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पाठ्यक्रम में परिवर्तन क्यों आवश्यक ?

Written byप्रणय कुमारप्रणय कुमार
May 5, 2022, 02:51 pm IST
inभारत, शिक्षा

शिक्षा किसी भी समाज एवं राष्ट्र की रीढ़ होती है। उसी पर उस राष्ट्र एवं वहाँ की पीढ़ियों का संपूर्ण भविष्य निर्भर करता है। शिक्षा के माध्यम से ही राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक मूल्यबोध विकसित किए जाते हैं और निश्चय ही ऐसा किया भी जाना चाहिए। पारस्परिक एकता, शांति, सहयोग एवं सौहार्द्र की भावना को भी शिक्षा के माध्यम से ही मज़बूती प्रदान की जा सकती है। न केवल स्वतंत्रता-पूर्व बल्कि दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी शिक्षा-तंत्र पर परकीय, औपनिवेशिक, वामपंथी, क्षद्म पंथनिरपेक्षतावादी एवं मैकाले प्रणीत-प्रेरित सोच व मानसिकता ही हावी रही है। इतनी कि आज भी उनका विष-वमन शैक्षिक-सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण को प्रायः न केवल विषाक्त बना जाता है, अपितु विभाजन की रेखा को और चौड़ा, गहरा एवं पुष्ट कर जाता है।

उन्होंने बड़ी कुशलता एवं कुटिलता से देश की नौजवान पीढ़ियों को अपनी जड़ों-परंपराओं-जीवनमूल्यों से पृथक करने का बौद्धिक षड्यंत्र रचा है। जिसका परिणाम है कि अतीत के प्रति हीनता-ग्रंथि, वर्तमान के प्रति क्षोभ व असंतोष तथा भविष्य के प्रति संशय, अविश्वास एवं मतिभ्रम आज के युवाओं की प्रमुख प्रवृत्ति व पहचान बनती जा रही है। पर चिर-परिचित ढिठाई से अपनी इस जड़विहीन-अराष्ट्रीय सोच को भी ये वामपंथी एवं तथाकथित बुद्धिजीवी  ‘भारत के भाग्योदय’ से जोड़कर प्रस्तुत एवं महिमामंडित करते हैं। जबकि शिक्षा का अ-भारतीयकरण ही भारत की अधिकांश समस्याओं का मूलभूत कारण और भारतीयकरण ही एकमात्र निवारण है।

इतिहास, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र से लेकर लगभग सभी कक्षाओं की सामाजिक विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी जैसे अधिकांश विषयों की पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों में हर स्तर पर आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। इन सभी विषयों की पाठ्य सामग्रियाँ (विषयवस्तु) नितांत नीरस हैं। भारतीय मन-मष्तिष्क के सर्वथा प्रतिकूल हैं। देश की प्रकृति, परिवेश, परंपरा एवं पृष्ठभूमि से पूर्णतया पृथक हैं। ये स्व, स्वत्व, स्वदेश एवं संस्कृति से पूरी तरह विच्छिन्न तथा युगीन एवं दैनंदिन आवश्यकताओं की पूर्त्ति में अक्षम-असमर्थ-अपर्याप्त हैं। इनमें एक ओर वर्गीय एवं क्षेत्रीय चेतना तथा भिन्न-भिन्न अस्मिताओं को उभारने की दृष्टि से चुन-चुनकर ऐसी-ऐसी विषय-सामग्री डाली गई हैं जो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं, तो दूसरी ओर पंथ-मजहब-संप्रदाय-रिलीज़न को धर्म का पर्याय मान भारत को भिन्न-भिन्न संस्कृति वाला बहु-सांस्कृतिक देश बताया-दुहराया गया है।

वस्तुतः ‘मिली-जुली’ या ‘सामासिक संस्कृति’ एक ऐसा झूठ एवं प्रपंच है, जिसे वामपंथी इतिहासकारों-शिक्षाविदों द्वारा नारों की तरह बार-बार गढ़ा, उछाला एवं भुनाया जाता है। जानते-बूझते हुए भी इस सत्य की घनघोर उपेक्षा की जाती है कि विविधता में एकता देखने वाली भारत की संस्कृति एक है, जिसे पूरा विश्व प्राचीन काल से ही सनातन संस्कृति, हिंदू संस्कृति या भारतीय संस्कृति के नाम से जानता-पहचानता-पुकारता आया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शिक्षा-जगत में आज भी पश्चिमीकरण को ही प्रगति, स्तरीयता एवं आधुनिकता का एकमात्र मानदंड माना-समझा जाता है। जबकि आज आवश्यकता इस बात की अधिक है कि जो अपना है उसे युगानुकूल और जो बाहर का है उसे देशानुकूल बनाकर आत्मसात किया जाय।

