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माओवाद : कटा कर्नाटक का ‘कांटा’

कर्नाटक ने स्वयं के नक्सलमुक्त होने की उद्घोषणा कर दी है।  इस प्रदेश ने नक्शल हिंसा के अनेक दंश झेले हैं। इसलिए नक्सलमुक्त भारत की दिशा में यह एक बड़ी उपलब्धि 

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 11, 2025, 09:30 am IST
in विश्लेषण, कर्नाटक, छत्तीसगढ़

कर्नाटक में आखिरी बचे दो नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें एक श्रींगेरी के किगा गांव में रहने वाला नक्सल कोथेहुंडा रविंद्र (44) और दूसरा कुंडापुरा का रहने वाला थोंबुटु लक्ष्मी उर्फ लक्ष्मी पूजार्थी (41) थे। एक ने चिकमंगलूर और  दूसरे ने उडुपी जिले में आत्मसमर्पण किया। इसी के साथ  कर्नाटक को नक्सल मुक्त राज्य घोषित कर दिया गया।

बस्तर संभाग के अबूझमाड़ को लेकर यह अवधारणा थी कि यह  नक्सलियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह है। यदि यहां सुरक्षाबल भीतर प्रवेश करेंगे तो उन्हें कड़ा प्रतिरोध झेलना होगा। आरंभिक रणनीतियों की विवेचना करते हुए यह प्रतीत होता था कि नक्सलगढ़ को ध्वस्त करने की आखिरी लड़ाई इन्हीं अबूझ जंगलों में होगी। आहिस्ता-आहिस्ता सुरक्षा बलों के कैंप हर कुछ अवधि में नक्सलियों के क्षेत्र को घेरते हुए आगे बढ़ रहे हैं। बहुत ही आक्रामकता के साथ आपसी संयोजन बनाते हुए सीआरपीएफ, एसटीएफ, बीएसएफ, बस्तर बटालियन, बस्तर फाइटर और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड जैसे विविध सैन्य बल माओवाद की रीढ़ पर ही प्रहार करने के लिए अबूझमाड़ के भीतर बढ़ चले हैं।

मिल रही सफलता

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के माओवाद  की समाप्ति के लिए 31 मार्च, 2026 का समय सीमा निर्धारण करने के साथ ही अबूझमाड में जो बड़ी—बड़ी मुठभेड़ हुर्इं और अप्रतिम सफलताएं मिली हैं, इससे लाल आतंक का मनोबल निश्चित रूप से टूटा है। यही कारण है कि अभी कुछ ही दिवस पूर्व एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए बस्तर संभाग के पुलिस महानिदेशक सुन्दरराज ने कहा था कि छतीसगढ़ राज्य के बस्तर और कोण्डागांव जिले पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो गए हैं। यह उद्घोषणा अनायास नहीं थी। सात जिलों में विभक्त बस्तर संभाग के इन दोनों जिलों के भीतर नक्सल कमेटियां नष्ट हो गई थीं और माओवादी लंबी समय से किसी तरह की उपस्थिति दर्ज कराने में असफल सिद्ध हो रहे थे।

वर्ष 2024 तो लाल आतंक के ताबूत में कील ठोकने जैसा सिद्ध हुआ। इस वर्ष में 217 माओवादी मारे गए। यह सफलता निर्णायक दिशा में बढ़ रही है, इसकी आश्वस्ति इस बात से भी मिलती है कि इस वर्ष के गणतंत्र दिवस पर ऐसे छब्बीस गांवों में तिरंगा फहराया गया जहां कभी नक्सल आतंक के साये में इस राष्ट्रीय दिवस पर सन्नाटा पसर जाता था अथवा काले झंडे फहराए जाते थे।

नक्सलियों का आधार इलाका क्या?

