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ज्ञानवापी फैसले में अब देर नहीं

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ज्ञानवापी मुकदमे को राष्ट्रीय महत्व का मुकदमा करार दिया है। साथ ही, मुस्लिम पक्ष की सभी पांच याचिकाओं खारिज कर उच्च न्यायालय ने निचली अदालत को 6 माह में इसका निस्तारण करने का निर्देश दिया

Written byसुनील रायसुनील राय
Dec 25, 2023, 02:11 pm IST
inभारत, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति
ज्ञानवापी परिसर

ज्ञानवापी परिसर

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किए गए सर्वेक्षण को अन्य मुकदमों में भी दाखिल किया जाएगा। यदि निचली अदालत को लगता है कि किसी हिस्से का सर्वेक्षण जरूरी है, तो वह एएसआई को सर्वेक्षण करने का निर्देश दे सकती है।

काशी ज्ञानवापी का मुकदमा अब लंबा नहीं खिंचेगा। बीते दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण का कार्य पूरा हो चुका है। एक मुकदमे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किए गए सर्वेक्षण को अन्य मुकदमों में भी दाखिल किया जाएगा। यदि निचली अदालत को लगता है कि किसी हिस्से का सर्वेक्षण जरूरी है, तो वह एएसआई को सर्वेक्षण करने का निर्देश दे सकती है।

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि 32 वर्ष बीत चुके हैं, इसलिए अपीलीय न्यायालय इस मुकदमे की त्वरित गति से सुनवाई करे और अगले 6 माह में इसका निस्तारण करे। साथ ही, उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यह विवाद दो पक्षों के बीच का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का है, जो देश के दो समुदायों को प्रभावित करता है।

इसी के साथ उच्च न्यायालय ने अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी एवं उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा दाखिल सभी पांच याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि यदि कोई अंतरिम आदेश है तो उसे भी निरस्त किया जाता है। इन याचिकाओं में ज्ञानवापी परिसर में पूजा करने के अधिकार और एक मंदिर के ‘पुनर्स्थापन’ की मांग करने वाले हिंदू पक्ष के कई नागरिक मुकदमों को चुनौती दी गई थी। हिंदू पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी परिसर में 17वीं सदी में मस्जिद का निर्माण वहां पहले से मौजूद संरचना के ऊपर किया गया था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इस वर्ष 4 अगस्त से 2 नवंबर तक ज्ञानवापी परिसर का सर्वेक्षण किया था, जिसकी रिपोर्ट निचली अदालत में दाखिल कर दी गई है। हिंदू पक्ष की ओर से एएसआई की सर्वेक्षण रिपोर्ट की मांग को लेकर अदालत में प्रार्थना-पत्र दाखिल किया गया है, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने प्रार्थना-प्रत्र देकर सर्वेक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने की मांग की है। इस पर 21 दिसंबर को जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में सुनवाई होनी थी, लेकिन इसे 3 जनवरी, 2024 तक टाल दिया गया है।

क्या कहा उच्च न्यायालय ने?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पूजा स्थल अधिनियम-1991 इन नागरिक मुकदमों पर रोक नहीं लगाता। यह कानून केवल पूजा स्थल के रूपांतरण पर रोक लगाता है, लेकिन यह पूजा स्थल के पांथिक चरित्र को निर्धारित करने के लिए किसी प्रक्रिया को परिभाषित या निर्धारित नहीं करता है। मुख्य वादी ने अपनी याचिका में पूजा स्थल के ‘रूपांतरण’ की मांग नहीं की है, बल्कि ज्ञानवापी परिसर के एक हिस्से के पांथिक चरित्र के बारे में घोषणा का अनुरोध किया है। इसलिए 1991 में दाखिल मुकदमा संख्या-610 सुनवाई के योग्य है। यह नागरिक वाद पूजा स्थल अधिनियम-1991 से बाधित नहीं है, अत: इसे खारिज नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि पूजा स्थल अधिनियम-1991 इन सिविल मुकदमों पर रोक नहीं लगाता। इस अधिनियम के अंतर्गत केवल ‘रूपांतरण’ और ‘पूजा स्थल’ को परिभाषित किया गया है