यह सर्वविदित एवं सर्वस्वीकृत तथ्य है कि इतिहास घटित होता है, निर्देशित नहीं। परंतु दुर्भाग्य से इतिहास-लेखन के नाम पर  हम भारतीयों के मान-मर्दन का जैसा सुनियोजित षड्यंत्र एवं प्रायोजित अभियान पराधीनता-काल में चलाया गया, वह स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात भी निर्बाध ज़ारी रहा। स्वतंत्र भारत में भी राष्ट्र के स्व, स्वत्व एवं स्वाभिमान की रक्षा में सहायक इतिहास लेखन की दिशा में कोई विशेष पहल एवं प्रयत्न नहीं किया गया। बल्कि ब्रिटिश भारत की तरह स्वतंत्र भारत में भी तथ्यों एवं साक्ष्यों के स्थान पर धारणाओं एवं गर्हित निहितार्थों का ही पृष्ठ-पोषण किया गया। विचारधारा एवं दल विशेष के दिशानिर्देश पर इतिहास की घटनाओं का संकलन-विवरण-विश्लेषण किया गया। पूर्व से तय मतों एवं निष्कर्षों को परिपुष्ट करने   वाले इतिहासकारों-पुरातत्त्वविदों-शोधार्थियों को विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं एवं विश्वविद्यालयों के शीर्ष पदों पर बिठाकर पुरस्कृत-प्रोत्साहित किया जाता रहा।

इतिहास-लेखन एवं सामग्रियों के संकलन में पारंपरिक स्रोतों, प्राचीन शास्त्रों – वेदों-पुराणों-महाकाव्यों, उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों-सामग्रियों तथा तमाम ठोस एवं उपलब्ध तथ्यों की घनघोर उपेक्षा की गई। लोक साहित्य एवं लोक स्मृतियों को ताक पर रख दिया गया। आक्रांताओं या उनके आश्रय में रहे व्यक्तियों-यात्रियों द्वारा लिखे गए विवरणों को ही इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत या आधार मानकर मनमानी व्याख्याएँ की गईं, मनचाही स्थापनाएँ दी गईं। तर्कशुद्ध-तटस्थ-स्वतंत्र चिंतन एवं वस्तुपरक विवेचन के स्थान पर विदेशी मतों, सत्ता-तंत्र पर लंबे समय तक नियंत्रण रखने वाले परिवारों के निजी आग्रहों व विचारों, वामपंथी धारणाओं व मनगढ़ंत मान्यताओं को इतिहास की सच्ची घटनाओं की तरह प्रस्तुत एवं महिमामंडित किया गया। इतना ही नहीं शैक्षिक-साहित्यिक से लेकर इतिहास अनुसंधान परिषद जैसी संस्थाओं को वैचारिक खेमेबाजी का अड्डा बना दिया गया। संवाद के स्थान पर एकालाप और विमर्श के स्थान पर वक्तव्य को प्रश्रय एवं प्रोत्साहन मिलने लगा।

पाठ्य-पुस्तकों में चुन-चुनकर ऐसी घटनाओं एवं विवरणों को सम्मिलित एवं विस्तारपूर्वक विवेचित किया गया, जो भारत के चिरंतन-सनातन वैशिष्ट्य एवं व्यक्तित्व को नष्ट करने में सहायक सिद्ध हों। देश की स्वतंत्रता जैसी सामूहिक एवं सम्मिलित उपलब्धि का सेहरा भी चंद नेताओं के सिर बाँधा जाने लगा। स्वतंत्रता के लिए देश के विभिन्न प्रांतों एवं क्षेत्रों में हुए भिन्न-भिन्न प्रकार के आंदोलनों व प्रयासों एवं उसमें भाग लेने वाले असंख्य नायकों-महानायकों को विस्मृति के गर्त्त में धकेल दिया गया। न जाने कितने ही ऐसे क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता-सेनानी रहे, जिनकी घनघोर उपेक्षा की गई, जिनके हिमालय सदृश व्यक्तित्व व योगदान को राई समान प्रस्तुत किया गया। उन्हें चंद पृष्ठों क्या, चंद शब्दों में समेट दिया गया। कुछ के व्यक्तित्व, कर्तृत्त्व एवं ऐतिहासिक अवदान को तो सायास विकृत करने का कुचक्र रचा गया।