प्रश्न उठता है कि क्या केवल छतीसगढ़ में ही यह लड़ाई चल रही है? अबूझमाड में अवस्थित आधार इलाका यदि लाल आतंकवादियों से खाली करवा लिया गया तो क्या यह नक्सलवाद की समाप्ति की उद्घोषणा होगी? इसे विवेचित करने से पहले हमें  यह समझना होगा कि आधार इलाका किसे कहा जाता है? माओवादियों का आधार इलाका वह भौगोलिक क्षेत्र है, जहां वे संगठित होकर अपनी समानांतर सत्ता स्थापित करने में सफल हो जाते हैं। ये इलाके आमतौर पर दुर्गम जंगलों, पहाड़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं जहां राज्य की उपस्थिति कमजोर होती है। इन आधार क्षेत्रों में माओवादी अपने प्रशिक्षण शिविर, शस्त्र निर्माण और निर्णय लेने की गतिविधियां संचालित करते हैं। इसके साथ साथ ये परिक्षेत्र हथियारों, रसद आपूर्ति और गुरिल्ला युद्ध के लिए रणनीतिक ठिकाने भी होते हैं।

माओवादियों ने देश भर के अनेक क्षेत्रों को आधार इलाका बनाने का प्रयास किया जहां सुरक्षित रह कर वे राज्य का मुकाबला कर सकें।अधिकांशत: वे असफल रहे। ऐसे कुछ क्षेत्र पलामू, लातेहार और गया जैसे झारखंड और बिहार के वनाच्छादित परिक्षेत्र थे। यहां उन्होंने प्रभाव तो बनाया लेकिन आधार क्षेत्र निर्मित नहीं कर सके। उन्होंने पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम और पुरुलिया जैसे क्षेत्रों में भी प्रयास किया लेकिन वहां भी असफलता मिली। ओडिशा के कोरापुट, मल्कानगिरी, कंधमाल आदि क्षेत्रों में भी माओवादी अत्यधिक सक्रिय रहे लेकिन यहां भी वे अपनी सुरक्षित पनाहगाह नहीं तलाश सके।

तेलंगाना-आंध्र के मुलुगु के जंगलों में भी प्रयास हुआ लेकिन सुरक्षा बलों ने उनकी  कमर तोड़ दी। माओवादियों का सबसे बड़ा सपना दण्डकारण्य क्षेत्र को कथित ‘लिब्रेटेड जोन’ बनाने का था जिसके अंतर्गत छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के आपस में जुड़े घने जंगल और दुर्गम पर्वतीय हिस्से आते थे। यहां भी वे असफल रहे हैं। यदि वास्तविकता को रेखांकित किया जाए तो केवल और केवल अबूझमाड के जंगल ही माओवादियों के लिए अब तक सुरक्षित पनाहगाह बने रह सके थे। इसका अर्थ यह है कि वर्तमान में आधार इलाका छीने जाते ही माओवादियों की बंदूक वाली बिग्रेड को पूरी तरह से ध्वस्त किया जा सकता है।

माओवाद की जड़ पर प्रहार

इस प्रसंग की समुचित व्याख्या के लिए इतिहास से एक उदाहरण लेते हैं। चाणक्य और चन्द्रगुप्त की युति जब मगध सम्राट धनानन्द की सत्ता की समाप्ति के लिए उद्यत थी तब उनकी नव-गठित सेना ने सीधे अत्युत्साह में राजधानी पर आक्रमण कर दिया और उसे बहुत अधिक हानि उठानी पड़ी। पराजित गुरु-शिष्य एक वृद्धा के घर भोजन कर रहे थे। अत्यधिक भूख होने के कारण चन्द्रगुप्त गर्म रोटी का मध्यभाग तोड़ कर खाने की चेष्टा में मुंह जला बैठे। वृद्धा ने तब सीख दी कि मध्य भाग आखिरी निवाला होता है।

पहले किनारों को तोड़ कर खाना श्रेयस्कर है। यह चाणक्य के लिए सूत्र-वाक्य बना। इसी को आधार बना कर उन्होंने मगध की सीमाओं को कमजोर किया और शनै: शनै: केंद्र पर भी अपनी पताका फहरा दी। माओवाद से लड़ाई को वर्तमान संदर्भों में कुछ ऐसे ही समझा जा सकता है। यह ठीक है कि हमारे वीर जवान अबूझमाड़ में सीधे ही लोहा ले रहे है लेकिन  माओवादियों की जड़ें बस्तर संभाग के कोन्टा से ले कर नारायणपुर तक काट दी गई हैं।

