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कुटिल प्रश्न, निर्मम उत्तर

नए भवन में संसद सत्र को लेकर कांग्रेस आलाकमान ने अपनी बेचैनी पत्र लिखकर उजागर कर दी। पत्र सार्वजनिक करके सस्ती राजनीति करने की भी कोशिश की गई, लेकिन कांग्रेस ने शायद कल्पना नहीं की होगी कि उसे ऐसा निर्मम उत्तर मिलेगा कुटिल प्रश्न, निर्मम उत्तर

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 12, 2023, 11:59 am IST
in भारत, विश्लेषण

भारत की अपनी संस्कृति और अपनी वस्तु पर आधारित भारत की स्वनिर्मित संसद में पहला सत्र शुरू होने जा रहा है। इस सत्र को लेकर विपक्ष की बेचैनी भी देखने लायक है। इस बेचैनी के कारण कांग्रेस की आलाकमान श्रीमती सोनिया गांधी को सार्वजनिक तौर पर ऐसी उलाहना मिली है, जिसकी हकदार शायद वह बहुत पहले से थीं।

भारत के विपक्ष की छटपटाहट देखने लायक है। भारत के विपक्ष की समस्या सिर्फ यह नहीं है कि जी20 जैसा भव्य आयोजन इतनी सफलता के साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थान पर कैसे और क्यों हो सका है। विपक्ष की एक और परेशानी यह है कि भारत अब ‘इंडिया’ शब्द के बजाय भारत शब्द की ओर क्यों बढ़ रहा है। विपक्ष की तीसरी समस्या यह है कि सनातन को चुनौती देने की अपनी नियमित किस्म की राजनीति करने पर उसे इतनी भारी प्रतिक्रिया का सामना क्यों करना पड़ रहा है। न उससे निगलते बन रहा है, न उगलते। लेकिन चौथी समस्या भी इतनी ही गंभीर है। वह यह कि भारत की अपनी संस्कृति और अपनी वस्तु पर आधारित भारत की स्वनिर्मित संसद में पहला सत्र शुरू होने जा रहा है। इस सत्र को लेकर विपक्ष की बेचैनी भी देखने लायक है। इस बेचैनी के कारण कांग्रेस की आलाकमान श्रीमती सोनिया गांधी को सार्वजनिक तौर पर ऐसी उलाहना मिली है, जिसकी हकदार शायद वह बहुत पहले से थीं।

18 सितम्बर से संसद का विशेष सत्र शुरू होने जा रहा है। सभी मान कर चल रहे हैं कि इसमें कुछ न कुछ विशेष होगा। विशेष क्या हो सकता है, इसे लेकर विपक्ष का बेचैन होना भी समझा जा सकता है। कम से कम इतना विशेष तो है ही कि यह नए भवन वाली संसद होगी। लेकिन संसद में प्रधानमंत्री मोदी क्या कहेंगे, सदन का एजेंडा क्या होगा, इसे लेकर विपक्ष की आशंकाएं किसी प्रलय जैसी हैं। सत्र आहूत होने की सूचना आने पर सोनिया गांधी ने गठबंधन के सभी सहयोगियों के साथ अपने घर पर लगातार बैठकें कीं। माना जा सकता है कि दशकों तक सत्ता में रही कांग्रेस को सरकार के तंत्र में मौजूद अपने पूर्व कृपापात्रों में से किसी से कोई सुराग या कोई संकेत नहीं मिल सका।

इसका सीधा सा अर्थ यह भी है कि संसद सत्र की कार्यसूची को लेकर प्रधानमंत्री ने पूरी गोपनीयता सुनिश्चित रखी। इतनी अधिक गोपनीयता से यह संभावना और अधिक हो जाती है कि कुछ बड़ा होना तय है। विपक्ष, खासतौर पर कांग्रेस और कांग्रेस में भी खासतौर पर उसकी आलाकमान यह जानने के लिए बेहद बेताब रहीं। इरादा स्पष्ट था। सरकार की कार्यसूची का अंदाज हो, तो किसी भी तरह का अड़ंगा लगाने की कार्यवाही शुरू की जा सके। जब कोई अनुमान काम नहीं आया तो कांग्रेस ने सोचा कि अगर सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री को पत्र लिखें और एजेंडे की जानकारी मांगें, तो रोबोटतुल्य प्रधानमंत्री की तरह मोदी भी दौड़ कर जवाब देने के लिए बाध्य होंगे।

कांग्रेस की आलाकमान ने अपना पत्र सार्वजनिक रूप से जारी करके आला दर्जे की चतुराई का प्रदर्शन करने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन उन्होंने शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि उत्तर भी सार्वजनिक कर दिया जाएगा।

लेकिन यह चाल चलने से सोनिया गांधी को क्या हासिल हुआ? एक करारा जवाब… वास्तव में जवाब में यह बताया गया कि सोनिया गांधी द्वारा लिखा गया पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय के कूड़ेदान में फेंके जाने योग्य था और इसे वहीं डाल भी दिया गया था। औपचारिकता पूर्ति के लिए संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र का उत्तर दिया।