आज कितने ऐसे युवा होंगें, जिन्हें नाना फड़नवीस, बाबू कुँवर सिंह, राम सिंह कूका, वासुदेव बलवंत फड़के, चापेकर व सावरकर बंधुओं, लाला हरदयाल, मदनलाल धींगड़ा, मादाम कामा, बारीन्द्र कुमार घोष, शचींद्रनाथ सान्याल, सत्येंद्र नाथ बसु, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, यतीन्द्र नाथ दास, बटुकेश्वर दत्त, उल्लासकर दत्त, भूपेंद्रनाथ दत्त, रासबिहारी बोस, श्यामजी कृष्ण वर्मा, भाई परमानंद, मास्टर दा, राजा महेंद्र प्रताप, उधम सिंह, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी जैसे तमाम क्रांतिवीरों एवं स्वतंत्रता सेनानियों के काम तो क्या नाम तक याद होंगें? जिनके नाम याद हैं, उनके भी काम और योगदान पर इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में व्यापक-विस्तृत प्रकाश नहीं डाला गया। उनके योगदान के सामाजिक-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक पक्षों-प्रभावों-संदर्भों-उच्चादर्शों को स्पष्ट नहीं किया गया।

भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्लाह ख़ाँ को लोकमानस, कला और सिनेमा ने जो महत्त्व दिया, क्या वही महत्त्व उन्हें इतिहास की पुस्तकों एवं अकादमिक जगत में दिया गया, क्या सुभाषचंद्र बोस के महत्त्व एवं योगदान की सम्यक, संतुलित व न्यायपूर्ण विवेचना की गई? क्या स्वतंत्रता के उपरांत बड़ी योजनापूर्वक यह सिद्ध करने की कुचेष्टा नहीं की गई कि हमें आज़ादी केवल काँग्रेस के नेतृत्व में चलाए गए अहिंसात्मक आंदोलनों के फलस्वरूप मिली? ‘दे दी हमें आज़ादी, बिना खड्ग बिना ढाल’ का झूठ गाया-दुहराया जाता रहा। जबकि तथ्य यह है कि स्वतंत्रता के संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 1956 में कोलकाता दौरे पर पश्चिम बंगाल के कार्यवाहक राज्यपाल जस्टिस पी.बी चक्रवर्ती से बातचीत के क्रम में इस सत्य को उजागर किया था कि ब्रिटिश शासन के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस का आंदोलन और नौसेना विद्रोह अधिक चुनौतीपूर्ण था।

उन्हें भय और आशंका थी कि नेताजी की सैन्य गतिविधियों, नौसेना विद्रोह और भारतीय सेना में बढ़ते क्षोभ व असंतोष के कारण होने वाले हिंसक आंदोलनों में बड़ी संख्या में अंग्रेजों को अपने प्राण गंवाने पड़ सकते हैं। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने 1942 में गाँधी जी के नेतृत्व में प्रारंभ किए गए भारत छोड़ो आंदोलन की धार  लगभग पूरी तरह कुंद पड़ जाने के बावजूद 1947 में  भारत को आनन-फानन में  अचानक आज़ाद करने का फैसला किया। क्या यह उचित नहीं होता कि किसी को कमतर या महत्त्वपूर्ण मानने-बताने के स्थान पर सभी स्वतंत्रता-सेनानियों को इतिहास के पृष्ठों में यथोचित मान-सम्मान-स्थान मिलता? क्या यह स्वाधीनता के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले, राष्ट्र की बलिवेदी पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले, फाँसी के फंदे को हँसते-हँसते चूम लेने वाले, आजीवन कारावास एवं कालेपानी की यातना भोगने वाले उन स्वतंत्रता सेनानियों एवं अमर हुतात्माओं के साथ किया गया क्रूरतम अन्याय नहीं है कि सारी सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों, स्मारकों, सड़कों एवं संस्थाओं का नामकरण चंद नेताओं एवं उनके वंशों-घरानों तक सीमित कर दिया गया? यह समय की माँग है कि अतीत की भूलों को वर्तमान में सुधारकर हाशिए पर धकेल दिए गए इतिहास के नायकों को मुखपृष्ठों पर स्थान मिले। विलंब से ही सही, पर उनके साथ न्याय हो!

