उत्तराखंड की महान विभूतियां : आजाद हिंद फौज को देशभक्ति की कदम ताल देने वाले कैप्टन रामसिंह
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उत्तराखंड की महान विभूतियां : आजाद हिंद फौज को देशभक्ति की कदम ताल देने वाले कैप्टन रामसिंह

अनेक सम्मानों से विभूषित राम सिंह कहा करते थे- "जिस छाती पर नेता जी के हाथों से तमगा लगा हो, उस छाती पर और मेडल फीके ही लगते हैं"

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो
Apr 16, 2023, 04:47 pm IST
inउत्तराखंड

पिथौरागढ़ । गीत–संगीत सबकी चेतना में बचपन से रहते हैं, हम सभी बाल-सभाओं से लेकर प्रभात फेरियों में देशभक्ति के गीतों को गाते रहे हैं। इन राष्ट्रवादी गीतों और तरानों ने सबको देश-दुनिया देखने का विस्तृत नजरिया दिया था। एक विशेष गीत सभी प्रार्थना-सभा में गाया जाता हैं, बेहद राष्ट्रवादी मधुर संगीत के साथ जोश दिलाने वाले इस गीत को हम कदम-ताल मिलाकर गाते थे वह गीत था-

“कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गाये जा/ये जिन्दगी है कौम की तू कौम पै मिटाये जा” 

उन दिनों अन्तरविद्यालयी प्रतियोगिताएं होती थी, जो क्षेत्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक अलग-अलग चरणों में होती थी। उसमें भी विशेष रूप से एक प्रतियोगिता थी- “राष्ट्र-गान गायन प्रतियोगिता” तब किसी को भी पता नहीं था कि जिन गीतों की धुनों से रचनात्मकता का रास्ता निकलता हैं, उन देशप्रेम से रचे–बसे गीतों–धुनों के रचनाकार वास्तव में कैप्टन रामसिंह हैं।

जन्म – 15 अगस्त सन 1914 धर्मशाला, चिलगाड़ी, हिमाचल प्रदेश.
देहावसान – 15 अप्रैल सन 2002 लखनऊ, उत्तर प्रदेश.

आजाद हिन्द फौज के सिपाही और संगीतकार कैप्टन राम सिंह मूलतः पिथौरागढ़ जनपद के मूनाकोट गांव के मूल निवासी थे। उनके दादा जमनी चंद सन 1890 के समयकाल में हिमाचल प्रदेश में जाकर बस गये थे। 15 अगस्त सन 1914 को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के पास चिलगाडी नामक स्थान पर राम सिंह का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम दिलीप सिंह था। राम सिंह बचपन से ही संगीत प्रेमी थे, उनका संगीत का सफर प्रकृति प्रदत्त था। राम सिंह बचपन में जानवरों के सींग से संगीत के सुर निकालते थे। संगीत की प्रेरणा वास्तव में उनको नाना नथु चंद से मिली थी। सन 1927 में उन्होंने मिडिल पास किया था। राम सिंह चौदह वर्ष की आयु में ही गोरखा ब्वाय कम्पनी में भर्ती हो गये थे। वहीं उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार हैडसन और डेनिश से संगीत की बारीकियां सीखी थी। पश्चिमोत्तर प्रांत में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय देकर किंग जार्ज-5 मेडल प्राप्त किया था। अगस्त सन 1941 में वे ब्रिटिश सिपाही के रूप में इपोह भेजे गये थे। विश्व प्रसिद्ध पर्ल हार्बर पर जापानी हमले के समय उन्हें जापानियों द्वारा बन्दी बना लिया गया था। जुलाई सन 1942 में इन्हीं युद्ध बन्दियों से बनी आजाद हिन्द फौज में राम सिंह भी सिपाही के रूप में नियुक्त हो गये थे। सन 1944 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें दो स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था। आजाद हिन्द फौज से पहले वह युद्धबंदियों के बीच गीत-संगीत के माध्यम से बहुत लोकप्रिय हो गए थे। नेताजी सुभाषचंद्र बोस जब 3 जुलाई सन 1943 में सिंगापुर पहुंचे तो रामसिंह ने उनके स्वागत में एक गीत तैयार किया था –

“सुभाष जी, सुभाष जी, वो जाने हिन्द आ गये,
है नाज जिस पै हिन्द को, वो जाने हिन्द आ गये”

