25 जून 1975 : भारतीय प्रजातांत्रिक इतिहास का सबसे काला दिन!
June 4, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

25 जून 1975 : भारतीय प्रजातांत्रिक इतिहास का सबसे काला दिन!

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 25, 2024, 01:41 pm IST
in भारत
इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

25 जून 1975 को ही इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर दिया था। अगले 19 महीने अत्याचार, अनाचार और दहशत के दिन थे। आम आदमी भी सहमा हुआ रहता था। लगभग पूरा विपक्ष हवालात में था। प्रेस की आजादी समाप्त हो चुकी थी। न्यायपालिका से लेकर स्थानीय निकायों तक हर कोई हमेशा आशंकित रहता था। सत्ता के सूत्र प्रधानमन्त्री और दिल्ली में बैठी एक छोटी से चौकड़ी के हाथ में केंद्रित हो गए थे, जो दिल्ली में बैठ कर 60 करोड़ लोगों का भाग्य तय कर रहे थे।

आज जब इस घटना को 49 वर्ष हो गए हैं, तब यह प्रासंगिक होगा कि उस समय के घटनाक्रम को याद किया जाए। यह घटनाक्रम है एक अतिमहत्वाकांक्षी राजनेता की सत्ता लोलुपता का, एक साहसी न्यायाधीश की निर्भीक कर्तव्य निष्ठा का, एक बुद्धिमान वकील की अचूक तर्कशीलता का, एक इच्छाशक्ति विहीन कमजोर राष्ट्रपति का, और एक ऐसी संस्कृति की स्थापना का जिसमे सत्ताधीश, सत्ता के दुरुपयोग को अपना अधिकार मानने लगा था।

इस घटनाक्रम का प्रारम्भ होता है 1971 के लोकसभा के आम चुनाव से। इस चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के उनके धड़े यानी कांग्रेस (आई) की प्रचण्ड विजय हुई। उन्होंने चुनाव के दौरान गरीबी हटाओ का नारा बुलन्द कर गरीबों को उम्मीदें जगाई थी और हिन्दुस्तान की गरीब जनता ने उन्हें अपना वादा निभाने के लिए 352 सीटों का भारी भरकम बहुमत सौंप दिया था। वे स्वयं उत्तरप्रदेश के रायबरेली से विपक्षी प्रत्याशी राजनारायण को पराजित कर सांसद और प्रधानमंत्री बनी।

इन्ही राजनरायण ने श्रीमती गांधी पर चुनाव में धांधली के आरोप लगाते हुए न्यायालय में रायबरेली के चुनाव निरस्त करने की याचिका दायर कर दी। अपने वकील के रूप में उन्होंने उस समय के युवा और तेजतर्रार शान्ति भूषण को चुना। इन्दिरा जी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में सरकारी तन्त्र का दुरुपयोग किया था। मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा की अदालत में दाखिल था और शान्ति भूषण ने कुछ तकनीकी त्रुटियां पकड़ कर उस पर अपनी दलीलों का मीनार खड़ा किया। इस मामले के सन्दर्भ में इन्दिरा जी की न्यायालय में पेशी हुई और उन्हें न्यायालय में प्रस्तुत हो कर प्रश्नों के उत्तर देना पड़े। इन्दिरा जी पर मुख्यतः दो आरोप थे –

यशपाल कपूर, इन्दिरा जी के कार्यालय में एक राजपत्रित अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। इन्दिरा जी ने उन्हे रायबरेली में अपना चुनाव प्रभारी नियुक्त कर दिया। यह राजनीतिक पद था और इसके लिए यशपाल ने अपने राजपत्रित अधिकारी के पद से त्यागपत्र दे दिया। परन्तु शान्ति भूषण ने यह सिद्ध कर दिया कि उनका त्यागपत्र स्वीकार होने की अधिसूचना जारी होने के पूर्व ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया जबकि तब तक तकनीकी रूप से वे सरकारी अधिकारी ही थे। अदालत ने यह माना कि इन्दिरा जी के स्तर पर यह अधिकारों का दुरुपयोग था।
प्रधानमंत्री की देश के विभिन्न भागों में होने वाली सभाओं आदि के दौरान मंच, लाउड स्पीकर्स और सुरक्षा सहित सभी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्थानीय जिला प्रशासन की रहती है। इस संदर्भ में एक नियमावली बनी हुई थी। इस नियमवाली को ब्लू बुक के नाम से जाना जाता था। नेहरू जी के युग में इस नियमावली में दर्ज था कि प्रधानमन्त्री की ‘चुनावी सभाओं’ में मंच और सुरक्षा आदि के इंतजाम पूर्णतः ‘गैर सरकारी’ हो कर किसी भी प्रकार के सरकारी तन्त्र का इस हेतु उपयोग करना भ्रष्ट आचरण होगा। इस नियमावली में संशोधन कर चुनावी सभाओं की व्यवस्था भी स्थानीय प्रशासन पर डाल दी गई थी। शांति भूषण यह स्थापित करने में सफल हुए कि यह संशोधन श्रीमती गांधी द्वारा अनुमोदित था और इसलिए वे भी इस भ्रष्ट व्यवस्था के लिए उत्तरदाई थी।
इस सन्दर्भ में यह भी महत्वपूर्ण था कि इंदिराजी ने यह कब घोषित किया कि वे रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी? चुनाव की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद ही उन पर आचार संहिता लागू होना थी, जिसके अन्तर्गत सरकारी तन्त्र का उपयोग भ्रष्ट आचरण कहलाता। इस संदर्भ में श्रीमती गांधी ने अदालत में शपथ पर यह वक्तव्य दिया कि उन्होंने उनकी उम्मीदवारी की घोषणा 1,फरवरी 1971 को ही की थी जिस दिन उन्होंने रायबरेली से उनका नामांकन दाखिल किया था। शान्ति भूषण एक बार पुनः यह सिद्ध करने में सफल हुए कि वे इस दिनांक से काफी पहले ही अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर चुकी थी और यह भी की देश की प्रधानमन्त्री शपथ पर झूठ बोल रही थीं!

12 जून 1975 को उपरोक्त तथ्यों के आधार पर न्यायमूर्ति श्री जगमोहन लाल सिन्हा ने श्रीमती गांधी का चुनाव रद्द कर दिया और साथ ही उन पर अगले 6 वर्षों तक चुनाव लडने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। न्यायमूर्ति सिन्हा पर प्रचण्ड दबाव था परंतु वे अपने कर्तव्यवपथ से नहीं डिगे और न्याय के पक्ष में निडरता के साथ खड़े रहे। न्यायालय के इस ऐतिहासिक आदेश के पश्चात, श्रीमती गांधी से यह अपेक्षित था कि वे त्यागपत्र दे कर पदमुक्त हो जाएं।

परन्तु श्रीमती इन्दिरा गांधी ने त्यागपत्र नहीं दिया!

यहां से राजनीति का वह शर्मनाक खेल शुरू हुआ जिसे भारतीय प्रजातांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय कहा जाता है। सबसे पहले उच्च न्यायालय से आदेश पर स्थगन लिया गया। उसके बाद 25 जून को आपातकाल की घोषणा कर दी गई। राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद ने बिना किसी आपत्ति के आपातकाल लगाने के दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर अंकित कर दिए। विपक्ष के तमाम नेता रातों रात जेल में ठूंस दिए गए। इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल जी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, जैसे शीर्ष नेता भी शामिल थे। समाचार पत्रों और सभी प्रकार के लेखन पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए गए। अब वही छप सकता था जो सरकार चाहेगी।

विपक्ष से रहित संसद में कईं प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें संविधान संशोधन भी शामिल थे। उन सारे नियमों को बदल दिया गया जिनके आधार पर न्यायालय ने श्रीमती गांधी का चुनाव रद्द कर उनके चुनाव लडने पर भी रोक लगा दी थी। यह बदलाव भी भूतकाल के दिनांक से किया गया था ताकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को बदला जा सके। जिन श्रीमती इन्दिरा गांधी को अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए था, वे ही देश की सर्वेसर्वा तानाशाह बन गईं। अगले 19 महीनों तक इस देश में सरकारी तन्त्र ने जो कहर बरपाया वह न भूतो न भविष्यति है। बिना कोई कारण बताए, किसी को भी गिरफ्तार किया जा रहा था। उन 19 महीनों में जितने लोग जेलों में ठूंस दिए गए, उतने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों ने भी गिरफ्तार नहीं किए थे! सरकार के विरोध में एक शब्द भी बोलना मुश्किल हो गया था। बसों, ट्रेनों और सार्वजनिक स्थलों से लेकर घर के दीवानखाने तक में राजनीतिक चर्चा होना ही बन्द हो गई। पूरा समाज सहमा हुआ था। समाचार पत्रों आदि के गले दबा दिए गए थे। वे उतना ही कह सकते थे जितने की अनुमति दी जाए।

