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केरल में कमल, तमिलनाडु में धमक

भाजपा को दक्षिण भारत के राज्यों में जो उम्मीद थी, उसके मुताबिक उसे परिणाम नहीं मिले। लेकिन इस चुनाव में उसने कई अभेद्य किलों तक जोरदार दस्तक दी है

Written byशेखर अय्यरशेखर अय्यर
Jun 14, 2024, 10:27 am IST
inविश्लेषण, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना
विजय के बाद जनता का अभिनंदन करते सुरेश गोपी

विजय के बाद जनता का अभिनंदन करते सुरेश गोपी

भाजपा की राष्ट्रव्यापी रणनीति में दक्षिण में विस्तार एक महत्वपूर्ण विषय था, क्योंकि देश के उत्तर व पश्चिम में वह अपने पैर मजबूती से जमा चुकी है। इस चुनाव में उसे उम्मीद थी कि दक्षिणी व पूर्वी राज्यों में उसे सीटें मिलेंगी। यदि उस रणनीतिक दृष्टि से बात करें तो 2024 के चुनाव में परिणाम मिला-जुला रहा। सीटों के मामले में बेशक भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, पर इसमें संदेह नहीं कि वह दक्षिण की कई बाधाएं पार करने में सफल रही है।

शेखर अय्यर
पूर्व संपादक हिन्दुस्तान टाइम्स

पूरे देश की तरह दक्षिण में भी भाजपा ने मुख्यत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही प्रचार किया और कुछ नए चेहरों को भी जमीनी स्तर पर कमान संभालने के लिए तैयार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा तमिलनाडु को छोड़कर सभी दक्षिणी राज्यों में सीटें जीतने में सफल रही। यह नहीं भूलना चाहिए कि पांच साल पहले 2019 के आम चुनाव के दौरान भाजपा दक्षिण के पांच राज्यों में से तीन केरल, तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इस बार, उसकी जीत में सबसे उल्लेखनीय केरल का त्रिशूर है, जहां उसके लोकप्रिय उम्मीदवार अभिनेता सुरेश गोपी ने बड़े अंतर से जीत हासिल की है।

यह उस पार्टी के लिए बड़ी जीत है, जो केरल में खाता खोलने के लिए संघर्ष कर रही थी। सुरेश गोपी राज्य में लोकसभा चुनाव जीतने वाले भाजपा के पहले उम्मीदवार बन गए हैं। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में भी भाजपा के राजीव चंद्रशेखर ने तीन बार के सांसद शशि थरूर को कड़ी टक्कर दी। एक समय राजीव चंद्रशेखर 20,000 से अधिक मतों से आगे चल रहे थे, जिससे लगने लगा था कि भाजपा केरल में दो सीटें जीत लेगी। वहीं, सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) को केवल एक सीट मिली। केरल में भाजपा को पिछले चुनाव में 12.9 प्रतिशत वोट मिले थे, जो इस बार 16.7 प्रतिशत हो गए। इसे एलडीएफ के 33.3 प्रतिशत के मुकाबले काफी अच्छा कहा जा सकता है।

सबसे अच्छी खबर तेलंगाना से आई। भाजपा ने तेलंगाना में आठ सीटें जीतीं, जबकि 2019 में चार थीं। यहां पार्टी का वोट 19.5 प्रतिशत से बढ़कर 35.2 प्रतिशत हो गया। आंध्र प्रदेश में भाजपा ने तेलुगु देशम पार्टी और जन सेना के साथ गठबंधन के कारण तीन सीटें जीतीं और वोट में इसकी हिस्सेदारी 0.96 प्रतिशत से बढ़कर 11.3 प्रतिशत हो गई। कर्नाटक में भाजपा ने 2019 में 28 में से 25 सीटें जीती थीं, जबकि उसके समर्थन से एक निर्दलीय भी जीत गया था। इस तरह उसने 26 सीटें हासिल की थीं। इस बार कर्नाटक में भाजपा को 17 और उसके सहयोगी जेडीएस को 2 सीटें मिलीं। भाजपा को राज्य में 46.1 प्रतिशत वोट मिले, जो 2019 में 51.4 प्रतिशत थे।

