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इतनी दिलचस्पी क्यों?

अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी और कांग्रेस के खातों पर विदेशियों के हालिया बयान एक रहस्यमयी गठजोड़ की ओर इशारा करते हैं

Written byप्रशांत बाजपेईप्रशांत बाजपेई
Apr 9, 2024, 06:23 pm IST
in भारत, विश्लेषण, दिल्ली
हेमंत सोरेन और राहुल गांधी के साथ अरविंद केजरीवाल (फाइल चित्र)

हेमंत सोरेन और राहुल गांधी के साथ अरविंद केजरीवाल (फाइल चित्र)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर जर्मनी और अमेरिका के विदेश एवं गृह विभाग के प्रवक्ताओं और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस के प्रवक्ता के बयानों ने टूलकिट रणनीति और टूलकिट के लेखकों को लेकर नई सनसनी पैदा की है। देश के बाहर के कुछ लोगों के लिए केजरीवाल इतना महत्व क्यों रखते हैं? वैसे अहमियत तो कांग्रेस और राहुल गांधी की भी बढ़ गई है।
अमेरिकी गृह विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने शराब घोटाले के मामले में जांच का सामना कर रहे आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बैंक खाता फ्रीज होने के कांग्रेस पार्टी के आरोपों पर अपनी ‘चिंता’ जाहिर की।

2023 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ‘हिंदू बहुल भारत’ को अपने ‘मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा’ करने की नसीहत दी थी, अन्यथा ‘भारत के टूटने’ की आशंका जताई थी। क्या मैथ्यू मिलर दिल्ली के शराब घोटाले की व्याख्या कर सकते हैं? या वह भी कथित किसान आंदोलन पर ट्वीट करने वाली पॉप गायिका रिहाना और अन्य की तरह व्यवहार कर रहे हैं? क्या जब पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पर भ्रष्ट आचरण का मामला बना था, तो वह अमेरिकी लोकतंत्र पर हमला था?

क्या कांग्रेस के कोष को सरकार ने जब्त (फ्रीज) कर लिया है? नहीं, सत्य यह है कि आयकर विभाग ने कांग्रेस के खातों की अनियमितता और (राजनैतिक दलों के लिए बने नियमानुसार) बकाया आयकर का भुगतान करने का नोटिस दिया था। लेकिन उचित जवाब नहीं मिला, तो आयकर विभाग द्वारा कांग्रेस के खाते को ‘आंशिक’ रूप से फ्रीज किया गया। आयकर न चुकाने पर हर व्यक्ति या संस्था को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। भारत में भी, अमेरिका में भी। कांग्रेस तो हल्ला मचाएगी ही, पर अमेरिकी गृह विभाग के प्रवक्ता को इतनी सीधी सी कानूनी बात समझ क्यों नहीं आई?

कुछ इसी तरह की बात जर्मनी विदेश विभाग के प्रवक्ता सेबेस्टियन फिशर ने की थी, लेकिन भारत के विदेश विभाग की कड़ी आपत्ति के बाद जर्मनी ने ‘भारत और जर्मनी के समान लोकतांत्रिक मूल्यों’ और भारत की न्याय-व्यवस्था की प्रशंसा की और ‘भेदभावपूर्ण एकतरफा बयान’ की निंदा की। लेकिन मैथ्यू मिलर ने ढिठाई दिखाई और अपने बयान को दोहराया। इस सारे घटनाक्रम को समझने के लिए दो ताकतों को समझने की आवश्यकता है, पहला अमेरिकी डीप स्टेट और दुनिया में उभरता अतिधनाढ्य, अभिजात्य वोक-वामपंथी वर्ग।

बात संयुक्त राष्ट्र की हो, नाटो देशों की हो या विश्व बैंक (आईएमएफ) की, अमेरिका क्या सोचता है, यही अधिक मायने रखता है। इसलिए पहले बात अमेरिका की। अमेरिका एक ओर भारत को रणनीतिक-सामरिक साझेदार बताता है, भारत को नाटो का सदस्य बनने का न्यौता देता है, भारत की नौसेना की प्रशंसा करता है, भारत की सेना के साथ उसकी सेना युद्धाभ्यास करती है। वहीं दूसरी ओर, उसके राजनयिक नागरिक संशोधन कानून (सीएए) पर नकारात्मक टिप्पणी करते हैं, भारत की न्याय व्यवस्था और भारत के समाज पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू अमेरिका की गोद में बैठकर भारत के खिलाफ जहर उगलता है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के भारत विरोधी बयान के पीछे भी अमेरिका और कनाडा की खुफिया रणनीतिक साझेदारी की चर्चाएं उठी थीं। अमेरिका पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ओसामा बिन लादेन को तो मार गिराता है, लेकिन हाफिज सईद और मसूद अजहर पर केवल जुबानी खर्च करता है, ऐसा क्यों?

