पाञ्चजन्य संपादकीय : त्रासदी और सबक
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पाञ्चजन्य संपादकीय : त्रासदी और सबक

हर श्रद्धालु की सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है। व्यवस्था कितनी भी मजबूत हो, लेकिन जब तक हम सभी मिलकर इसे सफल बनाने के लिए प्रयास नहीं करेंगे, तब तक यह आयोजन पूर्ण नहीं होगा। महाकुंभ एकता, समर्पण और संयम की पराकाष्ठा है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jan 31, 2025, 11:08 am IST
inसम्पादकीय, उत्तर प्रदेश

आंखें भीगी हुई हैं, हृदय में एक गहरी कचोट है। एक ओर कुंभ की दिव्यता का अनुभव कराते भावपूर्ण दृश्य की उत्ताल लहरें हैं, तो दूसरी ओर भगदड़ के बाद के दृश्य…। परिजनों की चीखें और घायलों की कराहें। इसे और क्या कहें-श्रद्धा का महासागर और अनहोनी की छाया।

हितेश शंकर

कुंभ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। सदियों से इस आयोजन ने करोड़ों श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ने का कार्य किया है, जहां वे गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान कर मोक्ष की कामना करते हैं। इस बार प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में अब तक लगभग 26 करोड़ श्रद्धालु स्नान कर चुके हैं।

मौनी अमावस्या पर जब एक ही दिन में 8 करोड़ से अधिक लोगों ने डुबकी लगाई, तो यह इतिहास का सबसे बड़ा धार्मिक समागम बन गया। लेकिन जब इस महासमागम पर भगदड़ की छाया पड़ी, तो श्रद्धा की ऊर्जा क्षण भर के लिए भय में बदल गई। अफरा-तफरी के कारण कई लोग हताहत हुए। यह त्रासदी हम सभी को यह सोचने पर मजबूर करती है कि संवेदनशील व्यवस्था और अपार संसाधनों को जुटाने के बाद भी क्या हम ऐसे विशालतम आयोजनों के लिए शासकीय, सामाजिक और व्यक्तिगत, तीनों स्तर पर पूरी तरह तैयार हैं?

भगदड़ एक ऐसी अवस्था है, जो इन तीनों ही स्तरों पर एकाएक ऐसी स्थिति का निर्माण करती है कि क्षणभर में सारी व्यवस्थाएं टूट जाती हैं। सरकार के इंतजाम, सामाजिक संरचनाओं के व्यवस्था से जुड़ते तन्तु और व्यक्ति का धैर्य… थोड़ी देर के लिए सब ढह जाता है। शोर और भीड़ का सैलाब जब थमता है तो पीछे गहरे घाव छोड़ जाता है, जिसे फिर से भरने का काम शासन, समाज और प्रभावित परिवारों को ही मिलकर करना होता है। यह अत्यंत कष्टप्रद और कठिन कार्य है।

महाकुंभ की विशालता को देखते हुए प्रशासन ने सात स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की थी। 44 स्नान घाटों का निर्माण किया गया। श्रद्धालुओं को 11 भाषाओं में डिजिटल सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। पूरे मेला क्षेत्र में इंटरनेट की बेहतर उपलब्धता के लिए विशेष टॉवर लगाए गए हैं। सफाई व्यवस्था के तहत 1.5 लाख अस्थायी शौचालय, 25,000 कचरा पात्र, 200 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन और 10 स्थायी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के साथ ही बड़ी संख्या में सफाईकर्मी तैनात किए गए हैं। इन सभी प्रयासों के बावजूद, जब करोड़ों लोगों की भीड़ एक साथ उमड़ती है, तो प्रशासनिक तैयारियां भी असफल हो सकती हैं। ऐसे आयोजनों में न केवल सुरक्षा बलों की तत्परता महत्वपूर्ण होती है, बल्कि श्रद्धालुओं का अनुशासन और संयम भी उतना ही आवश्यक है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कुंभ जैसे आयोजनों में भगदड़ का सबसे बड़ा कारण भीड़ की अचानक से बढ़ती गति, अफवाहें और धैर्य की कमी होती है। लोग संगम तट पर पहले स्नान करने की जल्दबाजी में धक्का-मुक्की करने लगते हैं। ऐसे में एक छोटी-सी चूक या गलत सूचना भय का कारण बन सकती है। इसलिए, क्या किया जा सकता है?