यह भी घोर आश्चर्य का विषय है कि एक ओर जहाँ राष्ट्रीय एकात्मता की दृष्टि से संपूर्ण भारत वर्ष को एकता के सूत्र में आबद्ध करने वाले श्रद्धा-केंद्रों, द्वादश ज्योतिर्लिंगों, 52 शक्तिपीठों, कुंभ-मेले के आयोजनों, किलों-नगरों-मठों-मंदिरों की स्थापत्यकलाओं, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्थलों, महत्त्वपूर्ण घटनाओं, वैभवशाली भारतीय साम्राज्यों, यशस्वी राजवंशों, उनके तिथिक्रमों, वंशवृक्षों, लोक-कल्याणकारी कार्यों एवं उनकी अभूतपूर्व उपलब्धियों की घनघोर उपेक्षा की गई, वहीं दूसरी ओर गुलाम वंश, ख़िलजी वंश, तुगलक वंश, सैयद वंश, लोदी वंश, मुगल वंश जैसे बाहरी आक्रांताओं, उनके युद्ध-विवरणों एवं उनके द्वारा निर्माण कराए गए कथित किलों-मस्ज़िदों-स्थापत्य-कलाओं आदि की भव्य-आकर्षक-अतिरंजित-विवेचना की गई। यह जानते हुए भी कि ये आक्रांता जिन देशों से आए, उन देशों में उनके पूर्ववर्त्ती या परवर्त्ती शासकों द्वारा निर्मित कराए गए स्थापत्य-कला के एक भी उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय नमूने नहीं मिलते।

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी पाठ्य-पुस्तकों एवं शैक्षणिक विमर्शों में मौर्य, गुप्त एवं आधुनिक काल में मराठाओं जैसे कतिपय अपवादों को छोड़कर शेष सभी भारतीय राजवंशों, उदाहरणतः – चोल, चालुक्य, पाल, प्रतिहार, पल्लव, परमार, मैत्रक, राष्ट्रकूट, वाकाटक, कार्कोट, कलिंग, काकतीय, सातवाहन, विजयनगर, मैसूर के ओडेयर, असम के अहोम, नगा, सिख आदि तमाम प्रभावशाली राज्यों एवं राजवंशों की चर्चा लगभग नगण्य रही, जबकि इनके सुदीर्घ शासन-काल में अनेकानेक साधनसंपन्न-सुनियोजित नगर बसाए गए, लंबी-चौड़ी सड़कें बनवाईं गईं, सुविख्यात शिक्षण-केंद्रों की स्थापना की गई, विश्व के सांस्कृतिक धरोहरों में सम्मिलित होने लायक किलों-मठों-मंदिरों आदि के निर्माण कराए गए। क्या ऐसी सांस्कृतिक धरोहरों की जानकारी युवा पीढ़ी को नहीं दी जानी चाहिए?

गंगा-जमुनी तहज़ीब के नाम पर जहाँ  विदेशी-विधर्मी आक्रांताओं एवं शासकों की क्रूरताओं एवं नृशंसताओं पर आवरण डालने का एकपक्षीय-सुनियोजित प्रयास किया गया, वहीं पंथनिरपेक्षता की आड़ में अकबर, औरंगज़ेब, टीपू सुल्तान जैसे शासकों को कृष्णदेव राय, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, बाजीराव पेशवा से भी साहसी, महान, श्रेष्ठ एवं उदार बताने का संगठित-संस्थानिक अभियान चलाया जाता रहा। यह देश के बहुसंख्यकों की पीड़ा को बारंबार कुरेदने जैसा है। लाखों-करोड़ों को मौत के घाट उतारने तथा मंदिरों-धर्मशालाओं-पुस्तकालयों का अकारण ध्वंस करने वालों का ऐसा निर्लज्ज महिमामंडन भारत के बहुसंख्यकों का ही नहीं, अपितु मानवता का भी घोर अपमान है। एक ओर यहूदियों पर किए गए बर्बर अत्याचार के कारण आज जर्मनी में हिटलर का कोई नामलेवा भी नहीं बचा है, पूरा यूरोप एवं अमेरिका ही यहूदियों पर अतीत में हुए अत्याचार के लिए प्रायश्चित-बोध से भरा रहता है, वहीं दूसरी ओर भारत में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें गोरी, गज़नी, ख़िलजी, तैमूर जैसे आतताइयों-आक्रांताओं पर गर्व है, उन्हें उनके नाम पर अपने बच्चों के नाम रखने में कोई गुरेज़ नहीं, बहुधा वे उनसे आत्मीयता और जुड़ाव तथा अपने पास-पड़ोस एवं दुःख-सुख के दैनंदिन साझेदारों के प्रति दूरी एवं वैमनस्यता का भाव रखते हैं।

