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समग्रता की दृष्टि, समानता की शक्ति

भारतीय संविधान की हीरक जयंती और पाञ्चजन्य की स्थापना के 77 वर्ष पूरा होने का यह पड़ाव ऐसा है, जब हमने इस संविधान की प्रेरक शक्ति और उभरते भारत के आठ महत्वपूर्ण आयामों को समझने-खंगालने का प्रयत्न किया।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Jan 4, 2025, 08:12 am IST
inभारत, सम्पादकीय

जब भारत ने 15 अगस्त, 1947 को औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की, तो यह न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता थी, अपितु एक महान भी उत्तरदायित्व था। एक ऐसा राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी, जो विविधताओं में एकता का प्रतीक हो। इसी स्वप्न को साकार करने के लिए नीति निमार्ताओं ने भारतीय संविधान की रचना की, जो 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। भारत के हर नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता और समानता का भरोसा दिलाता यह संविधान नीति निर्धारकों को ‘सबको साथ लेकर’ विविध आयामों पर समग्रता में विचार करते हुए आगे बढ़ने का आह्वान करता है।

75 वर्ष में संविधान न केवल विधिक निर्देशों का संकलन रहा, बल्कि संविधान निमार्ताओं की आकांक्षाओं व भविष्य के नेताओं से उनकी अपेक्षाओं को रेखांकित करते हुए भारत के समग्र विकास का आधार भी बना। इसके आदर्शों ने एक ऐसे भारत को जीवंत रखा, जो प्राचीन व सांस्कृतिक रूप समृद्ध और अपनी आकांक्षाओं में ‘जड़ों से जुड़े रहते हुए’ आधुनिक है।

भारतीय संविधान की हीरक जयंती ओर पाञ्चजन्य की स्थापना के 77 वर्ष पूरा होने का यह पड़ाव ऐसा है, जब हमने इस संविधान की प्रेरक शक्ति व उभरते भारत के आठ महत्वपूर्ण आयामों को समझने-खंगालने का प्रयत्न किया।

यदि इन अष्टायामों को अष्टदल कमल के रूप में देखें तो इसकी पहली पंखुड़ी है संविधान और स्थिरता, जो शासन व्यवस्था का आधार बनी। भारतीय संविधान अपने पहले दिन से ही हर भारतीय के लिए एक मार्गदर्शक रहा है। यह केवल अधिकारों की बात नहीं करता, बल्कि कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। इसकी समग्रता ने भारत को विविधताओं में एकता का आदर्श उदाहरण बनाया है। यह संविधान ही है, जिसने भारत को एक लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है।

इसी से पोषित और अनन्य रूप से जुड़ा दूसरा आयाम है भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली, जिसके माध्यम से समाज के दुर्बलतम व्यक्ति के स्वर और मत को सम्मान मिला। 1948 में चुनाव आयोग की स्थापना के साथ भारत ने लोकतंत्र की यात्रा शुरू की। 1951-52 में हुए पहले आम चुनावों में 17 करोड़ से अधिक भारतीयों ने भाग लिया। यह उस समय असंभव सी लगने वाली उपलब्धि थी। आज भारत का चुनाव आयोग दुनिया भर में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया का प्रतीक है। हाल के दशकों में ईवीएम और वीवीपैट जैसी तकनीकों ने इस प्रक्रिया को और मजबूत बनाया है। भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यहां हर नागरिक की आवाज सुनी जाती है।

भारत की आत्मनिर्भरता को ऊंचाई और विश्वास देने वाला तीसरा कारक है-इस देश का परमाणु शक्ति से सम्पन्न होना। जब 1948 में होमी भाभा के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना हुई, तो शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह भारत को वैश्विक मंच पर वैज्ञानिक व सामरिक शक्ति का प्रतीक बनाएगा। पोखरण में 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत अपनी सुरक्षा और विकास, दोनों के लिए प्रतिबद्ध है। आज भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम न केवल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि देश की तकनीकी क्षमता का भी प्रतीक है।