भीड़ के स्मार्ट प्रबंधन के लिए रियल-टाइम डेटा ट्रैकिंग के अतिरिक्त प्रयासों के साथ भीड़ और अफवाह नियंत्रण प्रणाली की दिशा में और अधिक तकनीकी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। अलग-अलग प्रदेशों और दिशाओं से आने वाले बड़े यात्री वाहनों को विभिन्न घाटों और दिशाओं की ओर पूर्वनिर्धारित गंतव्य तक निर्देशित करने और निकालने की व्यवस्था पर अधिक काम करने की आवश्यकता है। लोगों को अलग-अलग स्नान घाटों की ओर भेजने की बेहतर व्यवस्था होनी चाहिए।

रही बात वीआईपी व्यवस्था की, तो किसी भी सामाजिक व्यवस्था में यह एक अपेक्षा रहती ही है। दुनिया की कोई भी व्यवस्था या आस्था स्थल इससे अछूता नहीं है। मगर उसे कितना सीमित और व्यवस्थित किया जा सकता है, इस पर विचार करना आवश्यक है। साथ ही, ड्रोन कैमरों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित भीड़ प्रबंधन प्रणाली से निगरानी विभिन्न स्तरों पर बढ़ानी चाहिए ताकि स्थितियों का उनके अनियंत्रित होने से पूर्व ही आभास के आधार पर आकलन और निर्देशन किया जा सके।

आॅडियो-विजुअल (श्रव्य-दृश्य) दिशानिर्देश के माध्यम से श्रद्धालुओं को लगातार अपडेट मिलते रहें ताकि लोग घबराहट, बेचैनी और अफरा-तफरी से बच सकें। इसके अतिरिक्त, सामूहिक अनुशासन और जागरूकता भी आवश्यक है। श्रद्धालुओं को धैर्य और अनुशासन का पालन करने के लिए प्रेरित किया जाए। स्नान के लिए प्रत्येक घाट का समान रूप से उपयोग किया जाए, जिससे मुख्य स्नान घाटों पर अनावश्यक भीड़ न हो।

महाकुंभ केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता और एकता की परीक्षा भी है। इस त्रासदी के बाद देशभर के संत समाज ने श्रद्धालुओं से धैर्य बनाए रखने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की। धैर्य और संयम भी आध्यात्मिकता का एक रूप है। संगम के अलावा अन्य स्नान घाटों पर स्नान करने को प्राथमिकता देना, किसी भी अफवाह या भ्रम में न आना और भीड़ का हिस्सा बनने से बचना भी आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इस घटना की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक जांच आयोग गठित किया है, जो भगदड़ के कारणों और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों पर अपनी रिपोर्ट देगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है, ‘‘इस घटना से हमें सीख लेने की जरूरत है। पूरी सतर्कता के बावजूद ऐसे हादसे होते रहे हैं। हमने इनकी तह तक जाने का निर्णय लिया है। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में ऐसी कोई भी घटना न हो।’’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी घटना पर गहरी संवेदना व्यक्त की और प्रशासन से संवेदनशीलता के साथ राहत और बचाव कार्य करने को कहा।

कुंभ केवल एक प्रशासनिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव है। श्रद्धालुओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अनुशासन बनाए रखें, अफवाहों से बचें और भीड़ नियंत्रण में सहयोग करें। समाज का भी दायित्व है कि वह कुभ जैसे आयोजनों में एक-दूसरे की सहायता करे और दूसरों के लिए भी सुरक्षित माहौल बनाए।

महाकुंभ आस्था और अध्यात्म का संगम है, जहां भक्ति, अनुशासन और शांति का भाव सर्वोपरि होता है। हमें इस आयोजन को सिर्फ एक त्रासदी के रूप में नहीं, बल्कि एक सीख के रूप में लेना होगा।
हर श्रद्धालु की सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है। व्यवस्था कितनी भी मजबूत हो, लेकिन जब तक हम सभी मिलकर इसे सफल बनाने के लिए प्रयास नहीं करेंगे, तब तक यह आयोजन पूर्ण नहीं होगा। महाकुंभ एकता, समर्पण और संयम की पराकाष्ठा है। हम संयमित रहते हुए, समर्पण भाव के साथ इसे सफल बनाएंगे, यही हम सबका संकल्प होना चाहिए।
@hiteshshankar

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