पहली ही मुलाकात में नेताजी सुभाष चंद्र बोस रामसिंह से बेहद प्रभावित हुये थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने रामसिंह को तब एक वायलिन भेंट किया था। इस वायलिन को रामसिंह ने मृत्युपर्यंत अपने पास ही रखा था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें आजाद हिन्द फौज के लिये प्रेरणादायक, जोशीले और सैनिकों में वीरता का भाव भरने वाले गीत रचने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसी मुलाकात से रामसिंह का गीत-संगीत का सफर शुरू हुआ और तब उन्होंने एक धुन की रचना की – “कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गाये जा”। इसके बाद तो सैकड़ों देशप्रेम से ओतप्रोत गीतों की धुनें उनके द्वारा रचित हुई थी। रामसिंह सन 1945 में रंगून में गिरफ्तार कर लिये गये जिसके लगभग एक वर्ष बाद 11 अप्रैल सन 1946 को उनकी रिहाई संभव हुई। रामसिंह ने 20 जून सन 1946 को दिल्ली के बाल्मीकि भवन में महात्मा गांधी को एक गीत सुनाया, यह गीत रवीन्द्रनाथ टैगोर के “जन-गण-मन” का हिन्दी अनुवाद था- “शुभ सुख चैन की बरखा बरसे” इसे कुछ संशोधनों के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने सलाहकारों के साथ मिलकर लिखा था, इस गीत धुन भी रामसिंह ने ही बनाई थी। “क़ौमी तराना” नाम से यह गीत बाद में आजाद हिंद फौज का राष्ट्रीय गीत बना था। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात इसी धुन का प्रयोग हमारे राष्ट्र-गान ‘जन-गण-मन’ के लिये किया गया हैं। कैप्टन रामसिंह ही वास्तव में राष्ट्र-गान की धुन के रचयिता हैं। 15 अगस्त सन 1947 को जब भारत देश आजाद हुआ तो कैप्टन रामसिंह के नेतृत्व में बैंड ने लालकिले पर “शुभ सुख चैन की बरखा बरसे” की धुन बजाई थी। अगस्त सन 1948 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के अनुरोध पर वह उत्तर प्रदेश पीएसी में सब इंस्पेक्टर के रूप में लखनऊ आये और पीएसी के बैण्ड मास्टर बन गये। 30 जून सन 1974 को वे सेवानिवृत्त हो गये और उन्हें आजीवन पीएसी के संगीतकार का मानद पद दिया गया था।

कैप्टन राम सिंह ने जीवन के अंतिम समय तक लखनऊ की पी.ए.सी.कालोनी में निवास किया था। लखनऊ के वायरलेस चौराहे से सुबह–शाम गुजरते समय वायलिन पर मार्मिक धुनें अक्सर सुनाई देती रहती थी। कैप्टन राम सिंह ने कई पहाड़ी धुनें भी बनाई गईं थी जैसे – “नैनीताला-नैनीताला…घुमी आयो रैला”। नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा भेंट किया गया वायलिन उन्हें बेहद प्रिय था, वह कहते थे – “बहुत जी लिया, अब तो यही इच्छा है कि जब मृत्यु आए तो यह वायलिन ही मेरे हाथ में हो”। कैप्टन राम सिंह को किंग जार्ज-5 मेडल सन 1937, नेताजी स्वर्ण पदक सन 1943, उत्तर प्रदेश राज्यपाल स्वर्ण पदक प्रथम सन 1956, ताम्रपत्र सन 1972, राष्ट्रपति पुलिस पदक सन 1972, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरुस्कार सन 1979 और सिक्किम सरकार का प्रथम मित्रसेन पुरस्कार सन 1993 जैसे अनेक उत्कृष्ट सम्मान पुरस्कार मिले थे। अनेक सम्मानों से विभूषित राम सिंह कहा करते थे- “जिस छाती पर नेता जी के हाथों से तमगा लगा हो, उस छाती पर और मेडल फीके ही लगते हैं”। 15 अप्रैल सन 2002 को इस महान संगीतकार का देहावसान हो गया।

Topics: आजाद हिंद फौजAzad Hind Faujउत्तराखंड की महान विभूतिGreat personalities of Uttarakhandकैप्टन रामसिंहकौन है संगीतकार कैप्टन रामसिंहCaptain Ramsinghwho is composer Captain Ramsingh
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