भविष्य के भारत का निर्माण करने वाला एक और नींव का पत्थर है-तकनीकी शिक्षा। 1948 में आईआईटी की परिकल्पना की गई व 1951 में पहला आईआईटी खड़गपुर में शुरू हुआ। इन संस्थानों ने हजारों युवाओं को तकनीकी शिक्षा ही नहीं दी, उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान भी दिलाई। पिछले एक दशक (2014-2024) में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं। आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों का विस्तार, डिजिटल शिक्षा का प्रसार और नवाचार को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने भारत को तकनीकी महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर किया है। पहले की तुलना में संस्थानों की संख्या, गुणवत्ता व पहुंच में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। नए आईआईटी, एनआईटी व इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे ‘स्वयं’ व ‘राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी’ ने तकनीकी शिक्षा को सुलभ बनाया है। ‘अटल इनोवेशन मिशन’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों ने नवाचार और उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया।

पेटेंट व शोध पत्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह दशक तकनीकी शिक्षा को सशक्त बनाकर भारत को आत्मनिर्भर और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने में मील का पत्थर साबित हुआ है। यह यात्रा न केवल लाखों युवाओं के भविष्य को उज्जवल बना रही है, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी राष्ट्र के रूप में स्थापित कर रही है। आज भारत तकनीकी नवाचार व स्टार्टअप्स के क्षेत्र में अग्रणी है। ‘डिजिटल इंडिया’ व ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों ने इन प्रयासों को और गति दी है।

अब बात एक सर्वप्रमुख, किंतु अपेक्षाकृत अचर्चित आयाम यानी स्वास्थ्य की। स्वतंत्रता के बाद भारत ने मलेरिया, चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों से लड़ाई शुरू की।1948 में आईसीएमआर के पुनर्गठन ने चिकित्सा अनुसंधान को दिशा दी। आज भारत संवेदनशील, निर्णायक फैसलों के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति का साक्षी है। ‘आयुष्मान भारत योजना’ ने 50 करोड़ से अधिक लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने मातृ-शिशु मृत्यु दर में सुधार किया है।

कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने अपने टीकाकरण अभियान और वैक्सीन निर्माण से वैश्विक नेतृत्व की क्षमता दिखाई है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और डिजिटल स्वास्थ्य मिशन ने स्वास्थ्य सेवाओं को तकनीकी रूप से सशक्त बनाया है। पिछला दशक भारत को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता और नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का माध्यम सिद्ध करने की दृष्टि से निर्णायक रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने अपने वैक्सीन कार्यक्रम से दुनिया को एक नई उम्मीद दी। ‘आयुष्मान भारत’ जैसी केंद्रीय योजनाओं ने यह सुनिश्चित किया कि हर भारतीय को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं मिलें।

स्वास्थ्य जैसा ही महत्वपूर्ण है-आर्थिक स्वास्थ्य। 1948 में औद्योगिक वित्त निगम (आईएफसीआई) की स्थापना ने भारत के उद्योगों को वित्तीय सहायता दी। हाल के वर्षों में स्टार्टअप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने नए उद्यमों को बढ़ावा दिया। इन योजनाओं ने 90,000 से अधिक स्टार्टअप्स को पंजीकृत किया, जिससे लाखों रोजगार उत्पन्न हुए। जीएसटी लागू होने से कर प्रणाली सरल और एकीकृत हुई। ‘जन धन योजना’ के तहत 50 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए, जिससे वित्तीय समावेशन बढ़ा। उत्पादन-संबंधित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना ने विनिर्माण क्षेत्र को सशक्त किया। भारत ने दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल किया। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं। बीता दशक भारत को आत्मनिर्भर भारत की दिशा में तेजी से अग्रसर करने में महत्वपूर्ण रहा। छोटे और मध्यम उद्योगों के प्रोत्साहन ने न केवल रोजगार सृजित किए, बल्कि भारत को एक मजबूत आर्थिक ताकत भी बनाया।

अष्टायाम का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम है संवाद। इसका संचार और प्रसारण 1948 में आकाशवाणी के पुनर्गठन ने भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को एक मंच दिया। आज डिजिटल युग में सूचना और प्रसारण ने देश के हर कोने को जोड़ने का काम किया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन ने न केवल शिक्षा और मनोरंजन के माध्यम से जनमानस को जोड़ा, बल्कि भारत की आवाज को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। @hiteshshankar

Topics: ‘आत्मनिर्भर भारत’Self-reliant India(Ayushman Bharat)Indian Constitutionजन धन योजनाJan Dhan Yojanaपाञ्चजन्य विशेषभारतीय संविधानअर्थव्यवस्थाFEATUREeconomyभारत में विविधताआयुष्मान भारतDiversity in India
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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