कर्नाटक के प्रदर्शन से भाजपा कार्यकर्ता थोड़े उदास हैं, लेकिन इसे 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के संदर्भ में देखें तो यह उतना भी बुरा नहीं है। हां, पार्टी की उम्मीदों के हिसाब से यह निश्चित रूप से अच्छा नहीं है और उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में हुए नुकसान के असर को कम करने में सक्षम नहीं रहा। पार्टी और पीएम मोदी ने कर्नाटक पर जितना जोर दिया था, उस लिहाज से भी परिणाम ने निराश किया है।

हालांकि तमिलनाडु में राजग एक भी सीट नहीं जीत सका, लेकिन किसी भी द्रविड़ पार्टी के समर्थन के बिना उसने 18.27 प्रतिशत वोट हासिल किए। वहीं, इस चुनाव में द्रमुक के साथ 9 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस को भाजपा के 11.24 प्रतिशत के मुकाबले मात्र 10.67 प्रतिशत वोट पर संतोष करना पड़ा। खासकर, भाजपा और उसके सहयोगी कोयंबतूर, चेन्नै और थेनी जैसी 12 सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे। तमिलनाडु के परिणामों को विस्तार से समझने की जरूरत है। भले ही पार्टी तमिलनाडु में लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी, पर मतों के आधार पर वह तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। उससे आगे सिर्फ द्रमुक और अन्नाद्रमुक ही हैं, जो दक्षिणी राज्य की राजनीति के कद्दावर खिलाड़ी हैं।

इसलिए यहां के राजनीतिक परिदृश्य को न केवल सीट, बल्कि वोट प्रतिशत की दृष्टि से भी समझना होगा। 1967 से 2024 के बीच अन्नाद्रमुक व द्रमुक का संयुक्त वोट प्रतिशत 67 से 74 के बीच रहा है, जबकि भाजपा का वोट प्रतिशत 2019 में 3.6 से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया। कह सकते हैं कि अब राज्य में त्रिकोणीय राजनीति होगी। भाजपा की राज्य इकाई के महासचिव व मदुरै से पार्टी प्रत्याशी आर श्रीनिवासन के अनुसार, ‘भाजपा के कदम विधानसभा चुनाव जीतने की दिशा में बढ़ चले हैं।’ कुल मिलाकर भाजपा ने दक्षिण में 29 सीटें जीती हैं, जबकि कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 40 सीटें हासिल कीं। प्रश्न है कि भाजपा को कहां लाभ और कहां नुकसान हुआ?

आंध्र प्रदेश: 2019 में आंध्र प्रदेश में भाजपा का वोट प्रतिशत 0.96 प्रतिशत था। चुनाव से ठीक पहले तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) जो 1999 से भाजपा की सहयोगी थी, कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग में शामिल हो गई, जिससे पार्टी का अस्तित्व संकट में आ गया। पार्टी के प्रदर्शन पर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के उदय का भी असर पड़ा, जिसने राज्य की 25 में से 22 सीटें जीती थीं। 2024 में भाजपा ने टीडीपी और तेलुगु अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण की जन सेना पार्टी के साथ गठबंधन किया, जिसका असर यह हुआ कि भाजपा छह चुनावी सीटों में से तीन पर विजयी हुई और उसका वोट प्रतिशत 13.07 रहा। यह उसके अपने रिकॉर्ड के अनुरूप था-1999 में अविभाजित आंध्र प्रदेश में भाजपा के पास 9.90 प्रतिशत वोट थे, जो 2004 में 8.41, 2009 में 3.75 और 2014 में बढ़कर 7.18 हो गए।

