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दिवालिया हो रहा पाकिस्तान, मुस्लिम देशों तक के कन्नी काटने के बाद, अब सरकारी कंपनियां बेच रहा इस्लामी देश

यूएई, आईएमएफ और तमाम मुस्लिम देशों के ठेंगा दिखाने के बाद शाहबाज के पास कंगाली को फिलहाल टालने का बस यही एक रास्ता

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Jul 26, 2022, 12:00 pm IST
in विश्व
शाहबाज सरकार की सरपरस्ती में तेजी से ढह रही है पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

शाहबाज सरकार की सरपरस्ती में तेजी से ढह रही है पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

पाकिस्तान तेजी से कंगाली की तरफ बढ़ रहा है। जैसा कि ​दो दिन पहले वहां के पूर्व गृहमंत्री शेख रशीद ने ट्वीट किया था कि ‘वक्त कम बचा है, पाकिस्तान को बचाना है तो बचा लो’। शाहबाज सरकार का नया कदम ठीक इसी तरफ इशारा कर रहा है, हालांकि सरकार अब भी वस्तुस्थिति को स्वीकारने को तैयार नहीं दिखती। लेकिन अब बड़ी सरकारी कंपनियों को पैसे वालों को बेचने का कदम कलई खोल रहा है।

पाकिस्तान में विदेशी मुद्रा भंडार लगभग पूरा रीत गया है। ऐसा होने से पड़ोसी इस्लामी देश को जरूरी चीजों का आयात करना मुश्किल पड़ने वाला है। इसलिए अब शाहबाज सरकार को पैसे का इंतजाम करने का फार्मूला सरकारी कंपनियों को बेचने में नजर आ रहा है।

कल इस आशय के विधेयक पर कैबिनेट में मुहर भी लगा दी है। इसके अंतर्गत अब सरकार सरकारी संपदाओं को बेच सकती है। विधेयक के अनुसार, पाकिस्तान अपनी तेल और गैस कंपनियां उसी संयुक्त अरब अमीरात को बेचने का मन बना चुकी है, जिसने गत मई माह में पाकिस्तान के नाम पर लग चुके बट्टे को देखते हुए कर्जा तक देने से मना कर दिया था। यूएई ने मना इसलिए किया था क्योंकि पाकिस्तान ने उसका पिछला कर्ज तक नहीं लौटाया है। उधर आईएमएफ में भी पाकिस्तान की कर्जे की अर्जी लटकी पड़ी है, वहां से हो रही देरी भी इस कदम की बड़ी वजह हो सकती है।

इतना ही नहीं, कुछ और कंपनियां भी सऊदी अरब तथा चीन को बेचने की तैयारी पूरी कर ली गई है। चीन तो पाकिस्तान का अघोषित आका ही है। उसे इस इस्लामी देश के कंधे की जरूरत जो है जिससे ​कि वो एशिया के इस हिस्से में अपनी उपस्थिति बनाए रख सके। बीआरआई परियोजना इसी नीति का चीनी ‘हथियार’ है।

मीडिया में आए समाचारों के अनुसार, शाहबाज शरीफ की सरकार को हारकर यह फैसला लेना पड़ा है, कंगाल पाकिस्तान पर भरोसा करके मुस्लिम देशों सहित कोई भी देश उसे कर्ज देने को तैयार नहीं हो रहा है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले की इमरान खान की सरकार ने तो देश के कई राजमार्ग और हवाईअड्डे तक को कर्ज की खातिर गिरवी रख दिया था। विडम्बना देखिए आज वही इमरान खान और वही पीटीआई पार्टी शरीफ सरकार को सरकारी कंपनियां बेचने के फैसले पर आड़े हाथों ले रही है।

सरकारी कंपनियों को बेचने के शरीफ सरकार के फैसले के विरोध में ये ट्वीट किया पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने

एएनआई के अनुसार, शाहबाज सरकार पहले दौर में पाकिस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड, ऑयल गैस डेवलेपमेंट कंपनी लिमिटेड तथा मुरी गैस कंपनी जैसे नामी सरकारी उद्यमों को बेचने की तैयारी कर चुकी है। बताया जाता है कि इन कंपनियों को बेचने से सरकार को 2—2.5 अरब डॉलर की राशि मिलेगी और इससे सरकार को लगता है दिवालिया होने के आसार कुछ दिनों के लिए टाले जा सकेंगे। यानी देश की अर्थव्यवस्था ‘प्रोबेशन’ पर चल रही है।

मीडिया में आए समाचार बताते हैं कि विधेयक में ऐसी शर्तें रखी गई हैं कि सरकार बिना किसी बाधा के सरकारी कंपनियां बेच सकती है, कोई इसके विरुद्ध अदालत का भी दरवाजा नहीं खटखटा पाएगा। हां, विधेयक को राष्ट्रपति आरिफ अल्वी की मंजूरी लेने भर की बाधा जरूर है। गौर करने की बात है कि अल्वी इमरान के पाले के हैं। बताते हैं वे उन्हीं के इशारे पर कोई काम करते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि क्योंकि इमरान को पूरी उम्मीद है कि वे ही अगला चुनाव जीतेंगे। इसलिए कंपनियों को बेचने की मजबूरी को देखते हुए राष्ट्रपति विधेयक को मंजूर कर सकते हैं। इससे इमरान को दो फायदे होंगे, एक तो वे शरीफ सरकार को इस मुद्दे पर घेर पाएंगे, दूसरे अगर आगे उनकी सरकार बनी तो कंपनियों को बेचने का ठीकरा उनके सिर नहीं फोड़ा जाएगा।

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान का एक ट्वीट उनकी उक्त मंशा को उजागरर कर देता है। ट्वीट में खाने ने लिखा है—ये है अमेरिका द्वारा बिठाई गई ‘इम्पोर्टेड गवर्नमेंट’। मुल्क का वजीरे आजम ही चोर और अपराधी है। उसे जरदारी जैसे भ्रष्ट लोगों का साथ मिला है। सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि सरकार के फैसले को कहीं चुनौती भी नहीं ​दी जा सकेगी।

Topics: bankrupteconomyPakistanUAEshahbaazimranassetinflationpsu
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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