उच्च न्यायालय ने कहा कि इस अधिनियम के अंतर्गत केवल ‘रूपांतरण’ और ’पूजा स्थल’ को परिभाषित किया गया है। विवादित स्थान का पांथिक स्वरूप क्या होगा, यह तो मुकदमे के पक्षकारों के साक्ष्यों के बाद ही सक्षम न्यायालय द्वारा तय किया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ज्ञानवापी परिसर में हिंदू धार्मिक चरित्र है या मुस्लिम मजहबी चरित्र है। इसमें एक ही समय में दोहरा चरित्र नहीं हो सकता। उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि अपीलीय अदालत को पक्षों की दलीलों और उसके समर्थन में दिए गए सबूतों पर विचार करते हुए असली पांथिक चरित्र का पता लगाना होगा। प्रारंभिक रूपरेखा के आधार पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता।

उच्च न्यायालय ने कहा कि यह दो अलग-अलग पक्षकारों के बीच का मुकदमा नहीं है, बल्कि मुकदमे में उठाया गया विवाद राष्ट्रीय महत्व का है। यह देश के दो प्रमुख समुदायों को प्रभावित करता है। 13 अक्तूबर, 1998 को दिए गए अंतरिम आदेश के कारण मुकदमा आगे नहीं बढ़ सका। इसलिए राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि मुकदमे को शीघ्रता से आगे बढ़ाया जाए और बिना किसी टाल-मटोल की रणनीति का सहारा लिए अत्यंत तत्परता से निर्णय लिया जाए।

मुकदमा 1991 से लंबित है और अभी तक प्रतिवादियों द्वारा लिखित बयान दाखिल करने के बाद केवल वाद बिंदु का निर्धारण ही हो पाया है। इसलिए अपीलीय अदालत मामले को शीघ्रता से आगे बढ़ाने और इस आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने की तारीख से अगले छह महीने के भीतर पूर्ण करे। यह स्पष्ट किया जाता है कि निचली अदालत किसी भी पक्ष को अनावश्यक समय नहीं देगी। वादी और प्रतिवादी भी इस मुकदमे में अनावश्यक विलंब नहीं करेंगे।

याचिकाएं खारिज होने का अर्थ

ज्ञानवापी विवाद को लेकर 1936 में दीन मोहम्मद और दो अन्य बनाम स्टेट सेकेट्री आफ इंडिया मुकदमा दाखिल हुआ था। हालांकि इस मुकदमे में कोई हिंदू पक्षकार नहीं था, लेकिन 12 गवाहों ने इस मुकदमे में स्वीकार किया था कि ज्ञानवापी मंदिर में नियमित पूजा-पाठ होता आ रहा था। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मदन मोहन यादव बताते हैं, ‘‘पूजा स्थल अधिनियम-1991 कहता है कि 15 अगस्त, 1947 के पूर्व की स्थिति बहाल रहेगी। गत 19 दिसंबर को आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय स्वागत योग्य है। उच्च न्यायालय ने यह माना है कि नागरिक वाद पूजा स्थल अधिनियम-1991 से बाधित नहीं है। दीन मोहम्मद के मुकदमे में भी यह साबित हो चुका है कि 1947 के पहले हिंदू वहां पर पूजा-पाठ कर रहे थे। पूजा-पाठ से परिसर के मूल चरित्र पर कोई फर्क नहीं पड़ता।’’

पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ. रागरंग शर्मा एवं हरिहर पाण्डेय ने ज्ञानवापी परिसर के स्वामित्व को लेकर 1991 में वाद दायर किया था। इसमें कहा गया कि 18 अप्रैल, 1669 को मुगल आक्रांता औरंगजेब ने फरमान जारी करके ज्ञानवापी मंदिर को तोड़ा था। यह पूरी संपत्ति आदि विश्वेश्वर भगवान की है। इसलिए समूचा परिसर पूरी तरह से हिंदुओं को सौंपा जाना चाहिए। कुछ वर्ष पूर्व तीनों याचिकाकर्ताओं की मृत्यु हो गई। सोमनाथ व्यास के नाती शैलेंद्र पाठक अब इस मुकदमे का पक्षकार बनने की पैरवी कर रहे हैं।

