भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, जहां गैर हिंदुओं का प्रवेश है वर्जित, शिव और हरि की एक साथ होती पूजा
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भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, जहां गैर हिंदुओं का प्रवेश है वर्जित, शिव और हरि की एक साथ होती पूजा

भुवनेश्वर के प्राचीन मंदिरों में से एक लिंगराज मंदिर है, जहां भगवान शिव और विष्णु के एक साथ दर्शन कर भक्तों का जीवन सफल हो जाता है।

Written byMasummba ChaurasiaMasummba Chaurasia
May 14, 2023, 02:25 pm IST
in भारत, यात्रा

भुवनेश्वर में देवों के देव महादेव का एक ऐसा मंदिर मौजूद है, जहां गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन मात्र से ही भक्तों का जीवन सफल हो जाता है। यह मंदिर भारत के ओडिशा राज्य की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है। जिसका नाम लिंगराज मंदिर है। यह भुवनेश्वर का मुख्य मंदिर है, और इस नगर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। यह भगवान त्रिभुवनेश्वर यानि भगवान शिव को समर्पित है। यहां भगवान विष्णु की मूर्ति भी मौजूद है। लिंगराज मंदिर को भारत में एकमात्र मंदिर माना जाता है, जहां भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की एक साथ पूजा होती है। यहां हर साल लाखों की संख्या में भक्त अपने अराध्य के दर्शन के लिए आते हैं।

लिंगराज मंदिर में भगवान शिव और विष्णु है विराजमान
हिंदुओं की आस्था का केंद्र लिंगराज मंदिर जहां भगवान शिव और हरि दोनों की पूजा की जाती है। यहां शिवलिंग ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। इस मंदिर का प्रांगण 150 मीटर वर्गाकार में फैला हुआ है। जिसकी 40 मीटर की ऊंचाई पर कलश लगाया गया है। इस मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति विराजमान हैं। इस मंदिर का प्रथम गर्भगृह देवुल और दूसरा भाग जगमोहन कहलाता है। मंदिर के परिसर में भगवान कार्तिकेय, भगवान गणेश तथा माता गौरी के मंदिर भी बने हुए हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण बलुआ बत्थर से किया गया है। इस मंदिर में लगभग 100 से ज्यादा छोटे-छेटे मंदिर बने हुए हैं। लिंगराज मंदिर का मुख पूर्व दिशा की ओर है, जिसका निर्माण बलुआ पत्थर और लेटराइट से किया गया है। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है जबकि उत्तर और दक्षिण में अन्य छोटे प्रवेश द्वार हैं।

क्यों प्रसिद्ध है मरीची कुंड ?
इस मंदिर के दायीं ओर एक छोटा सा कुआं है, जिसे मरीची कुंड के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस कुंड के पानी से स्‍नान करने से संतान से जुड़ी परेशानियां दूर हो जाती हैं। मंदिर की ऊंचाई 55 मीटर है, जिसके चार मुख्य भाग है, जिन्हें गर्भगृह, यज्ञशाला, भोग मंडप और नाट्यशाला के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि लिंगराज मंदिर से होकर एक नदी गुजरती है। इस नदी के पानी से ही मंदिर का बिंदुसार सरोवर भर जाता है और इस सरोवर में मनुष्य के स्नान करने से शारीरिक और मानसिक बीमारियां दूर हो जाती हैं।

लिंगराज मंदिर की बनावट और कलाकृतियां
लिंगराज मंदिर की बनावट और कलाकृतियां इतनी आकर्षक हैं, कि यहां का नजारा देखते ही बनता है। इस मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में राजा जाजति केशती द्वारा बनवाया माना जाता है। इस मंदिर की खास बात यह है, कि यहां केवल हिंदू धर्म से जुड़े लोगों को ही प्रवेश दिया जाता है। यहां प्रतिदिन 6 हजार लोग लिंगराज के दर्शन करने के लिए आते हैं। इसी के साथ लिंगराज मंदिर को भारत में एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है जहां भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की एक साथ पूजा होती है। हर साल एक बार लिंगराज की छवि को बिंदु सागर झील के केंद्र में जलमंदिर तक ले जाया जाता है। कहा जाता है कि यहां मां पार्वती ने लिट्टी और वसा नाम के दो राक्षसों का वध किया था, और लड़ाई के बाद जब उन्हें प्यास लगी तो भगवान शिव ने यहां पर एक कुएं का निर्माण कर सभी नदियों का आवाहन किया था।

कैसे पहुंचे लिंगराज मंदिर ?
बिजू पटनायक एयरपोर्ट भुवनेश्वर शहर के केंद्र में स्थित है। जहां से कई शहर जैसे नई दिल्ली, हैदराबाद, मुम्बई, कोलकाता और बैंगलोर से फ्लाइट आती-जाती रहती हैं। एयरपोर्ट पहुंचने के बाद कैब या ऑटो करके आसानी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं। वहीं भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन भारत के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। आप ट्रेन से सफर करके भुवनेश्वर स्टेशन पहुंचने के बाद ऑटो या कैबसे मंदिर पहुंच सकते हैं, इसके अलावा सड़क द्वारा भी आसानी से पहुंचा जा सकता है। शहर में निजी और सार्वजनिक बस सेवाएं उपलब्ध हैं, जो राज्य और राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलती हैं। जिससे आप आसानी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

 

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