देश ने यह देखा कि कैसे सत्ता के लालच में इन्दिरा जी ने न्यायपालिका, संविधान और संसद सभी की गरिमा को खण्ड खण्ड कर दिया। उन्होंने सत्ता में बने रहने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे कर नैतिक और राष्ट्रहित की राजनीति को परे धकेल दिया।

आज 25 जून को आपातकाल की घोषणा को 49 वर्ष गुजर चुके हैं। परन्तु आज भी वह घटना स्वतन्त्र भारत के इतिहास की सबसे डरावनी और दागदार राजनीतिक घटना के रूप में याद की जाती है। आज हम स्वतंत्रता के इतने आदि हो चुके है कि उसके महत्व को नजरंदाज कर देते हैं और अक्सर उसका दुरुपयोग भी करते हैं! ऐसे में यह याद करना प्रासंगिक है कि जब यह स्वतंत्रता छीन ली गई थी तब जीवन कितना कष्टप्रद, भयग्रस्त और विषाद ग्रस्त हो गया था।

 

Topics: constitution during emergency49 years of emergencyआपातकालEmergency 25 JuneArticles on Emergencyइंदिरा गांधी और इमरजेंसीइमरजेंसी 1975
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

नाटक का मंचन करते कलाकार

‘संघ गंगा के तीन भगीरथ’ नाटक का मंचन

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को महाभियोग का प्रस्ताव साैंपते हुए विपक्षी नेता

सोच पुरानी, शरारत नई

किशनगंज में 2008 में बांग्लादेशी घुसपैठ के विरोध में अभाविप की एक रैली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ शक्ति से एकजुट होती सज्जन-शक्ति

दीप प्रज्ज्वलित कर गोष्ठी का उद्घाटन करते श्री दत्तात्रेय होसबाले

‘एक भू-सांस्कृतिक अवधारणा है हिंदुत्व’

Ashwini Upadhyay Haldwani Violence

सत्ता बचाने को 1975 में लगी थी इमरजेंसी, अब राष्ट्र बचाने के लिए लगनी चाहिए : अश्विनी उपाध्याय

दिल्ली में सेवा भारती के एक केंद्र में सिलाई का नि:शुल्क प्रशिक्षण लेतीं महिलाएं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल : संघ में सेवा विभाग

Load More

ताज़ा समाचार

Donald trump gulf War

ईरान नीति पर ट्रंप को बड़ा झटका: हाउस ने 215-208 से पास किया वॉर पावर्स रेजोल्यूशन, क्या लगेगी मनमानी पर रोक?

आज का श्लोक : सन्तः सन्तप्यन्ते न दुःखेषु

आज का राशिफल

4 जून का राशिफल : किस्मत देगी साथ या आएगी चुनौती, जानें क्या कहते हैं आपके सितारे

ऑपरेशन डेल्टा हंट के बारे में मीडिया को जानकारी देते उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी

बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ गुजरात में ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’, 72 घंटे में 362 गिरफ्तार

कोर्ट का फैसला

‘प्राइड मंथ’ से पहले ऑस्ट्रेलिया से आया एक चौंकाने वाला फैसला

RSS Karyakarta Vikas Varg Kumar Mangalam Birla

नागपुर: RSS के ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग-द्वितीय’ का 4 जून को भव्य समापन, उद्योगपति कुमार मंगलम बिरला होंगे मुख्य अतिथि

8 जून को इंडी गठबंधन की बैठक : अस्तित्व बचाने जुटेंगे 17 विपक्षी दल! क्या अंदरूनी कलह पर होगा मंथन!

former wipro employee alleges forced conversion

नासिक TCS के बाद Wipro में जबरन कन्वर्जन! पूर्व कर्मचारी ने किए चौंकाने वाले खुलासे, मुस्लिम सहकर्मी पर लगाए आरोप

supreme court

न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!

RSS Sangh Shiksha Varg Prayagraj Samajik Samrasata

125 गांव, हाथों में थैले और 5000 रोटियां: संघ शिक्षा वर्ग ने पेश की समरसता की मिसाल, घर-घर चूल्हों तक पहुंचा राष्ट्रवाद

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies