत कहा जा सकता है। इसमें तेल आधारित उत्पाद नहीं है। भारत खुद तेल आधारित उत्पाद शामिल बना कर यूरोपीय देशों को निर्यात करता है और 23.3 अरब डॉलर अर्जित करता है। इसमें एल.पी.जी. 10.5 अरब डॉलर, 22.1 अरब डॉलर का हाई स्पीड डीजल और 11.2 अरब डॉलर मोटर स्पिरिट है।

ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, तो निश्चित तौर पर भारत लाभान्वित होगा। अभी तक तेल की कीमतों को प्रभावित करने में खाड़ी में तेल उत्पादक देशों ‘ओपेक’ के अलावा अन्य देशों में रूस, अमेरिका सहित ऐसे आधा दर्जन देश हैं, जो तेल का उत्पादन करते हैं। भारत में कच्चे तेल का उत्पादन अल्प मात्रा में हो पाता है। इसलिए उसे 88 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। भले ही भारत तेल की कीमतों को प्रभावित करने की स्थिति में न रहा हो, लेकिन वह भू राजनीतिक कारणों से सऊदी अरब, ईरान, इराक और यूनाइटेड अरब अमीरात, वेनेजुएला आदि देशों से कच्चे तेल और गैस आयात करता रहा है। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध से उपजी परिस्थितियों के कारण भारत ने राष्ट्रहित में मौजूदा निर्यातक देशों के कोटे में कटौती कर रूस से अधिकाधिक तेल खरीदना शुरू किया।

रूस और भारत के रणनीतिक रिश्तों के कारण भारत में कच्चा तेल 15 से 20 डॉलर प्रति बैरल के आधार पर आयात किया जाता रहा है। खाड़ी के तेल उत्पादक देशों के अलावा रूस और अमेरिका, दो बड़े देश हैं, जो दस लाख बैरल तेल प्रतिदिन निकालते हैं। हालांकि अमेरिकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका सऊदी अरब जैसे दोस्तों से तेल का आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे तौर पर देश में महंगाई के लिए उत्तरदायी है। भारत ने यूएस से तेल के आयात पर सहमति देकर एक ओर अमेरिका से मित्रता का धर्म निभाया है, वहीं खाड़ी और रूस से आयात के मौजूदा कोटे में कमी कर देश को चुनौतियों के लिए आमंत्रण दिया है।

बता दें कि डोनाल्ड ट्रम्म कच्चे तेल का अधिकाधिक उत्पादन करना चाहते हैं। वे अपने तेल उत्पादकों से कहते हैं, ‘ड्रिल बेबी ड्रिल’ और दूसरी ओर मित्र देशों को उलाहना देते हुए कहते हैं, ‘आओ, हमसे दोस्ती करो और तेल पाओ।’ अमेरिका ने 29023 में 19358 हजार बैरल तेल का प्रतिदिन उत्पादन किया, जो वैश्विक स्तर पर कुल उत्पादन का 20.1 प्रतिशत है। ऐसे समय में जब रूस अपनी जर्जर अर्थव्यवस्था के लिए भारत को सस्ते में तेल देने का प्रलोभन देता है, तो गलत नहीं है।

कार्बन-रहित समाज

फ्रांस में इसी नवीकरणीय ऊर्जा परिकल्पना की दृष्टि से फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रां और भारत के बीच छोटे-छोटे आणविक संयंत्रों के आयात पर जो समझौता हुआ है, उससे देश भर में ए.आई. के नए द्वार खुल सकेंगे। इन आणविक संयंत्रों से ए. आई. ही नहीं, सेमीकंडक्टर चिप निर्माण में अनवरत विद्युत ऊर्जा से प्रौद्योगिकी को बल मिलेगा। बता दें कि नवीकरणीय ऊर्जा आधारित ऊर्जा के लिए उत्तम कोटि के खनिज की जरूरत होती है। इस क्षेत्र में चीन कहीं आगे है।

विद्युत वाहन

जलवायु परिवर्तन से अत्यधिक प्रभावित भारत की कोशिश है कि उसका परिवहन क्षेत्र तेल और गैस पर निर्भर रहने की बजाए विद्युत चालित वाहनों का सहारा ले। इस संदर्भ में मोदी ने अपने दौरे के पहले ही दिन अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क से बातचीत में विद्युत चालित वाहनों के लिए सहयोग मांगा है। मस्क भारत में विद्युत चालित वाहनों की फैक्ट्री लगाते हैं, तो भारत ने उन्हें ‘सिंगल विंडो’ के तहत सभी सुविधाएं देने की बात कही है। परिवहन क्षेत्र को कार्बन-रहित बनाने के लिए भारत में 2023 में 15.3 लाख विद्युत वाहन थे, जो एक साल में बढ़ कर 19.5 लाख हो गए। यह मात्र 7.44 प्रतिशत वृद्धि है। कार्बन-रहित परिवहन के लक्ष्य में बायो-फ्यूल और हाइड्रोजन एक विकल्प है। भारत ने चालू बजट में 2047 तक 100 मेगावाट आणविक विद्युत निर्माण का लक्ष्य रखा है। निश्चित रूप से यह लक्ष्य भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकता है।

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