वास्तव में अमेरिकी सरकार का रक्षा विभाग-विदेश विभाग आदि अमेरिका की तात्कालिक आवश्यकताओं पर काम करते रहते हैं, लेकिन अमेरिकी डीप स्टेट या एस्टब्लिश्मेंट यानी सीआईए अपनी चली आ रही, दीर्घकालीन रणनीतियों पर काम करता रहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और ब्रिटेन को दक्षिण एशिया में पैर जमाने के लिए जमीन चाहिए थी। मजबूत भारत उनकी इस योजना के लिए ठीक नहीं बैठता था।

पाकिस्तान सब तरह से उनके काम का था। उधर, रूस की खुफिया संस्था केजीबी ने भारत में अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं, इसलिए सीआईए ने भारत के लिए अपनी योजनाएं बनानी शुरू कर दीं। केजीबी भारत को रूसी हितों के हिसाब से ढालना चाहती थी, तो सीआईए भारत की दरारों (फाल्ट लाइन्स) का दोहन करना चाहती थी। समय के साथ इसके औजार बदलते और विकसित होते रहे, लेकिन नीति नहीं बदली। दूसरी तरफ, अमेरिका सहित सारे यूरोप में एक अतिधनाढ्य, अभिजात्य वोक-वामपंथी वर्ग उभरा है, जो ‘वेलफेयर स्टेट’ के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने और वामपंथी-सोशलिस्ट विचार को दुनिया में फैलाने में लगा है।

अब कुछ बिंदुओं को जोड़ने का प्रयास करते हैं। अमेरिकी लेखक जीन शार्प, जिसे अहिंसा का ‘मैकियावेली’ कहा जाता है, जिसके सीआईए और पेंटागन से आंतरिक संबंध रहे हैं, ने एक किताब लिखी – ‘198 मेथड्स आफ रिजीम चेंज’ अर्थात् सत्ता परिवर्तन की 198 विधियां। इस किताब में जो लिखा है, वह अरब स्प्रिंग में देखने को मिला, अब वही सब भारत में देखने को मिल रहा है। उन 198 तरीकों में से कुछ इस प्रकार हैं-

1. विरोध प्रदर्शन-सरकार के खिलाफ, सशस्त्र बलों के खिलाफ। याद करें कश्मीर में तैनात हमारी सेना के खिलाफ अभियान और एक किताब ‘26/11 आरएसएस की साजिश’, जिसमें मुंबई आतंकी हमले का आरोप भारत की सुरक्षा एजेंसियों पर मढ़ा गया था।
2. प्रूफ थ्योरी – हर चीज का सबूत मांगो। याद करें, बालाकोट मामले में सबके साथ सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद केजरीवाल एक कदम आगे गए और अभिनंदन द्वारा अमेरिकी जेट गिराने का सबूत मांग लिया था।
3. पीआईएल युद्ध- हर चीज के खिलाफ अदालत में एक याचिका डाल दो। भारत के पिछले दस 10 वर्ष की कुछ याचिकाएं याद करें। 370 हटाने को चुनौती, राफेल को चुनौती, ईवीएम और इलेक्टोरल बांड को चुनौती इत्यादि।
4. मीडिया युद्ध और सांप्रदायिक उथल-पुथल – याद करें, शाहीनबाग और दिल्ली दंगे, उसमें देश-विदेश के मीडिया विशेष की भूमिका, दिल्ली दंगे में आम आदमी पार्टी के पार्षद की संलिप्तता और मीडिया में बैठे अरविंद केजरीवाल के ‘क्रांतिकारी’ साथी। खालिस्तानी आतंकी पन्नू का आआपा को समर्थन तथा लाखों डॉलर देने का दावा।
5. किसानों की हड़ताल- किसान आंदोलन के नाम पर जो हुआ और उस पर केजरीवाल एवं आआपा का जो रवैया था, वह अपनी कहानी स्वयं कहता है।

इसके अतिरिक्त एक अन्य बिंदु, जो इस किताब में आता है, वह है न्यायिक असहयोग। अरविंद केजरीवाल को ईडी के 9 बुलावे (समन) आए, लेकिन केजरीवाल मुंह फेरे बैठे रहे। क्या यह सब महज संयोग है? क्यों भारत के इतने मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ केजरीवाल विश्व मीडिया में (विशेष रूप से वामपंथी) छाए रहते हैं? क्या कहता है कुमार विश्वास का खुलासा कि पंजाब में खालिस्तान समर्थकों का सहयोग लेने के संबंध में केजरीवाल ने उनसे कहा था ‘या तो पंजाब का सीएम बनूंगा या फिर नए देश का प्रधानमंत्री…?’

दूसरी तरफ, राहुल गांधी के अमेरिका-ब्रिटेन के दौरे, उन दौरों में भारत विरोधी लोगों और संगठनों की मेहमाननवाजी स्वीकार करना, चीन की प्रशंसा और भारत की निंदा, भारत में ‘अल्पसंख्यकों, किसानों-महिलाओं’ पर कथित अत्याचार का राग और अब विदेशी मीडिया व कुछ राजनयिकों द्वारा कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल के ‘विक्टिम कार्ड’ को मान्यता देना। वही सुर जॉर्ज सॉरोस और बराक ओबामा के मुंह से निकलना, जॉर्ज सॉरोस का भारत में मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का एलान, इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के पुराने साथियों सहित अन्ना हजारे का कहना कि ‘केजरीवाल को पहचानने में गलती हो गई।’ क्या यह सब मात्र संयोग है?

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