बसंत पंचमी विशेष : तमस दूर करने वाली देवी
June 4, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

बसंत पंचमी विशेष : तमस दूर करने वाली देवी

मनीषियों का कहना है कि मनुष्य की जिह्वा सिर्फ रसास्वादन के लिए नहीं है, यह वाणी की देवी मां सरस्वती का सिंहासन है। मधुर वाणी शत्रु को भी मित्र बना लेती है, जबकि कटुवाणी अपनों को भी पराया कर देती है

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Feb 14, 2024, 03:59 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
मां सरस्वती

मां सरस्वती

मनुष्य की आत्मा में निहित उस चैतन्य शक्ति का प्रतीक माना गया है, जो उसे अज्ञान के अंधकार से सद्ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है।

सनातन धर्म संस्कृति में मां सरस्वती को मनुष्य की आत्मा में निहित उस चैतन्य शक्ति का प्रतीक माना गया है, जो उसे अज्ञान के अंधकार से सद्ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है। ‘बृहदारण्यक उपनिषद्’ में वर्णित एक प्रसंग में विदेहराज जनक महान तत्वज्ञ ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं, ‘‘हे महान ऋषि! कृपा करके मेरी इस जिज्ञासा का समाधान करिए कि जब सूर्य अस्त हो जाता है, चांदनी भी नहीं होती और आग भी बुझ जाती है तो उस समय वह कौन-सी शक्ति है, जो मनुष्य का पथ प्रशस्त करती है?’’ तब ऋषि उनसे कहते हैं, ‘‘वह दिव्य शक्ति है बुद्धि, ज्ञान और विवेक की, जो मां सरस्वती की आराधना से प्राप्त होती है। ज्ञान और विवेक की इस शक्ति के बलबूते मनुष्य हर विषम परिस्थिति में सफलता अर्जित कर सकता है।’’

ज्ञात हो कि मां आदिशक्ति का महिमागान करने वाले लोकप्रिय धर्मशास्त्र ‘श्रीमद् देवीभागवत महापुराण’ में महर्षि मार्कंडेय ‘या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥’ गाकर जिस मातृशक्ति को नमन-वंदन करते हैं, वे मूलत: मां सरस्वती ही हैं, जो अपने भक्तों की बुद्धि की जड़ता को दूर कर उन्हें अंतर्ज्ञान तथा नीर-क्षीर विवेक की जीवन दृष्टि प्रदान करती हैं। मां आदिशक्ति के नौ अवतारों में से सबसे प्रमुख अवतार मां सरस्वती का माना गया है, जिन्हें ‘दुर्गा सप्तशती’ में मां ब्रह्मचारिणी के रूप में दर्शाया गया है। इसीलिए मां सरस्वती की प्रार्थना में रचे गए बृहदारण्यकोपनिषद् के ऋषियों के ‘असतो मा सद्गमय’, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ और ‘मृत्योमार्मृतं गमय’ जैसे दैवीय सूत्रवाक्य युगों-युगों से हमें प्रेरणा देते आ रहे हैं।

‘कण्ठे विशुद्धशरणं षोड्शारं पुरोदयाम्। शाम्भवीवाह चक्राख्यं चन्द्रविन्दु विभूषितम्।।’’ – पद्मपुराण

मां सरस्वती का अवतरण

समूचे विश्व को बुद्धि और विवेक का अनुदान-वरदान देने वाली मां सरस्वती के अवतरण से जुड़ा एक अत्यंत रोचक कथानक ‘ऋग्वेद’ में वर्णित है। इसके अनुसार आदियुग में त्रिदेवों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सर्वसम्मति से सृष्टि की रचना का दायित्व ब्रह्मा जी को सौंपा था। ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम सृष्टि के पंचतत्वों यानी जल, धरती, आकाश, वायु और अग्नि को उत्पन्न किया; और फिर उनके माध्यम से धरती पर समस्त जड़-चेतन जीवधारियों यानी नदी, सागर, झरने, पेड़-पौधे, पहाड़, तरह-तरह की वृक्ष-वनस्पतियां तथा जीव-जंतुओं की रचना की और सबसे आखिर में अपनी आकृति में मनुष्य का सृजन किया। लंबे समय के अपने अथक परिश्रम से रची गई अपनी सुंदर व परिपूर्ण सृष्टि को देखकर ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए; किंतु अपने द्वारा रची गई सृष्टि को मूक व निस्पंद देख उनका समूचा आनंद दो ही पल में ही उदासी में बदल गया।

तब ब्रह्मा जी को उदास और चिंतित देख भगवान विष्णु ने उनसे वाग्देवी (वाणी की देवी) का आवाहन करने को कहा। तब ब्रह्माजी ने पूर्ण श्रद्धाभाव से वाग्देवी से प्रकट होने की प्रार्थना करते हुए अपने कमंडल के जल को अपनी अंजुरी में लेकर उस जल की बूंदें अभिमंत्रित कर धरती पर छिड़क दीं। ज्यों ही वे अभिमंत्रित जलबिंदु धरती पर गिरे, उसी क्षण वहां अत्यंत मनोहारी मुखमुद्रा वाली तेजस्वी देवीशक्ति प्रकट हो उठीं। शास्त्र कहता है कि श्वेतवस्त्रधारिणी उस चतुर्भुजी स्त्रीशक्ति के एक हाथ में वीणा, दूसरा हाथ वरमुद्रा में तथा अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला शोभायमान थी। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर जैसे ही उन्होंने अपनी वीणा के तारों को झंकृत किया; समूची मूक सृष्टि मुखर हो उठी।

नदियों का जल कल-कल का नाद कर उठा, पक्षी चहचहाने लगे, हवा सरसराने लगी, समस्त जीव-जंतुओं के साथ मनुष्य के कंठ से स्वर फूट उठा। समूचे जीव जगत को स्वर देने के कारण वह परम तेजस्विनी स्त्रीशक्ति सभी लोकों में मां सरस्वती के नाम से विख्यात हुईं। शास्त्र कहते हैं कि जिस दिन मां सरस्वती ने प्रकट होकर सृष्टि को स्वर का वरदान दिया था; वह शुभ तिथि माघ मास (वसंत ऋतु के शुभारंभ) के शुक्ल पक्ष की पंचमी थी। कहा जाता है कि तभी से मां सरस्वती के अवतरण की यह पावन तिथि सनातनधर्मियों द्वारा वसंत पंचमी पर्व के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

‘‘सरस्वती साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि के राम काव्य और व्यास जी के महाभारत सृजन की मूल प्रेरणा बना था।’
– स्वामी अवधेशानन्द

सरस्वती पूजा का आध्यात्मिक महात्म्य

हमारा जीवन सद्ज्ञान और विवेक से संयुक्त होकर शुभ भावनाओं की लय से सतत संचरित होता रहे, इन्हीं दिव्य भावों के साथ की गई मां सरस्वती की भावभरी उपासना हमारे अंतस को आध्यात्मिकता के सात्विक भावों से भर देती है। पद्मपुराण कहता है, ‘‘कण्ठे विशुद्धशरणं षोड्शारं पुरोदयाम्। शाम्भवीवाह चक्राख्यं चन्द्रविन्दु विभूषितम्।।’’ अर्थात् सरस्वती की साधना से कण्ठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है जिसका ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है।

इसी को शिवसंहिता में देदीप्यमान स्वर्ण वर्ष कमल की सोलह पंखुड़ियों के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इस चंद्र पर ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है। स्वामी अवधेशानन्द जी कहते हैं, ‘‘सरस्वती साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि के राम काव्य और व्यास जी के महाभारत सृजन की मूल प्रेरणा बना था।’’ वे बताते हैं कि ब्रह्मवैवर्त पुराण में योगेश्वर श्रीकृष्ण को वसंत अग्रदूत कहा गया है। इस पुराण के अनुसार सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने वसंत पंचमी के दिन ज्ञान व कला की देवी के रूप में मां सरस्वती का पूजन-अर्चन किया था।

विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर का कहना है, ‘‘हमारे जीवन से असत्य व अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर हमें सही राह पर ले जाने का बीड़ा वीणावादिनी मां ने अपने कंधों पर उठा रखा है। भारत की पवित्र धरती सदियों से विद्यार्जन और विद्यादान की पुण्यभूमि रही है। इसीलिए सभी कलावंत और स्वरसाधक सदियों से अपनी कला का शुभारंभ मां वीणापाणि की आराधना से ही करते हैं। केवल हिंदू ही नहीं, अनेक मुस्लिम संगीतज्ञों ने भी सरस्वती वंदना गाकर भारत की आध्यात्मिक विरासत का गौरवगान मुक्तकंठ से किया है।’’ देश के सरस्वती शिशु मंदिरों तो आज भी प्रतिदिन प्रात:कालीन प्रार्थना के रूप में सरस्वती वंदना का गायन किया जाता है। इतिहास साक्षी है कि कालिदास, वरदराजाचार्य और बोपदेव जैसे मूढ़ बुद्धि बालक माता सरस्वती की कृपा से ही महान विद्वान बने थे।

सरस्वती के सिद्ध मंदिर

मां सरस्वती के उपासकों ने भारत की देवभूमि में अनेक दिव्य व भव्य मंदिरों का निर्माण कराया है। इन मंदिरों में कश्मीर का शारदापीठ, कर्नाटक का शारदाम्बा मंदिर, तेलंगाना में वारंगल का श्री विद्या सरस्वती मंदिर और बासर जिले का ज्ञान मंदिर, केरल के एनार्कुलम जिले का दक्षिणा मूकाम्बिका मंदिर, मध्य प्रदेश के सतना जिले में मैहर देवी मंदिर, उत्तराखंड में बद्रीनाथ का देवी मंदिर तथा राजस्थान के पुष्कर का देवी सरस्वती मंदिर देशभर में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। बाली का सरस्वती मंदिर पूरी दुनिया में विख्यात है।

उपासना की वैश्विक व्यापकता

मत्स्य पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कंदपुराण आदि धर्मग्रंथों में मां सरस्वती की शतरूपा, शारदा, वीणापाणि, वाग्देवी, भारती, वागीश्वरी तथा हंसवाहिनी आदि नामों से महिमा मिलती है। बौद्ध ग्रंथ ‘साधनमाला’ के अनुसार सरस्वती अपने भक्तों को ज्ञान और समृद्धि देती है। तिब्बती धर्म साहित्य में देवी सरस्वती का महासरस्वती, वज्र शारदा, वज्र सरस्वती और वीणा सरस्वती आदि रूपों में वर्णन किया गया है। सरस्वती की आराधना भारत के बाहर नेपाल, श्रीलंका, चीन, थाईलैंड, जापान, इंडोनेशिया, बर्मा (म्यांमार) जैसे देशों में भी विभिन्न रूपों में होती है। प्राचीन ग्रीस (यूनान) के एथेंस नगर की संरक्षक देवी ‘एथेना’ तथा जापान की लोकप्रिय देवी ‘बेंजाइतेन’ को सरस्वती का प्रतिरूप माना जाता है। जापान में देवी ‘बेंजाइतेन’ के कई मंदिर भी हैं।

‘‘हमारे जीवन से असत्य व अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर हमें सही राह पर ले जाने का बीड़ा वीणावादिनी मां ने अपने कंधों पर उठा रखा है। भारत की पवित्र धरती सदियों से विद्यार्जन और विद्यादान की पुण्यभूमि रही है। इसीलिए सभी कलावंत और स्वरसाधक सदियों से अपनी कला का शुभारंभ मां वीणापाणि की आराधना से ही करते हैं। केवल हिंदू ही नहीं, अनेक मुस्लिम संगीतज्ञों ने भी सरस्वती वंदना गाकर भारत की आध्यात्मिक विरासत का गौरवगान मुक्तकंठ से किया है।’’– रवींद्रनाथ टैगोर

