आपातकाल की क्रूरता : 'तानाशाह' ने पैरों तले रौंदा देश, संविधान का घोंट दिया गला
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आपातकाल की क्रूरता : ‘तानाशाह’ ने पैरों तले रौंदा देश, संविधान का घोंट दिया गला

25 जून, 1975 को इंदिरा सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर पूरे देश को बंधक बना लिया था। जिसने भी आपातकाल का विरोध किया, उसे जेल में बंद कर दिया गया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को तो पूरी तरह दबाया गया। इसके बावजूद कुछ पत्रकारों ने इंदिरा गांधी के गुणगान में सारी हदें पार कर दी थीं।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 18, 2024, 01:02 pm IST
in भारत
आपातकाल के दौरान भारत में दमन हुआ।

आपातकाल के दौरान भारत में दमन हुआ।

आज भी लोग आपातकाल को याद कर सिहर उठते हैं। 25 जून, 1975 को इंदिरा सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर पूरे देश को बंधक बना लिया था। जिसने भी आपातकाल का विरोध किया, उसे जेल में बंद कर दिया गया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को तो पूरी तरह दबाया गया। इसके बावजूद कुछ पत्रकारों ने इंदिरा गांधी के गुणगान में सारी हदें पार कर दी थीं। कांग्रेसी नेताओं में इंदिरा की चापलूसी के लिए होड़ मची थी। वरिष्ठ पत्रकार बलबीर दत्त ने अपनी पुस्तक ‘इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर’ में अनेक कांग्रेसी नेताओं के बयान शामिल किए हैं।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता यशवंत राव चह्वाण ने कहा था, ‘‘जो इंदिरा के साथ बीतता है, वही भारत के साथ बीतता है और जो कुछ भारत पर गुजरता है, वही कुछ इंदिरा पर गुजरता है।’’ तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने तो संजय गांधी की तुलना शंकराचार्य से कर दी थी। उन्होंने कहा था, ‘‘संजय गांधी हमारे नए शंकराचार्य और विवेकानंद हैं।’’

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सीताराम केसरी ने कहा था, ‘‘संजय गांधी भारत के युवा ह्दय सम्राट हैं और उनके हाथों में अगले 50 वर्ष के लिए देश का भविष्य सुरक्षित है।’’ इन्हीं सीताराम केसरी को सोनिया गांधी ने बेइज्जत करके कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया था और खुद अध्यक्ष बनी थीं मार्च, 1977 में एक चुनावी भाषण में संजय गांधी ने कहा था, ‘‘विपक्ष के नेता कीड़ों की तरह हैं, जिन्हें कुचल देना चाहिए।’’ उनके इस बयान से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह परिवार अपने विरोधियों को किस रूप में देखता रहा है।

आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके वफादार अपने को देश से ऊपर समझते थे। इंदिरा गांधी ने अपने निजी संकट को राष्ट्रीय संकट बना दिया और अदालत का फैसला मानने के बजाय संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया को कुचलकर रख दिया। विपक्ष के प्राय: सभी प्रमुख नेताओं और करीब डेढ़ लाख पार्टी कार्यकर्ताओं और अन्य नागरिकों को बिना मुकदमा चलाए जेल में डाल दिया। इनमें करीब 250 पत्रकार भी थे। लोगों को भांति-भांति की ज्यादतियों और पुलिस जुल्म का सामना करना पड़ा। समाचारों पर कठोर सेंसर लगा दिया गया। जो कार्य अंग्रेजों ने नहीं किया, वह इंदिरा गांधी की सरकार ने कर दिखाया।

कुछ ही घंटों में इंदिरा सरकार ने भारतीय संविधान का अपहरण कर लोगों को उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया था। संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर कानून की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने पर रोक लगा दी।

इस भयंकर त्रासदी को पूरा देश 21 महीने तक झेलता रहा। जनवरी, 1977 में घोषणा हुई कि मार्च में चुनाव होंगे। चुनाव में लोगों ने इंदिरा गांधी को सबक सिखाया और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 21 मार्च, 1977 को आपातकाल समाप्त हो गया, लेकिन आज भी लोग आपातकाल के काले अध्याय को भूल नहीं पा रहे हैं।

Topics: आपातकाल की क्रूरताइंदिरा गांधी और इमरजेंसीतानाशाहभारत में आपातकालपाञ्चजन्य विशेष
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