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सिर्फ दिखावा और छलावा

वंचितों और पिछड़ों के हक की फर्जी वकालत करने वाले राहुल गांधी को कांग्रेस का इतिहास जानना चाहिए। वह भूल जाते हैं कि कांग्रेस के राज में इन वर्गों को हमेशा छला गया। उनका हक छीनकर मुसलमानों को दिया गया

Written byअखिलेश वाजपेईअखिलेश वाजपेई
Jun 4, 2024, 12:41 pm IST
in भारत, विश्लेषण
पंचकुला में चुनावी रैली में राहुल गांधी

पंचकुला में चुनावी रैली में राहुल गांधी

वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों के कल्याण को लेकर आज की कांग्रेस या राहुल गांधी दावे चाहे जो करें, इनकी तरक्की की चाहे जितनी चिंता दिखाएं लेकिन हकीकत इससे ठीक उलट है। इतिहास में तो एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों पन्नों पर नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस द्वारा इन वर्गों के साथ किया गया छल-कपट मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा दिख जाएगा। दिख यह भी जाएगा कि नेहरू-इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस की तत्कालीन सरकारों को अगर दबाव में इन वर्गों के लिए कुछ करना भी पड़ा तो उसे इतने अव्यावहारिक तरीके से किया कि प्रचार तो भरपूर हो लेकिन उन योजनाओं का इन वर्गों को खास लाभ न होने पाए। इस बात के भी कई प्रमाण हैं कि नेहरू या उनके वंशजों को जब मौका मिला तो उन्होंने वंचित वर्गों की सबसे प्रखर और मजबूत आवाज डॉ. भीमराव आंबेडकर को हाशिए पर रखने की कोशिश की।

मुसलमानों को आरक्षण

वंचित और पिछड़े वर्गों के आरक्षण में सेंधमारी कर उसका लाभ मुसलमानों को देने की कांग्रेस की नीति नई नहीं है। मंडल आयोग की रिपोर्ट का विरोध करते हुए भी राजीव गांधी ने कहा था कि ‘‘मंडल आयोग की पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिशों में अल्पसंख्यकों को शामिल नहीं किया गया है।’’ उनका तर्क था कि भारत में मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है।’

जहां तक आरक्षण पर सकारात्मक दृष्टिकोण का मुद्दा है तो याद रखना होगा कि अनुसूचित जाति (वंचित वर्गों) के लोगों को प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता जैसी सुविधा देने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार को जाता है।

जामिया को दिया अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा

याद कीजिए 2011 का साल। केंद्र में कांग्रेस सरकार थी। जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दे दिया गया । ऐसा करके एक ही झटके में इस शिक्षण संस्थान में वंचित वर्ग के छात्रों की सुविधाएं छीनकर मुसलमानों को देने का रास्ता खोल दिया गया। राहुल मोदी सरकार पर वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों का आरक्षण समाप्त करने का आरोप तो लगा रहे हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि वर्तमान सरकार ही जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा देने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में लड़ाई लड़ रही है।

नेहरू को पसंद नहीं थे आंबेडकर

इतिहास के पन्नों में दर्ज यह इबारत हर कोई पढ़ सकता है कि डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में जाने से रोकने की किस तरह कोशिश की गई। जोगेन्द्र नाथ मंडल के समर्थन से डॉ. आंबेडकर जैसे-तैसे संविधान सभा के सदस्य हुए तो जिन जिलों के मतों से वे संविधान सभा के सदस्य बने उन जिलों को हिंदू बहुल होने के बावजूद पाकिस्तान को देने का फैसला ले लिया गया। इससे नाराज आंबेडकर ने संविधान को स्वीकार न करने की धमकी दी। तब कुछ वरिष्ठ लोगों के हस्तक्षेप और संयोग से महाराष्ट्र से निर्वाचित सदस्य एम.आर. जयकर के त्यागपत्र से संविधान सभा में एक स्थान रिक्त हो जाने पर काफी मजबूरी में डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा में जगह दी गई। घटनाएं कई हैं, जिनसे यह पता चलता है कि नेहरू और कांग्रेस में उनके पक्षधरों का, वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों के कल्याण को लेकर क्या दृष्टिकोण था।

कांग्रेस ने 2011 में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दे दिया था।

नेहरू नहीं चाहते थे आंबेडकर जीतें

कांग्रेस नेतृत्व, खासतौर से जवाहर लाल नेहरू और उनके परिवार की वंचित, पिछड़े वर्गों और वनवासियों को लेकर छल-कपट और पाखंड के उदाहरण एक नहीं, अनेक हैं। वर्ष 1952 में उत्तर मुंबई की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे आंबेडकर को हराने के लिए नेहरू ने लगातार दो सभाएं कीं। डॉ.आंबेडकर लगभग 15 हजार वोटों से हार गए। नेहरू यहीं नहीं रुके। इन्होंने डॉ. आंबेडकर को पराजित करने के लिए 1954 में फिर पूरी ताकत लगाई जब वह भंडारा लोकसभा सीट का उपचुनाव लड़ रहे थे।