यह एक रोचक पक्ष है। यूपीए की सरकार के दौरान कांग्रेस के सांसद रहते हुए एस.एस. अहलूवालिया ने सोनिया गांधी को पत्र लिखा था। उसका कोई उत्तर उन्हें नहीं मिला। इस पर एस.एस. अहलूवालिया ने वही पत्र इटैलियन में लिखवा कर भेजा। वह बात पुरानी है। अब देखिए। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र अंग्रेजी में लिखा और तुरंत ही उसे सार्वजनिक भी कर दिया। सोनिया गांधी को पत्र का उत्तर तो मिला, लेकिन हिंदी में। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जो चाल चली थी, वह उसके उत्तर से कई गुना उल्टी पड़ गई। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने अपने उत्तर में लिखा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आप हमारे लोकतंत्र के मंदिर संसद के कामकाज का राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही हैं और जहां कुछ भी नहीं है, वहां अनावश्यक विवाद पैदा कर रही हैं।

जोशी से पत्र में आगे कहा, ‘‘जैसा कि आपको विदित है, संसद सत्र अनुच्छेद 85 के तहत संवैधानिक जनादेश के अनुपालन में नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं, जिसमें प्रावधान है कि राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को ऐसे समय और स्थान पर बुला सकते हैं जैसा वह उचित समझते हैं।’’ अर्थ यह कि क्या आप संसदीय परंपराओं या राष्ट्रपति द्वारा सत्र बुलाने के नियमों को भी नहीं जानतीं? सोनिया गांधी ने यह उत्तर स्वयं अपनी ओर से पहल करके अर्जित किया है। प्रह्लाद जोशी ने लिखा है कि आपने अपने पत्र में जो 9 बिन्दु उठाए हैं, वे सभी कुछ दिन पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान (आप लोगों द्वारा) उठाए गए थे और सरकार द्वारा उन पर जवाब भी दिया गया था। अर्थात यह कि आपके यह 9 बिन्दु सिर्फ कोरी बयानबाजी हैं।

कांग्रेस ने अथवा उसकी आलाकमान ने संभवत: कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि उसे उसके आचरण के बारे में इतनी बेरहमी से दर्पण दिखा दिया जाएगा। यह प्रकरण खुद कांग्रेस के लिए एक सबक है। 1991 में, जब कांग्रेस नेताओं का बारी-बारी से अपमान करके एक व्यक्ति को ‘पूरी पार्टी से ऊपर’ स्थापित करने का तमाशा किया जा रहा था, यदि तभी कांग्रेस में कुछ लोगों ने साहस दिखाया होता, तो न केवल कांग्रेस निखर कर सामने आती, बल्कि उसकी आलाकमान भी हमेशा नकारात्मक राजनीति करने का साहस न जुटा पातीं।

तीसरा बिन्दु। कांग्रेस की आलाकमान ने अपना पत्र सार्वजनिक रूप से जारी करके आला दर्जे की चतुराई का प्रदर्शन करने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन उन्होंने शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि उत्तर भी सार्वजनिक कर दिया जाएगा। अगर चरम चतुराई का बिन्दु यह रहा हो कि प्रधानमंत्री की ओर से आने वाले उत्तर में सोनिया गांधी के लिए ‘भवदीय’ अथवा ‘आपका विश्वासी’ जैसे संबोधन होंगे, तो इससे पुन: वैसा ही कुछ हासिल किया जा सकेगा, जैसा संसद में प्रधानमंत्री के जबरन गले पड़ने के दौरान कांग्रेस के युवराज ने प्राप्त करने का प्रयास किया था। स्वयं सोनिया गांधी ने पत्र ‘डियर प्राइममिनिस्टर’ को संबोधित किया था। प्रह्लाद जोशी ने उसी भाषा में उत्तर दिया। ‘आपका’ प्रह्लाद जोशी।

पत्र का समय भी उतना ही रोचक है। भारत ने विशेष रूप से जी20 के लिए दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियम (भारत मंडपम) का निर्माण किया है, ताकि भारत की शक्ति दिखाई जा सके और विश्व में भारत का प्रचार हो सके। जवाब में पश्चिमी मीडिया के सदा-संदिग्ध अखबारों ने वही खटराग शुरू कर दिया कि मोदी तानाशाह हैं। अब पुन: एक बार देखें कि सोनिया गांधी के पत्र का मजमून क्या था। क्या यह पश्चिम के सदा-संदिग्ध मीडिया के कांग्रेस के साथ गहरे तालमेल का एक और प्रमाण नहीं है? प्रमाण और भी हैं।

भारत के जी20 शिखर सम्मेलन पर लंदन गार्जियन ने अपने संपादकीय में लिखा है कि नरेंद्र मोदी एक अधिनायकवादी व्यक्ति हैं, जिन्होंने 2014 से भारत के प्रधानमंत्री के रूप में, अपने देश को ‘वास्तविक जातीय लोकतंत्र’ बनने के लिए प्रेरित किया है, जिसमें हिंदू राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित करते हैं, और गैर-हिंदुओं को दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाता है। अब देखिए विपक्ष का ‘सनातन को मिटाने’ का राग। सुर और ताल का संगम भारत का विपक्ष और लंदन का गार्जियन। लेकिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने भी वही कर दिया, जो भारत में प्रह्लाद जोशी ने किया। ऋषि सुनक ने भारत की विश्व नेतृत्वकारी स्थिति और इसमें प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका और कद को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें एक गौरवान्वित हिंदू होने पर गर्व है। अब बताइये?

Topics: भारत मंडपमवास्तविक जातीय लोकतंत्रलंदन गार्जियनरोबोटतुल्य प्रधानमंत्रीअपनी संस्कृति और अपनी वस्तु
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