महत्वपूर्ण गलियारा था कर्नाटक

कर्नाटक माओवादियों के उस लाल गलियारे का महत्वपूर्ण हिस्सा था जो उनके सपने को चीन से आरंभ कर नेपाल के रास्ते से होते हुए श्रीलंका तक जोड़ता था। वह वर्ष 1980 का दशक था जब माओवादियों के कदम भारत के दक्षिणी हिस्सों में मजबूत हो रहे थे। इन परिक्षेत्रों में सुरक्षित पनाहगाह की खोज उन्हें पश्चिमी घाट के  अत्यन्त दुर्गम क्षेत्रों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी। केरल में वामपंथ की पृष्ठभूमि पहले से ही मजबूत थी अत: साथ ही लगे कर्नाटक के जंगल भी तब लाल सलाम के नारों से गूंजने लगे थे।

वर्ष 2000 तक कर्नाटक में माओवाद की सूक्ष्म उपस्थिति थी लेकिन एकाएक राज्य के जंगल लाल-विचार के आतंक से सुलगने लगे। वर्ष 2004-05 के दौरान देश के विविध माओवादी धड़े आपस में जुड़ गए और उन्होंने एकीकृत रूप से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन कर लाल गलियारे की अपनी संकल्पना को साकार करने में भूमिका निभाना आरभ कर दिया। पश्चिमी घाट के चिक्कमगलुरु, उडुपी, दक्षिण कन्नड़, शिमोगा और कोडागु जिलों में इसी दौरान माओवाद के खूनी पंजे मजबूत हुए।

वर्ष 2005 में हेब्री में पुलिस जीप में बमबारी का प्रकरण हो, 2007 में अगुंबे में एक सब-इंस्पेक्टर की हत्या की घटना हो अथवा 2008 में नादपलु में भोज शेट्टी और उनके रिश्तेदार सदाशिव शेट्टी की हत्या की नृशंस घटना, समय-समय पर कर्नाटक को माओवादियों द्वारा दहलाया जाता रहा है। जिन्हें यह गलतफहमी है कि माओवादी जल-जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहें हैं, उनके लिए यह स्पष्टता आवश्यक है  किले पर लाल निशान लगाने की संकल्पना रखने वाले ये हत्यारे केवल और केवल अपने इसी लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध हैं।

वे वनों में सुरक्षित हैं इसीलिए स्वयं को वनवासियों की आवाज बताने का प्रयास करते हैं। उनके ऐसा करने की वृत्ति के कारण एक सामान्य अवधारणा बन गई है कि जनजातीय समूह ने स्वयं के कारकों से क्षुब्ध होेकर हथियार उठा लिए। इस नैरेटिव के ठीक उलट वास्तविकता यह है कि माओवादी उन्हें बंदूक का डर दिखा कर वहां काबिज हैं। भारत के माओवाद प्रभावित वन क्षेत्र दरअसल लाल-विचार के उपनिवेश भर हैं।

माओवादियों के प्रभाव क्षेत्रों का अध्ययन करने पर यह प्रतीत होता है कि पश्चिमी घाट उनके लिए रिजर्व क्षेत्र की तरह था। किसी समय लॉन्ग मार्च (स्थापित आधार क्षेत्र छोड़ कर अन्य स्थान पर जाना) की नौबत आ जाए, अबूझमाड़ से निकलने के लिए बाध्य होना पड़े तब वे इन जंगलों की ओर बढ़ना चाहते थे। राजधानी-सा बन चुका बस्तर का माड़ क्षेत्र, जिस तरह की सुरक्षा बंदूकधारी लाल कैडरों को प्रदान कर रहा था ऐसे में सीमावर्ती राज्यों में केवल उपस्थिति बनाने भर से कार्य चल रहा था।

श्रंगेरी और आसपास के जंगलों (चिक्कमगलुरु), तीर्थहल्ली और निकटस्थ के जंगलों (शिमोगा), मलनाड क्षेत्र के जंगलों (उडुपी) तथा  बेलथंगडी और सुलिया के वन परिक्षेत्रों (दक्षिण कन्नड़) तक माओवाद का प्रसार हो गया था। कर्नाटक राज्य के ये सभी पर्वतीय वनक्षेत्र केरल और गोवा राज्यों की सीमा से लगे हुए हैं। ऐसे ही अंतरराज्यीय परिक्षेत्र माओवादियों के लिए रणनीतिक ठिकाना होते हैं जिससेकि एक राज्य में घटना को अंजाम देने के बाद वे दूसरे राज्य में छिप सकते हैं।

