जब कोई व्यक्ति खुद को देश और समाज से बड़ा समझने लगता है तो उसी समय से उसका पतन शुरू हो जाता है। पढ़ें आज का श्लोक
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साह-समन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्यो निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
भावार्थ-
वह व्यक्ति जो पक्षपात विहीन हो, जो अहंकारी न हो, बुद्धि एवं उत्साह से भरा हो, सिद्धि एवं असिद्धि (असफलता) में निर्लिप्त व निर्विकार हो, सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
आज की प्रासंगिकता
आज के युग में जहां विमर्श निजी हितों को देखकर होता है। विमर्श, निजी फायदा और नुकसान को देखकर होने लगा है। ऐसे समय में, यह श्लोक राष्ट्र आराधना में लगे हर मानव के लिए एक दीपस्तंभ की तरह है। परिणाम की चिंता न करते हुए केवल राष्ट्रहित में कर्म करना है। सात्विक कर्ता वह है, जो स्वयं को निमित्त मात्र मानकर भारत की सांस्कृतिक चेतना के लिए काम करे। आज का श्लोक यही संदेश देता है।

