1991 में स्वामित्व को लेकर याचिका दाखिल होने के लगभग 7 वर्ष बाद 1998 में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर अपीलीय न्यायालय की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी, जिस पर स्थगनादेश दिया गया था।

हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मदन मोहन सिंह बताते हैं, ‘‘नवंबर 2018 में इस मुकदमे में नया मोड़ आया। सर्वोच्च न्यायालय ने एशियन सर्फेसिंग कंपनी के एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान निर्णय दिया कि अगर किसी स्थगनादेश का विधिसम्मत कारण नहीं है, तो वह स्थगनादेश 6 महीने के बाद स्वत: निष्प्रभावी हो जाएगा। इस निर्णय का हवाला देते हुए मैंने सिविल जज सीनियर डिवीजन, वाराणसी जनपद के न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दिया और मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। जिला अदालत ने 8 अप्रैल, 2021 को ज्ञानवापी परिसर का एएसआई से सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया, जिसे अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण के आदेश को रोक लगा दी थी। अब उच्च न्यायालय द्वारा मुस्लिम पक्ष की सभी पांचों याचिकाएं खारिज करने के बाद मुकदमे की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।’’

हिंदू पक्ष का कहना है –

सील होने के कारण वजूखाना और दो तहखानों का सर्वेक्षण नहीं हो पाया था। अब वहां के सर्वेक्षण के लिए भी न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दिया जाएगा। हिंदू पक्ष को उम्मीद है कि ज्ञानवापी परिसर के स्वामित्व को लेकर मुकदमे पर 6 माह के भीतर निर्णय आ जाएगा।

3 जनवरी पर टिकी निगाहें

इसी तरह, नवंबर 1993 को ज्ञानवापी परिसर में शृंगार गौरी की नियमित पूजा पर रोक लगाई गई थी। 2004 में हिंदू संगठनों के विरोध के बाद अदालत ने साल में एक दिन नवरात्र में चतुर्थी पर पूजा की अनुमति दी गई। 18 अगस्त, 2021 को राखी सिंह सहित 5 महिलाओं ने वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन के न्यायालय में याचिका दाखिल कर शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन के साथ परिसर में अन्य देवी-देवताओं के विग्रहों की सुरक्षा की मांग की थी। इसके बाद 26 अप्रैल, 2022 को सिविल जज सीनियर डिवीजन ने ज्ञानवापी परिसर के रकबा संख्या-9130 के लिए अजय मिश्र को अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त किया।

साथ ही, हिंदू पक्ष के प्रार्थना-पत्र पर न्यायालय ने ज्ञानवापी परिसर के अंदर वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी करा कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा। इस पर पहली बार 6 मई, 2022 को अधिवक्ता आयुक्त के साथ दोनों पक्षों ने परिसर के कुछ हिस्से का दो घंटे तक सर्वेक्षण किया। लेकिन अगले दिन 7 मई को जब टीम सर्वेक्षण करने के लिए ज्ञानवापी परिसर में पहुंची तो मुस्लिम पक्ष ने विरोध शुरू कर दिया। साथ ही, मुस्लिम पक्ष ने न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी। इसमें मुस्लिम पक्ष ने अधिवक्ता आयुक्त अजय मिश्र पर पक्षपात करने का आरोप लगाया और उन्हें हटाने की मांग की। लेकिन 12 मई को न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी।

इसके अलावा, अदालत ने अधिवक्ता विशाल सिंह को अधिवक्ता आयुक्त और अजय प्रताप सिंह को सहायक अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त कर दिया। इसके बाद कड़ी सुरक्षा में परिसर का सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी शुरू हुई। इस दौरान वजूखाने में शिवलिंग मिला। हिंदू पक्ष की याचिका पर न्यायालय ने वजूखाने को सील करने का आदेश दिया। हालांकि बाद में सर्वेक्षण रिपोर्ट लीक करने के आरोप में न्यायालय ने अजय मिश्र को अधिवक्ता आयुक्त के दायित्व से हटा दिया था।

हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मदन मोहन सिंह बताते हैं-

‘‘नवंबर 2018 में इस मुकदमे में नया मोड़ आया। सर्वोच्च न्यायालय ने एशियन सर्फेसिंग कंपनी के एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान निर्णय दिया कि अगर किसी स्थगनादेश का विधिसम्मत कारण नहीं है, तो वह स्थगनादेश 6 महीने के बाद स्वत: निष्प्रभावी हो जाएगा। इस निर्णय का हवाला देते हुए मैंने सिविल जज सीनियर डिवीजन, वाराणसी जनपद के न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दिया और मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। जिला अदालत ने 8 अप्रैल, 2021 को ज्ञानवापी परिसर का एएसआई से सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया, जिसे अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण के आदेश को रोक लगा दी थी। अब उच्च न्यायालय द्वारा मुस्लिम पक्ष की सभी पांचों याचिकाएं खारिज करने के बाद मुकदमे की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।’’

हर तरफ सनातक प्रतीक

न्यायालय में पेश अपनी रिपोर्ट में अजय मिश्र ने परिसर में सनातन धर्म से जुड़ी कई महत्वपूर्ण आकृतियां, ब्रह्मकमल, कमल, शेषनाग, स्वस्तिक, त्रिशूल तथा खंडित मूर्तियां मिलने का उल्लेख किया था। बताया जाता है कि विशाल सिंह द्वारा न्यायालय में दाखिल सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी गुंबद के भीतरी शिखर, दीवारों पर हाथी की सूंड, घंटियां तथा कथित मस्जिद की दीवारों पर संस्कृत के श्लोक मिलने का उल्लेख किया था।

मस्जिद के पिछले भाग की दीवारें नागर शैली के मंदिर की हैं। उसके वास्तुशिल्प में स्वस्तिक, ओम, कमल आदि की आकृतियां हैं। इस दृष्टि से भी देखें तो उसका भग्नावशेष पूरी तरह से मंदिर का है

बहरहाल, दोनों पक्षों की उम्मीद 3 जनवरी को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। यदि न्यायालय ने एएसआई की 1500 पृष्ठों की सर्वेक्षण रिपोर्ट हिंदू पक्ष को सौंपने का निर्णय दिया तो उससे स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि ज्ञानवापी परिसर में हिंदुओं के कौन-कौन से प्रतीक चिह्न मौजूद हैं। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मदन मोहन का कहना है कि भले ही ज्ञानवापी का मामला न्यायालय के अधीन है लेकिन 1995 के इस्माइल फारुकी बनाम यूनियन आफ इंडिया के मुकदमे में मस्जिद, मजार और कब्रिस्तान को परिभाषित किया गया है। पं. सोमनाथ व्यास तहखाने के नीचे नित्य पूजा करते थे। 1983 के उत्तर प्रदेश सरकार के काशी विश्वनाथ अधिनियम के अनुसार, पंचकोश का संपूर्ण परिक्षेत्र आदि विश्वेश्वर-काशी विश्वनाथ में समाहित है।

नवंबर 1993 तक कथित मस्जिद के पिछले हिस्से में स्थित शृंगार गौरी की नित्य पूजा होती रही है। कथित मस्जिद के पिछले भाग की दीवारें नागर शैली के मंदिर की हैं। उसके वास्तुशिल्प में स्वस्तिक, ओम, कमल आदि की आकृतियां हैं। इस दृष्टि से भी देखें तो उसका भग्नावशेष पूरी तरह से मंदिर का है। किसी भी दृष्टि से ज्ञानवापी में मस्जिद नहीं है।

हिंदू पक्ष का कहना है कि सील होने के कारण वजूखाना और दो तहखानों का सर्वेक्षण नहीं हो पाया था। अब वहां के सर्वेक्षण के लिए भी न्यायालय में प्रार्थना-पत्र दिया जाएगा। हिंदू पक्ष को उम्मीद है कि ज्ञानवापी परिसर के स्वामित्व को लेकर मुकदमे पर 6 माह के भीतर निर्णय आ जाएगा।

Topics: स्वस्तिकधिवक्ता विशाल सिंह को अधिवक्ता आयुक्त और अजय प्रताप सिंह. सर्वोच्च न्यायालयGyanvapi verdictAdvocate Vishal Singh as Advocate Commissioner and Ajay Pratap Singh. Supreme Courtओमकमलभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभागहिंदू पक्षHindu sideArchaeological Survey of India
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पाञ्चजन्य ब्यूरो चीफ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश [Read more]
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