सरकार और सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई, सघन आपरेशन्स और अच्छी नक्सल पुनर्वास योजनाओं के द्वारा कर्नाटक में माओवादी गतिविधियां सीमित होने लगीं। हालांकि  माओवादी इस स्थान को कभी छोड़ना नहीं चाहते थे। चूंकि ऐसा करना विस्तार के उनके दिवास्वप्न के आड़े आता था।  इसके अतिरिक्त 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने प्रबल इच्छाशक्ति प्रदर्शित की और माओवाद के निर्णायक खात्मे के लिए अनेक कदम उठाए। इससे माओवादियों की गतिविधियां बस्तर के उन भूभागों को बचाए रखने तक केंद्रित रह गर्इं जो उनके सबसे सुरक्षित आधार इलाके बन गये थे।

एक सिरे से अबूझमाड़ पर से ही पकड़ छूटती जा रही है तो वे दक्षिण के राज्यों में गतिविधि संचालन के योग्य भी नहीं रहने वाले हैं। जिस दिन अबूझमाड़ माओवादियों के हाथ से गया, उस दिन देश भर से नक्सलवाद भी विदा हो जाएगा। चूंकि बिना सुरक्षित क्षेत्र के हथियारबंद गतिविधियों का संचालन और हथियारों का निर्माण संभव नहीं हैं। यह भी एक कारण है कि केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र-तेलांगाना, महाराष्ट्र और आडिशा जैसे नक्सल प्रभावित राज्य अब राहत की सांस ले रहे हैं।

वर्ष 2016 में यहां सक्रिय समूहों पर दबाव पड़ा, कुछ ने आत्मसमर्पण किया तो एक समूह केरल की ओर चला गया। लगातार नाकामियों के कारण उन्हें उन्हें केरल प्रवेश से भी कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि इससे उलट पश्चिमी घाट के पहाड़ों-जंगलों से नक्सल दबाव कम होने लगा। वर्ष 2023 में कर्नाटक परिक्षेत्र में पुन: सिर उठाने की कोशिश में लगा नक्सली कमांडर विक्रम गौड़ा पुलिस के साथ हुए एनकाउंटर में मारा गया। विक्रम का मारा जाना बहुत बड़ी सफलता थी चूंकि इन क्षेत्रों में उसका प्रभाव और दबदबा था।

वर्ष 2024 में नक्सल संगठन के पश्चिमी घाट जोनल कमेटी के सदस्य अंगाड़ी सुरेश ने आत्मसमर्पण कर दिया। इससे क्षेत्र में माओवादी पूरी तरह हाशिये पर चले गए। पुलिस और प्रशासन ने अंगाड़ी सुरेश का भरपूर लाभ लिया और उससे अन्य नक्सलियों के लिए आत्मसमर्पण करने की अपील भरे पत्र और पर्चे लिखवाए। इन पर्चों का लाभ यह हुआ कि 8 जनवरी, 2025 को महत्वपूर्ण नक्सल नेता वंजाक्षी सहित 5 अन्य नक्सलियों ने बंगलूरू में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

यह समूह कर्नाटक में माओवादी सक्रियता के लिए जिम्मेदार आखिरी दल था। पर अब भी क्षेत्र के केवल दो शेष रहे नक्सली फरार थे। बीते दिनों श्रृंगेरी के किगा गांव में रहने वाले नक्सली कोथेहुंडा रविंद्र और कुंडापुरा गांव के रहने वाले  थोंबुटु लक्ष्मी उर्फ लक्ष्मी पूजार्थी ने समर्पण किया। कर्नाटक अब पूरी तरह नक्सल मुकत हो चला है। कर्नाटक का नक्सलमुक्त होना यह भी आश्वस्त करता है कि आगामी मार्च, 2026 तक यह देश नक्सलियों से पूरी तरह छुटकारा पा लेगा।
(लेखक नक्सल मामलों के जानकार हैं)

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