राजनीति और दलितों की स्थिति पर कई प्रख्यात विद्वानों ने संयुक्त रूप से अध्ययन कर 90 के दशक में ‘दलित जन उभार’ नाम से एक ग्रंथ निकाला था। इसमें प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अंबिका प्रसाद तिवारी ने भी ‘भारतीय अर्थतंत्र का दलित परिप्रेक्ष्य’ में कांग्रेस के वंचित, पिछड़े वर्गों, वनवासिय़ों और गरीबों के प्रति प्रेम को एक तरह से छलावा करार दिया है। उन्होंने इस लेख में कांग्रेस की तत्कालीन सरकारों के विकास मॉडल में वंचित वर्गों के हितों की व्यापक उपेक्षा का उल्लेख किया है।

साथ ही यह समझाने की कोशिश की है कि आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार की नीतियों और उनकी नौकरशाही के रवैये के कारण ही देश के वंचितों में तत्कालीन शासन प्रणाली पर भरोसा घटा और उन्हें लगा कि जब तक वे अपनी राजनीतिक शक्ति नहीं खड़ी करेंगे य़ा अपने भीतर से नेतृत्व नहीं निकालेंगे तब तक उनके आर्थिक हितों की उपेक्षा होती रहेगी। प्रो. तिवारी ने यह भी लिखा है कि ‘‘आजादी के बाद ही नहीं उसके पहले से ही कांग्रेस के कुछ फैसलों को लेकर वंचित वर्गों के दिल और दिमाग में इतना अविश्वास भर गया था कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने महात्मा गांधी की ग्राम स्वराज की अवधारणा को भी खारिज कर दिया था।’’

नेहरू कांग्रेस और जातिवाद

माना जाता है कि वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों के कल्याण, उत्थान और सम्मान को लेकर कांग्रेस की उपेक्षावादी दृष्टि की प्रतिक्रियास्वरूप पनपी चेतना ने जहां वंचित वर्गों को अपने बीच का नेतृत्व उभारने और अपने हित की चिंता करने वाले संगठनों को खड़ा करने के लिए मजबूर किया और डीएस-4 जैसे संगठनों को जन्म दिया। राजनीति में जातिवाद का प्रभाव भी बढ़ाया। समय बीतने के साथ वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों में यह भाव बढ़ता और मजबूत होता चला गया कि कांग्रेस उनकी हितचिंतक नहीं हो सकती। कांग्रेस की इसी नीति ने ही हिंदू समाज में विखंडन के बीज भी बोए।

आज राहुल भले ही उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी के साथ मंच साझा कर जातीय जनगणना पर जोर दे रहे हों, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीसरी बार सरकार बनने पर वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों का मिलने वाले आरक्षण के समाप्त हो जाने का प्रचार कर रहे हों, लेकिन इतिहास जहां राहुल, तेजस्वी और अखिलेश के इन आरोपों को गलत ठहराता है वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस आरोप की पुष्टि करता है कि जवाहर लाल नेहरू तो वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों को आरक्षण देना ही नहीं चाहते थे। वह तो डॉ. आंबेडकर थे जिन्होंने लड़-झगड़कर इन वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान कराया।

आरक्षण के विरोध में नेहरू

इतिहास के पन्नों पर आज भी यह तथ्य देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1961 में देश के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर नौकरियों में आरक्षण देने के बजाए अच्छी शिक्षा पर जोर दिया था। उन्होंने लिखा था, ‘ये सच है कि हम एससी और एसटी की मदद करने के मामले में कुछ नियमों और परंपराओं से बंधे हैं। पर, मैं किसी तरह के आरक्षण को नापसंद करता हूं।’ नेहरू ही नहीं, राहुल गांधी के पिता और देश के प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी भी ने आरक्षण का विरोध किया था। राहुल भले ही आज भाजपा पर आरोप लगा रहे हों लेकिन सच तो यह है कि भाजपा न होती और राजीव गांधी की चलती तो इस देश में पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू ही न हो पाती। पिछड़े वर्गों के युवक-युवतियों को उच्च शिक्षण संस्थानों में कोटे के तहत प्रवेश ही न मिल पाता।

मंडल आयोग का क्रियान्वयन

आरक्षण को लेकर आज भाजपा पर हमलावर होने की कोशिश करते राहुल और कांग्रेस के लिए इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है कि आखिर जनता पार्टी की सरकार में गठित मंडल आयोग की पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश करने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट को 10 साल तक स्व. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकारों ने लागू क्यों नहीं होने दिया था। यहां यह भी याद कराना जरूरी है कि पिछड़ों को आरक्षण देने की सिफारिश करने वाले मंडल आयोग का गठन करने वाली जनता पार्टी की सरकार थी, उसमें भारतीय जनसंघ भी महत्वपूर्ण भूमिका में था, जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बना। आयोग ने रिपोर्ट दे दी लेकिन जनता पार्टी की सरकार चली गई। इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बन गईं। उन्होंने इसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