सौहार्द्रता, सद्भावना एवं भाईचारे के निर्माण के मार्ग में असली बाधा सच्चे इतिहास का लेखन और विवरण नहीं, अपितु आतताइयों एवं आक्रांताओं पर गर्व करने की यही मध्ययुगीन मानसिकता है। जिस दिन सभी देशवासियों के भीतर राष्ट्र के शत्रु-मित्र, जय-पराजय, मान-अपमान, गौरव-ग्लानि, हीनता-श्रेष्ठता का सच्चा, सम्यक एवं संतुलित बोध विकसित हो जाएगा, उस दिन समाज के एक सिरे से दूसरे सिरे तक एकता, सहयोग एवं सौहार्द्र की भावना स्वयंमेव विकसित होती चली जाएगी। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से ही हर समुदाय को यह बारंबार बताना-समझाना होगा कि मज़हब बदलने से पुरखे नहीं बदलते, पूजा या उपासना-पद्धत्ति बदलने से संस्कृति नहीं बदलती, विश्वास बदलने से साझे सपने और आकांक्षाएँ नहीं बदलतीं। इतिहास में अनेक ऐसे अवसर आए, जब पराजय की पीड़ा की साझी अनुभूति हुई, जब हर्ष एवं गौरव के साझे पल सजीव-साकार हुए। हमें राष्ट्र को सर्वोपरि मान, मज़हबी मत से ऊपर उठकर, निरपेक्ष भाव से अतीत के नायकों-खलनायकों पर पारस्परिक सहमति और असहमति बनानी पड़ेगी।

रहीम, रसखान, दारा शिकोह, बहादुर शाह ज़फ़र, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ, खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान, मोहम्मद उस्मान, अब्दुल हमीद, ए.पी.जे.अब्दुल कलाम या वर्तमान में आरिफ़ मुहम्मद ख़ान जैसी तमाम शख़्सियतों पर किस भारतीय को गर्व नहीं होगा! पर क्या इसमें भी कोई दो राय हो सकती है कि नालंदा  विश्वविद्यालय जैसे ज्ञान के सबसे बड़े मंदिर और स्रोत को नष्ट-भ्रष्ट करने वाले बख्तियार ख़िलजी के नाम को बनाए-बचाए रखने की ज़िद और जुनून का स्वतंत्र, आधुनिक एवं प्रगतिशील भारत में कोई स्थान एवं औचित्य नहीं होना चाहिए?

क्या यह सच नहीं कि इतिहास की हमारी पाठ्य-पुस्तकों में तथ्यों एवं घटनाओं का विवरण इस प्रकार से किया गया है कि विदेशी आक्रांताओं के नाम तो याद रह जाते हैं, पर राष्ट्र के लिए सर्वास्वार्पण करने वाले नाम, चेहरे और स्वर उभरकर सामने नहीं आते? भारतीय राजाओं की गणना में चंद्रगुप्त, अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, बाजीराव पेशवा जैसे चंद नामों को छोड़कर शायद ही कुछ और नाम हमें सहसा याद आते हों! जबकि बिंदुसार, पुष्यमित्र शुंग, कनिष्क, समुद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, महेंद्र शातकर्णी, गौतमीपुत्र शातकर्णी, महेंद्रवर्मन, नरसिंहवर्मन, मयूरवर्मन, रविवर्मा, कीर्तिवर्मन, राजाराजा चोल, राजेन्द्र चोल, नागभट्ट प्रतिहार, मिहिरभोज, हरिहर राय, बुक्क राय, कृष्णदेव राय, ललितादित्य मुक्तपीड, चेरामन पेरुमल, बप्पा रावल, महाराणा कुंभा, हम्मीरदेव चौहान, लाचित बोड़फुकन, सुहेलदेव जैसे एक-से-बढ़कर-एक पराक्रमी एवं महाप्रतापी राजाओं की वीरता एवं गौरवपूर्ण उपलब्धियों से भारतीय इतिहास भरा पड़ा है। इनके काम तो छोड़िए, राज्य और राजधानियों के नाम तक की चर्चा पाठ्यपुस्तकों में सही-सुसंगत ढ़ंग से नहीं मिलती। फलस्वरूप युवा पीढ़ी अपने ही गौरवशाली अतीत एवं इतिहास से अनभिज्ञ एवं अपरिचित है।

मानें न मानें, पर विभिन्न कक्षाओं की इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें पढ़कर यही धारणा बनती है कि भारत की गाथा तो केवल पराजय की गाथा है, कि प्रेरणा-पौरुष का एक भी ठोस दृष्टांत भारत के पास नहीं है, कि कोई भी कहीं से सैनिकों की कुछ टुकड़ी लेकर चला आया, संपूर्ण भारत वर्ष को लूटा-ख़सूटा, रौंदा-हराया और ढ़ेर सारा माल-असबाब लेकर या तो लौट गया या जब तक कोई अन्य आक्रांता नहीं आ धमका, हम पर शासन करता रहा, कि हम तो पिछड़े-प्रतिगामी, जातियों में बंटे रूढ़िवादी-अंधविश्वासी देश व समाज मात्र हैं।

वहीं भारतीय समाज में उन रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों के काल-विशेष में ही प्रचलित एवं प्रविष्ट होने के कारणों एवं  तात्कालिक परिदृश्यों का बड़ी चतुराई से उल्लेख तक नहीं किया गया है। क्या यह सत्य नहीं कि बाल-विवाह, सती-प्रथा, पर्दा-प्रथा, अस्पृश्यता जैसी कुप्रथाएँ भारतवर्ष में तुर्क, मुगल एवं अरब आक्रांताओं से बचने-बचाने के उपायों के रूप में प्रविष्ट एवं प्रचलित हुईं? विधर्मी एवं विदेशी आक्रांताओं के आगमन से पूर्व भारतवर्ष में इन कुप्रथाओं के प्रचलन के एक भी दृष्टांत क्यों नहीं मिलते? जबकि गुणों के आधार पर कन्याओं द्वारा वर चुने जाने, स्त्रियों द्वारा युद्ध में अग्रिम मोर्चे पर नेतृत्व करने,  हर जाति से राजा बनने तथा कथित तौर पर वंचित या दलित समाज से अनेकानेक पूज्य संतों के होने के असंख्य उदाहरण प्राचीन भारतीय इतिहास में अवश्य देखने को मिलते हैं।

सत्य यही है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यक्रम एकपक्षीय एवं असंतुलित हैं। वे अधिकांशतः दिल्ली-केंद्रित हैं। देश केवल राज्य, राजधानी और उस पर आरूढ़ सुलतानों-सत्ताधीशों एवं चंद चेहरों तक सीमित नहीं होता। उसमें वहाँ की भूमि, नदी, पर्वत, वन, उपवन और उन सबसे अधिक सर्व साधारण जन, उनके संघर्ष, सुख-दुःख आदि सम्मिलित होते हैं। इतिहास की हमारी पाठ्यपुस्तकों में संपूर्ण एवं समग्र भारतवर्ष को अभिव्यक्ति नहीं मिल पाई है। पूरब, पश्चिम एवं दक्षिण भारत के वैभवशाली अतीत को इतिहास के पृष्ठों में बहुत कम स्थान मिल पाया है।

बल्कि मध्यकालीन एवं आधुनिक भारत का पूरा-का-पूरा इतिहास दिल्ली सल्तनत, मुगल वंश, ईस्ट इंडिया कंपनी, अंग्रेज लॉर्डों व सेनानायकों एवं स्वतंत्रता-आंदोलन के नाम पर तत्कालीन कांग्रेस के कतिपय नेताओं के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गया है। आज़ादी के अमृत महोत्सव की इस पावन एवं स्वर्णिम बेला में हमें सच्चे, समग्र, सम्यक एवं संतुलित इतिहास-बोध या भारत-बोध को विकसित एवं स्थापित करने की दिशा में इतिहास के पुनर्लेखन पर गंभीरता से कार्य एवं विचार करना चाहिए। बिना इसके भावी पीढ़ी के भीतर सच्चा, समग्र एवं संपूर्ण राष्ट्रबोध विकसित ही नहीं किया जा सकता।

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