तेलंगाना: भाजपा ने पिछले दो चुनावों में तेलंगाना में काफी बढ़त हासिल की है। 2014 में जब यह आंध्र से अलग होकर नया राज्य बना था, तब भाजपा ने तेलंगाना में एक सीट पर जीत दर्ज की थी। उसका वोट प्रतिशत 10.37 था। 2019 में उसने चार सीटें जीतीं और वोट प्रतिशत बढ़कर 19.45 हो गया। 2024 में पार्टी ने 17 संसदीय सीटों में से आठ सीटें जीतीं और इसका वोट प्रतिशत बढ़कर 35.06 हो गया। इसके साथ ही कांग्रेस और भाजपा में कड़ी टक्कर बनी रही। कांग्रेस ने आठ सीटें जीतीं और उसका वोट प्रतिशत 40.11 रहा। तेलंगाना में भाजपा को भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के बुरे प्रदर्शन का फायदा मिला। बीआरएस की वोट में हिस्सेदारी 41.29 प्रतिशत थी, जो घटकर 16.89 प्रतिशत हो गई और उसके वोट भाजपा और कांग्रेस में बंट गए।

केरल: भाजपा को केरल में फायदा हुआ जहां उसने एक सीट जीतकर अपना खाता खोला। त्रिशूर से अभिनेता सुरेश गोपी जीते। 2016 में केरल में भाजपा ने इसी तरह प्रभावशाली प्रदर्शन किया था, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता ओ. राजगोपाल ने नेमम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था। ध्यान देने वाली बात है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी द्वारा एक सीट हासिल करने के साथ-साथ पिछले दो दशकों में उसे मिलने वाले वोट में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है। 1999 में यहां पार्टी को 6.56 प्रतिशत वोट मिले, जो 2004 में बढ़कर 10.38 प्रतिशत हो गए। 2009, 2014 व 2019 के चुनावों में भाजपा की वोट हिस्सेदारी क्रमश: 6.31 प्रतिशत, 10.33 प्रतिशत और 12.93 प्रतिशत थी। 2024 में उसे 16.67 प्रतिशत वोट मिले और पार्टी ने राज्य के लगभग सभी लोकसभा क्षेत्रों में अपनी वोट हिस्सेदारी बढ़ाई। विधानसभा के क्षेत्रवार विश्लेषण से पता चलता है कि भाजपा 11 सीटों पर पहले स्थान पर रही, जिनमें छह त्रिशूर सीट के अंतर्गत आती हैं और छह में दूसरे स्थान पर। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने केवल एक विधानसभा क्षेत्र नेमम में बढ़त हासिल की थी, जिस सीट को उसने 2016 में जीता था और सात में दूसरे स्थान पर रही थी।

चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को राज्य में 19.39 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि पांच साल पहले यह 15.64 प्रतिशत थी। भाजपा ने अकेले 16.83 फीसदी वोट हासिल किए, जबकि 2019 में यह 13.81 प्रतिशत थे। भाजपा को इस बार छह लोकसभा सीटों पर 20 फीसदी से अधिक वोट मिले। दिलचस्प बात यह है कि त्रिशूर निर्वाचन क्षेत्र पर भाजपा का ध्यान ही नहीं था, जहां से अभिनेता गोपी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। पार्टी की नजर तिरुवनंतपुरम पर थी, जिसे 1980 के दशक से ही संघ परिवार समर्थक वोट बैंक माना गया है।

आंध प्रदेश में राजग गठबंधन की विजय के बाद टीडीपी प्रमुख चंद्र बाबू नायडू का अभिनंदन करते हुए जन सेना पार्टी के नेता पवन कल्याण