प्रतीकों का गहन तत्वदर्शन

मां सरस्वती से जुड़े प्रतीकों में गहरे शिक्षाप्रद सूत्र समाए हुए हैं। चित्रों में मां सरस्वती को कमल पर बैठा दिखाया जाता है। जिस तरह कीचड़ में खिलने वाले कमल को कीचड़ स्पर्श नहीं कर पाती ठीक उसी तरह कमल पर विराजमान मां सरस्वती हमें यह संदेश देना चाहती हैं कि हमें चाहे कितने ही दूषित वातावरण में रहना पड़े, परंतु हमें खुद को इस तरह बनाकर रखना चाहिए कि बुराई हम पर प्रभाव न डाल सके। इसी तरह मां सरस्वती का वाहन हंस नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है, जो हमें जीवन में नकारात्मकता को छोड़कर सदैव सकारात्मकता को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है। आपाधापी भरे वर्तमान समाज में मां सरस्वती के तत्वदर्शन को एक विशेष संदर्भ में देखने और समझने की आवश्यकता है। यदि हम दिशाहीनता, विषाद, अवसाद और खिन्नता से मुक्त रहना चाहते हैं तो हमें न केवल ज्ञान की सिद्धि के लिए वरन जीवन को उत्साहपूर्ण बनाए रखने के लिए भी मां सरस्वती की पूजा करनी चाहिए।

 

Topics: सरस्वती पूजासरस्वती के सिद्ध मंदिरSanatan Dharma CultureDurga SaptashatiMaa AdishaktiSaraswati Pujaमां सरस्वतीSiddha Temple of SaraswatiMaa Saraswatiसनातन धर्म संस्कृतिदुर्गा सप्तशतीमां आदिशक्ति
Share3TweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

परंपरा की पुष्टि

धार भोजशाला

भोजशाला: मंदिर घोषित होते ही गैर-हिंदुओं की एंट्री पर लगी रोक

मातृ परंपरा

भारत की मातृ परंपरा : जहां पश्चिम ने दिवस बनाया, भारत ने ‘मातृदेवो भवः’ अपनाया

1.जापान में सरस्वती को स्वर्ण रथ में सवार राक्षस का वध करने वाली भी कहा जाता है, 2. टोक्यो के ललित कला विश्वविद्यालय में 1212 ई.की आठ भुजाओं वाली सरस्वती की एक पेंटिंग रखी हुई है 3. जापान के सात शुभ देवता, एबिसु, दाइकोकु (शिव, महाकाल), बेंज़ाइटन (सरस्वती), बिशामोंटेन (वैश्रवण या कुबेर), फुकुरोक्यू, होटेल जुरोजिन हैं।

सीमाओं से परे सरस्वती

Navratri 2026

Navratri 2026: नवरात्र और आदिशक्ति: विज्ञान, अध्यात्म और नारी शक्ति का सनातन संगम

भोजशाला का विशाल परिसर

भोजशाला : मिले मंदिर के प्रमाण

Load More

ताज़ा समाचार

प्रतीकात्मक तस्वीर

बुलंदशहर: हनुमान मंदिर में नमाज पढ़ने का वीडियो वायरल, तीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज 

डॉ. चिन्मय पण्ड्या कनाडा के ओंटारियो संसद द्वारा सम्मानित, शांतिकुंज की वैश्विक पहुंच बढ़ी

Dehradun police Encounter

देहरादून: नाकेबंदी के दौरान Swift कार से बैरियर तोड़ा, पुलिस पर फायरिंग; रिंकू मीणा गोली लगने से घायल, एक गिरफ्तार

Love Jihad Islamic conversion Bhopal

भोपाल में फिर ‘लव जिहाद’: नाबालिग किशोरियों का अपहरण, दुष्कर्म और इस्लामिक कन्वर्जन का दबाव, 3 आरोपी गिरफ्तार

केरलम के सरकारी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की बड़ी लापरवाही, मरीज के सर्जिकल घाव में रेंगते मिले कीड़े

मोदी सरकार में पूर्वोत्तर बना भारत का विकास इंजन

देहरादून FRI रेंजर्स कॉलोनी की भूमि बना दी मजार, वक्फ में भी दर्ज किया पर दस्तावेज नहीं दिखा सके

US Cloude Mythos

Anthropic ने चुनिंदा भारतीय कंपनियों को Claude Mythos AI मॉडल का एक्सेस दिया, क्या होंगे फायदे?

कॉर्पोरेट जिहाद: विप्रो में भी TCS वाला पैटर्न, हिंदू महिला का इस्लामिक कन्वर्जन और ‘शेख’ से संबंध बनाने का दबाव

राष्ट्रीय पंचायत पुरस्कार: महिला नेतृत्व वाली 52 फीसदी पंचायतों को मिला सम्मान

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies