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होम भारत

कनाडा या खालिस्तानियों का अड्डा!

एक खालिस्तानी वांछित आतंकवादी की हत्या का दोष भारत पर मढ़ने की कोशिश करने कनाडा की जस्टिन ट्रूडो सरकार ने वहां रह रहे खालिस्तान समर्थकों की खुशामद भले ही कर ली हो, लेकिन अपने देश को भारत की नजरों से काफी लंबे समय के लिए गिरा भी दिया है

Written byआर.एस.एन. सिंहआर.एस.एन. सिंह
Sep 26, 2023, 06:41 pm IST
in भारत

कनाडा में रह रहे ऐसे खालिस्तानी तत्त्वों के बारे में खुद ट्रूडो के स्तर पर शिकायत कई बार दर्ज कराई जा चुकी थी। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी यह बात ट्रूडो के साथ उठाई थी। उन्होने ट्रूडो को ‘मोस्ट वांटेड’ लिस्ट सौंपी थी, जिसमें निज्जर का नाम प्रमुख था।

अभी हाल में भारत के एक कूटनीतिज्ञ पवन कुमार राय को कनाडा की जस्टिन ट्रूडो सरकार ने देश से निष्कासित कर दिया। उन पर यह आरोप लगाया गया कि वह एक हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून 2023 को हुई हत्या के षड़यंत्र में शामिल थे। निज्जर खालिस्तानी आतंकवादी और खालिस्तानी टाइगर फोर्स का नेता था। वह भारत में कई हत्याओं के लिए जिम्मेदार था। यहां तक कि वह पैराग्लाइडर से भारत के अंदर गोला-बारूद भेजने की योजना बना रहा था। कनाडा में रह रहे ऐसे खालिस्तानी तत्त्वों के बारे में खुद ट्रूडो के स्तर पर शिकायत कई बार दर्ज कराई जा चुकी थी। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी यह बात ट्रूडो के साथ उठाई थी। उन्होने ट्रूडो को ‘मोस्ट वांटेड’ लिस्ट सौंपी थी, जिसमें निज्जर का नाम प्रमुख था।

जालंधर के रहने वाले हरदीप सिंह निज्जर ने पहली बार 1997 में कनाडा जाने की कोशिश की थी। इसके लिए उसने कहानी रची कि वह और उसका परिवार भारतीय तंत्र की प्रताड़ना का शिकार है, उसके पिता और चाचा को पुलिस ने बुरी तरह पीटा है, इत्यादि। इस किस्से का आव्रजन प्राधिकारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। फिर वह एक कनाडाई नागरिक महिला को अपनी पत्नी बताकर फिर प्राधिकारियों के सामने पेश हुआ। अधिकारियों ने पाया कि यह महिला पहले ही विवाहित है। लेकिन अंतत: 2007 में वह कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में कामयाब हो गया।

ट्रूडो एक ऐसे फरेबी और अपराधी व्यक्ति के लिए, जिसका नाम इंटरपोल में दर्ज है, भारत सरकार से संबंध तोड़ने पर तुले हुए हैं। आखिर कौन सी मजबूरी है? कहीं वह ब्लैकमेल तो नहीं हो रहे हैं?

निश्चित रूप से वह ब्लैकमेल ही हो रहे हैं। अगर कनाडा की संसद की संरचना देखी जाए, तो इसमें 338 सीटें हैं, जिसमें ट्रूडो की लिबरल पार्टी के 157 सदस्य हैं, कंजर्वेटिव पार्टी के 121 और न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के 24 सदस्य हैं। एनडीपी का मुखिया एक जगमीत सिंह धालीवाल है, जो खालिस्तानियों का भी सरगना है। एनडीपी के समर्थन से ही ट्रूडो की सरकार टिकी हुई है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि कनाडा की सरकार खालिस्तानी चला रहे हैं।

हाल ही में जब भारत के पंजाब में अमृतपाल सिंह के खिलाफ मुहिम चली तब जगमीत सिंह बेचैन होकर ट्रूडो के पास गए और उनसे भारत द्वार मानव अधिकारों का हनन का मुद्दा बनाकर हस्तक्षेप करने को कहा।

2018 में भी ट्रूडो ने भारत की यात्रा की थी और उनका स्वागत बहुत ठंडे तरीके से किया गया। वास्तव में भारत उनके खालिस्तानीपरस्त रवैये से बहुत क्षुब्ध था। इससे ट्रूडो को काफी झटका लगा था। उन्होंने खालिस्तान को लेकर अपनी नीति में परिवर्तन का संकेत दिया। कनाडा सरकार ने देश की सुरक्षा को लेकर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें ‘खालिस्तानी उग्रवाद’ को खतरा बताया गया। इसको लेकर खालिस्तानी राजनेताओं ने भारी हंगामा किया और ट्रूडो ने उस रिपोर्ट को वापस ले लिया।

ट्रूडो की भारत से नफरत खानदानी है। इनके पिता पियरे ट्रूडो भी प्रधान मंत्री थे और भारत के प्रति नफरत से भरे हुए थे। उनकी नफरत का कारण भारत का 1974 का पहला परमाणु परीक्षण था। उनका मानना था कि भारत ने कनाडा से प्राप्त कैन्डू रिएक्टरों को शांतिपूर्ण उद्देश्य के बजाए सैन्य प्रयोजन के लिए प्रयोग किया। यह वह दौर था, जिसमें खालिस्तानी उग्रवाद पनप रहा था। पाकिस्तान और उसका सुरक्षा तंत्र1971 के भारत-पाक युद्ध में हार के बाद से, भारत को सबक सिखाना चाहता था। दोनों ने मिलकर खालिस्तानी अलगाववाद को खूब हवा दी। ब्रिटेन और कनाडा इस मुहिम का हिस्सा बन गए। फिर जब जिया उल हक ने पाकिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया, तो भारत के सिखों की तीर्थयात्रा के लिए अपने दरवाजे खोल दिये।

धीरे- धीरे ये तीर्थ स्थल आईएसआई द्वारा खालिस्तान उग्रवाद के लिए भर्ती केंद्र बना दिए गए। इन तीर्थस्थानों पर पश्चिम में बसे सिखों का भी आवागमन शुरू हो गया। भारत के छंटे हुए खालिस्तानी आतंकवादी और अपराधी पाकिस्तान के जरिए कनाडा जाने लगे। वहां पहुंचकर ये अपने आपको राजनीतिक रूप से पीड़ित जताकर सहानुभूति बटोरना चाहते थे। कनाडा की नीतियां ऐसी रही हैं कि वहां हर अपराधी तत्व को मानव अधिकारों के नाम पर आश्रय मिल जाता था और फिर उनका दर्जा नागरिकता में परिवर्तन हो जाता है। ऐसे तत्वों का फिर वहां के गुरुद्वारों पर कब्जा होने लगा, और गुरुद्वारों से बटोरे पैसे से खालिस्तान उग्रवाद ने और उग्र रूप धारण कर लिया। भारी पैसा और मजबूत सरकारी संरक्षण ने उनमें एक अजेयता की भावना पैदा कर दी। कनाडा खालिस्तानी उग्रवाद का मुख्य केंद्र बन गया।

इस अजेयता की भावना ने पश्चिम, खासकर कनाडा के खालिस्तानियों को, आईएसआई और चीन से मिलकर भारत के पंजाब की राजनीति में एक बड़ी भूमिका के लिए प्रेरित किया। एक राजनीतिक पार्टी के फायदे के लिए पैसा बरसने लगा। इस पार्टी के समर्थन में जहाज भर-भर के खालिस्तानी कनाडा से चुनाव के समय आए थे। इन्हीं खालिस्तानियों और कनाडा के पैसे से 2021 में कथित किसान आंदोलन चलाया गया। लाल किले पर भारत के झंडे का खस्लिस्तानियों ने अपमान किया। उस समय ट्रूडो ने वक्तव्य दिया कि वह भारत में किसानों और उनके परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कथित किसानों द्वारा दिल्ली की नाकाबंदी और घेराबंदी जायज लोकतांत्रिक तरीका है, परंतु कुछ ही महीने बाद, फरवरी 2022 में, कनाडा के ट्रक चालकों ने, 2700 ट्रकों से कोविड नीति का विरोध करते हुए ओटावा शहर को आर्थिक रूप से ठप्प कर दिया, तब ट्रूडो ने इसे अलोकतांत्रिक बताकर आपातकाल की घोषणा कर दी।

कथित किसान आंदोलन की पूरी योजना और षड़यंत्र खालिस्तानियों और कनाडा सरकार के मिलीभगत से प्रायोजित थी। वह भी मूलत: दाल के कारण। कनाडा दो दशक से भारत का सबसे बड़ा दाल निर्यातक था। मोदी सरकार की नई कृषि नीति के तहत भारत अपने ही देश में दाल उत्पादन कर आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रहा था। इस कथित किसान आंदोलन से भारत का 77,000 करोड़ रुपये का नुक्सान होने का आकलन है। इसी के संदर्भ प्रधानमंत्री के लिए फिरोजपुर में हिंसक खतरा पैदा करने की कोशिश भी थी। क्या सबके लिए ट्रूडो जिम्मेदार नहीं हैं?

खालिस्तानियों के संदर्भ में, भारत के खिलाफ, पाकिस्तान और कनाडा का सहयोग और षड़यंत्र एक स्थापित तथ्य है। कई ऐसे आरोप और संकेत हैं कि 2019 के कनाडा के चुनावों में ट्रूडो के समर्थन में चीन ने भारी पैसा लगाया था। इस आरोप से ट्रूडो तभी बाहर निकल सके, जब इस मुद्दे पर उन्हें जगमीत सिंह धालीवाल का समर्थन प्राप्त हुआ। खालिस्तानी उग्रवाद और अलगाववाद के मुद्दे पर कनाडा, पाकिस्तान और चीन के बीच आपस में घनिष्ठ सहयोग की धुरी भी यही है।

लेखक – कर्नल (सेवानिवृत्त) आर.एस.एन. सिंह

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