2019 में गोपी ने भाजपा के वोट को 2014 के 11.15 फीसदी के मुकाबले 28.2 प्रतिशत तक पहुंचाने में मदद की, जबकि वह तीसरे स्थान पर रहे थे। 2021 में उन्होंने त्रिशूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा के वोट को 2016 के 19.46 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर 31.3 प्रतिशत कर दिया। अपनी हार के बाद भी गोपी निर्वाचन क्षेत्र के स्थानीय मुद्दों और अन्य धर्मार्थ गतिविधियों से जुड़े रहे। उनका पसंदीदा डायलॉग ‘त्रिशूर नजन एडुक्कुवा, एनिक्कु वेनम त्रिशूर (मैं त्रिशूर ले रहा हूं, मुझे त्रिशूर चाहिए)’ लोगों के बीच खासा लोकप्रिय रहा। उन्होंने अपनी बेटी की शादी के मौके पर त्रिशूर के कैथोलिक कैथेड्रल चर्च को सोने का मुकुट भेंट किया था। इसका भी मतदाताओं पर असर हुआ क्योंकि यहां ईसाइयों की आबादी लगभग 21 प्रतिशत है।

हालांकि राज्य के अन्य हिस्सों में भाजपा ईसाई वोट हासिल करने में विफल रही, लेकिन त्रिशूर में ईसाई वोटों का एक बड़ा हिस्सा गोपी के पक्ष में गया, जिससे वे 74,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत गए और सात विधानसभा क्षेत्रों में से छह में बढ़त हासिल की।

दूसरी ओर, राजीव चंद्रशेखर कांग्रेस के शशि थरूर से मात्र 16,000 वोटों से हार गए। लगता है कि भाजपा को इस लोकसभा क्षेत्र के शहरी इलाकों पर ही ध्यान केंद्रित करने की कीमत चुकानी पड़ी। अलपुझा में भाजपा उम्मीदवार शोभा सुरेंद्रन ने कांग्रेस के के.सी. वेणुगोपाल और माकपा के मौजूदा सांसद ए.एम आरिफ के बाद तीसरे स्थान पर आने के बावजूद पार्टी के वोट को 2019 के 17 प्रतिशत से बढ़ाकर 28 फीसदी कर दिया। अलपुझा के हरिपद और कायमकुलम विधानसभा क्षेत्रों में शोभा को आरिफ से ज्यादा वोट मिले।

कर्नाटक: कर्नाटक में भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ है, जहां 2019 में उसके पास 25 सीटें थीं। इस बार वह 17 सीटों पर सिमट गई और वोट शेयर भी 51.38 प्रतिशत से घटकर 46.05 प्रतिशत रह गया। कांग्रेस को बड़ा फायदा हुआ और उसने नौ सीटें जीतीं। कांग्रेस ने इससे पहले 2023 विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की थी। कर्नाटक की हार भाजपा के लिए झटका है। हालांकि कर्नाटक ने यह दिखा दिया कि लोकसभा चुनाव में उसके मतदाता अब भी भाजपा को पसंद कर रहे हैं। फिर भी, भाजपा नेताओं को भविष्य में ज्यादा मेहनत करनी होगी। 1999 में राज्य ने भाजपा को 27.19 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2004 में बढ़कर 34.77 प्रतिशत, 2009 में 41.63 व 2014 में 43.01 प्रतिशत हो गए।

तमिलनाडु: यहां भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन 39 सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत सका। पूर्व आईपीएस से राजनेता बने अन्नामलाई, जिन्हें कार्यकर्ताओं ने राज्य में पार्टी की किस्मत चमकाने के लिए ठोस काम करने का श्रेय दिया, पश्चिमी शहर में दूसरे स्थान पर रहे। वे द्रमुक के गणपति राजकुमार से 1.18 लाख वोटों से हार गए, लेकिन उन्हें हासिल वोट में लगभग 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई। भाजपा ने चेन्नई दक्षिण, तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी में भी 30 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किए। अन्नामलाई ने कोयंबटूर में प्रभावशाली लड़ाई लड़ी। उन्होंने द्रमुक के राजकुमार के खिलाफ 4,50,132 वोट हासिल किए, जो इस सीट पर भाजपा द्वारा हासिल सबसे ज्यादा वोट हैं। भाजपा को 2019 में यहां 3.92 लाख वोट मिले थे, तब अन्नाद्रमुक राजग का हिस्सा थी। 2014 में भाजपा को लगभग 3.9 लाख वोट मिले थे, जब झारखंड के वर्तमान राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन उसके उम्मीदवार थे।

राधाकृष्णन को हासिल 4,49,269 वोट भाजपा के अन्नाद्रमुक के साथ गठबधंन के दौर का सबसे बड़ा आंकड़ा था। राजग का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दक्षिणी तमिलनाडु में रहा, जहां इसने लगभग 22.27 प्रतिशत के औसत वोट हासिल किए। कन्याकुमारी के अपने परंपरागत गढ़ में पूर्व केंद्रीय मंत्री राधाकृष्णन को 35.6 प्रतिशत वोट मिले, जो राज्य में किसी भी राजग उम्मीदवार द्वारा हासिल सर्वाधिक मत प्रतिशत है। तिरुनेलवेली व रामनाथपुरम में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, क्योंकि नैनार नागेंथ्रन व ओ. पन्नीरसेल्वम ही जाने-पहचाने चेहरे थे। अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम के महासचिव टी.टी.वी. दिनाकरन को 25.65 प्रतिश वोट मिले।

मदुरै में भाजपा ने आश्चर्यजनक रूप से 22.38 प्रतिशत वोट हासिल कर अन्नाद्रमुक को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। हालांकि विरुधुनगर (15.66%) में राजग का प्रदर्शन अपेक्षाकृत खराब रहा, जहां उसने जानी-मानी अभिनेत्री राधिका सरथकुमार को मैदान में उतारा था। इसके गठबंधन दलों, पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) और तमिल मानिला कांग्रेस (मूपनार) को डिंडीगुल और थूथुकुडी में 15 प्रतिशत से भी कम वोट मिले। चेन्नई में राजग ने औसतन 20.72 प्रतिशत वोट हासिल करके अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी अच्छा प्रदर्शन किया। दक्षिण चेन्नई में भाजपा उम्मीदवार तमिलिसाई सुंदरराजन को लगभग 2.9 लाख वोट मिले। चेन्नई सेंट्रल में भाजपा के विनोद पी. सेल्वम भी तमिलिसाई की तरह ही दूसरे स्थान पर रहे, जिन्हें 23.16 प्रतिशत वोट मिले।

हालांकि उत्तरी चेन्नई में राजग तीसरे स्थान पर रहा। उत्तरी तमिलनाडु में जहां पीएमके का अच्छा प्रभाव है, वहां राजग का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा, जबकि पीएमके को राजग में शामिल करके भाजपा उत्तरी तमिलनाडु में कुछ सीटों पर कब्जा करने की उम्मीद कर रही थी। हालांकि वह 10 निर्वाचन क्षेत्रों में औसत 16.79 प्रतिशत वोट प्रतिशत पर ही ठहर गई। आंकड़े बताते हैं कि गठबंधन सहयोगियों के बीच वोटों का आपसी हस्तांतरण नहीं हो सका। केवल 5.71 प्रतिशत वोटों के साथ गठबंधन कल्लकुरिचि में चौथे स्थान पर रहा। वेल्लोर सीट को छोड़कर जहां ए.सी. षणमुगम ने 31.25 प्रतिशत वोट हासिल किए, उत्तरी तमिलनाडु के अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में राजग का वोट प्रतिशत 15 से 20 प्रतिशत के बीच रहा। पश्चिम तमिलनाडु में राजग का औसत वोट 18.77 प्रतिशत रहा। खास तौर पर सलेम, नमक्कल व इरोड में गठबंधन को 10 प्रतिशत से भी कम वोट मिले, जो इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि राजग के सहयोगियों के वोट आपस में हस्तांतरित नहीं हुए। द्रविड़ पार्टियों, खासकर द्रमुक का गढ़ रहे मध्य तमिलनाडु में राजग का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। यहां की सात सीटों पर राजग का औसत मत प्रतिशत केवल 12.82 प्रतिशत रहा। यह नागापट्टिनम में चौथे स्थान पर और मध्य तमिलनाडु की अन्य सभी सीटों पर तीसरे स्थान पर रहा।

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