राजीव गांधी ने भी किया था विरोध

इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में हत्या के बाद उनके पुत्र और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। उन्होंने भी इसे ज्यों का त्यों पड़ा रहने दिया। रिपोर्ट को लागू किया वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने जो राजीव गांधी सरकार के बोफर्स तोप घोटाले और पनडुब्बी घोटाले से उपजे जनाक्रोश के बाद बनी थी। वी.पी. सिंह सरकार को भाजपा का समर्थन था।

मजेदार बात यह है कि रिपोर्ट पर बहस के दौरान राजीव गांधी जो तब विपक्ष में आ चुके थे, उन्होंने इस रिपोर्ट को लागू करने का विरोध किया। बहस के बाद लोकसभा में मतदान में भी कांग्रेस ने इसका विरोध किया था। वहीं भाजपा वी.पी. सिंह सरकार के साथ मजबूती से खड़ी रही तो पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की सिफारिश वाली ये रिपोर्ट लागू हो गई अन्यथा राजीव गांधी तो इस रिपोर्ट को लोकसभा से खारिज करवाना चाह रहे थे।

डॉ. आंबेडकर की हमेशा की उपेक्षा

कांग्रेस दावा करती है कि वह डॉ. भीमराव आंबेडकर के बताए रास्ते पर चलती है। साथ ही, राहुल आरोप लगा रहे हैं कि तीसरी बार भाजपा की सरकार बनी तो डॉ. आंबेडकर निर्मित संविधान को बदल दिया जाएगा। लेकिन उन्हें इतिहास की उन घटनाओं पर भी कुछ बोल देना चाहिए जिनमें जवाहर लाल नेहरू द्वारा डॉ. आंबेडकर की उपेक्षा और तिरस्कार के कई कथानक दर्ज हैं।

नेहरू की नीतियों से डॉ. आंबेडकर कितने खिन्न थे, इसका प्रमाण उनका कानून मंत्री पद से इस्तीफा और संसद में दिया गया भाषण है, जिसमें उन्होंने कानून मंत्री पद से अपने त्यागपत्र के लिए जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया है। ‘दि धर्मा डिस्पैच’ के एक लेख में जो कुछ छपा है उसके अनुसार, डॉ. आंबेडकर ने प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू की विश्वसनीयता, योग्यता और प्रवीणता को शून्य बताया था। साथ ही उन पर अपने मित्रों की पीठ पर वार करने का आरोप लगाते हुए कहा कि वे अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े वर्गों के साथ किए जा रहे सरकार के व्यवहार से काफी असंतुष्ट हैं।

ये किस्से भी कुछ कहते हैं

वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र भट्ट कहते हैं कि ‘‘कांग्रेस के वंचित और पिछड़े वर्गों तथा वनवासियों से ‘प्रेम’ के कुछ किस्से हैं, जिनसे कांग्रेस और खासतौर से नेहरू परिवार की नीतियों व नीयत का पता चलता है। कांग्रेस की सरकारों को जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को तो भारत रत्न देने की याद रही लेकिन डॉ. भीमराव आंबेडकर को भारत रत्न तब मिला जब केंद्र में भाजपा के समर्थन से वी.पी. के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी।’’ वह कहते हैं ‘‘वंचितों के लिए चिंतित राहुल को अपने पुरखों के इस रवैये पर भी कुछ बोलना चाहिए।’’

कांग्रेस के लगातार सत्ता में रहने के बावजूद अनूसचित जाति और अनूसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम बनाने में 1952 से 1989 तक का लंबा समय क्यों लग गया। ऐसी कांग्रेस यदि वंचितों, पिछड़े वर्गों और वनवासियों के हित रक्षक होने का दावा करे तो उसे सिर्फ पाखंड ही कहा जा सकता है।’’ दरअसल कांग्रेस ने इन वर्गों का वोट तो लिया लेकिन कल्याण के लिए कभी कुछ नहीं किया। इसके उलट इनको मिलने वाली सुविधाओं पर कैंची चलाने का काम किया।

सच यह है

बात यहीं पर आकर नहीं रुकती। पिछड़े वर्ग के छात्र कई वर्षों से चिकित्सा की पढ़ाई में आरक्षण की मांग कर रहे थे, लेकिन यूपीए सरकार कान में उंगली डाले बैठी रही। इस मांग को भी सुना मोदी सरकार ने, जिसमें पिछड़े वर्ग के छात्रों को चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश में 27 प्रतिशत आरक्षण मिल सका। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग को संवैधानिक दर्जा भी मोदी सरकार ने ही दिया। जिससे पिछड़े वर्ग के लोगों को अपने अधिकारों को लेकर लड़ाई लड़ने का एक सशक्त मंच मिल सका।

Topics: Rahul Gandhiभारतीय अर्थतंत्र का दलित परिप्रेक्ष्यJawaharlal NehruGram Swarajमहात्मा गांधीDalit Perspective of Indian EconomyMahatma GandhiDr Bhimrao Ambedkarजवाहर लाल नेहरूAfter Independenceडॉ. भीमराव आंबेडकरपाञ्चजन्य विशेषआजादी के बादराहुल गांधीग्राम स्वराज
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