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मरीज पस्त, मुख्यमंत्री चुनाव में व्यस्त

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप
Apr 16, 2021, 05:51 pm IST
inभारत, बिहार

रितेश कश्यप

झारखंड में बढ़ते कोरोना संक्रमण को रोकने में प्रदेश की सरकार विफल दिखाई दे रही है। राज्य में 1 अप्रैल के बाद कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है। केवल 15 दिन में तकरीबन 28,000 लोग कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। यानी प्रतिदिन 1,866 लोग कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं। राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का जो हाल है और सरकार जिस तरह से इस महामारी को हल्के में ले रही है, उसको देखते हुए कहा जा रहा है कि आने वाले कुछ दिनो में ही राज्य में रोजाना लगभग 5,000 मरीज बढ़ेंगे। प्रदेश में अब तक 197 कोरोना पीड़ित अपने प्राण गंवा चुके हैं।

कोरोना महामारी से लड़ने के लिए झारखंड सरकार कितनी सजग है इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 15 अप्रैल को महाराष्ट्र से स्पेशल ट्रेन प्रवासी मजदूरों को लेकर हटिया रेलवे स्टेशन पहुंची। इस ट्रेन में 1,041 लोग सवार थे। सभी की जांच कराई गई। इनमें से 41 लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद किसी भी कोरोना मरीज को न तो रोका गया और न ही आइसोलेट किया गया। इस संबंध में वहां नियुक्त मजिस्ट्रेट और नामकुम के अंचलाधिकारी सुरेंद्र उरांव का बयान बहुत ही दिलचस्प है। उन्होंने कहा, ”हम लोगों को सिर्फ जांच के आदेश मिले हैं। यह नहीं बताया गया है कि पॉजिटिव मरीजों के साथ क्या करना है।” अब इस रवैये से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि राज्य में कोरोना के मरीजों का क्या हाल है और वे लोग और कितने लोगों को संक्रमित कर रहे होंगे।

बाहर से आने वाले लोगों की जांच तो हो रही है, लेकिन कोरोना पीड़ित होने के बावजूद उन्हें घर जाने के लिए कह दिया जाता है। ऐसे लोग रेलवे स्टेशन से अपने घर किसी न किसी सार्वजनिक परिवहन से जा रहे हैं। इस हालत में वे लोग कितने लोगों को संक्रमित कर रहे होंगे, इसका अंदाजा लगाना बहुत कठिन नहीं है।

रामगढ़ के अतुल प्रकाश के मामले में रामगढ़ प्रशासन की लापरवाही साफ दिखाई दे रही है। उन्होंने बताया कि पांच दिन पहले उन्हें कोरोना के लक्षण महसूस हुए तो उन्होंने अपनी माँ के साथ रामगढ़ के पुराने सदर अस्पताल में जाकर अपनी जांच कराई। वहां जांच अधिकारी ने दोनों लोगों को कोरोना पॉजिटिव बताया और घर में रहने को कहा। उनसे कहा गया कि उनके पास फोन या मैसेज आ जाएगा। 5 दिन बीत जाने के बाद भी उनके पास किसी प्रकार का कोई कॉल या है मैसेज नहीं आया। 5 दिन के बाद स्थिति थोड़ी बिगड़ने लगी तो वे रामगढ़ के मुख्य सदर अस्पताल पहुंचे। वहां के अधिकारियों ने बताया कि रिपोर्ट आने में 5 से 7 दिन और लगेंगे। अतुल ने कहा कि यह अजीब स्थिति है। एक जगह कहा जा रहा है कि कोरोना है, तो दूसरी जगह कहा जा रहा है कि 5—7 दिन में पता चलेगा कि कोरोना है या नहीं। ऐसी उलझन में केवल अतुल ही नहीं हैं। राज्य में ऐसे अतुलों की संख्या लाखों में है।

ऐसा ही एक और मामला झारखंड की राजधानी रांची में देखने को मिला। रांची सदर अस्पताल में 14 अप्रैल से ही भर्ती कोरोना मरीज राघवेंद्र सिंह काफी गंभीर स्थिति में पहुंच गए हैं। राघवेन्द्र का ऑक्सीजन स्तर गिरकर 76 के पास पहुंच गया है। उन्हें सांस लेने में भी काफी तकलीफ हो रही है। ट्विटर पर पत्रकार सोहन सिंह की ओर से ट्वीट किए जाने के बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने रांची के उपायुक्त को उचित कार्रवाई करने का आदेश दिया। बावजूद इसके अस्पताल में इस मरीज को कोई देखने तक नहीं आया। राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य मंत्री के आदेश को भी प्रशासन मानने को तैयार नहीं है।

झारखंड सरकार और प्रशासन की सबसे बड़ी लापरवाही तो तब सामने आई जब झारखंड पुलिस के 400 से अधिक पुलिसकर्मियों की कोविड-19 की जांच रिपोर्ट एक सप्ताह के बाद भी नहीं आ सकी। उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह पुलिस मुख्यालय में शिविर लगाकर इन सभी पुलिसकर्मियों के सैंपल लिए गए थे। अभी की स्थिति यह है कि सैंपल देने वाले सभी पुलिसवाले अभी भी काम करते नजर आ रहे हैं। जबकि हाल के कुछ दिनों में ही 60 पुलिसकर्मी कोरोना से ग्रसित हो चुके हैं। इनमें से 15 की जान भी जा चुकी है।

झारखंड में महामारी की ऐसी स्थिति को देखकर विपक्ष कुछ कहता है, तो सरकार कहती है कि विपक्षी नेता कोरोना का भय दिखाकर राज्य के लोगों को डराना बंद करें। उल्लेखनीय है कि 14 अप्रैल को हेमंत सोरेन ने कहा था कि विपक्षी दल अफवाह फैलाकर डर का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और आवश्यक दिशा—निर्देश भी दिए जा रहे हैं। लेकिन हेमंत के दावों को राज्य के सबसे बड़े अस्पताल ‘रिम्स’ की हालत ही खारिज कर देती है। रिम्स में संसाधनों की घोर कमी की वजह से कोरोना पीड़ितों को समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ रांची की है, बल्कि राज्य के अन्य शहरों में भी बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। धनबाद, जमशेदपुर, रामगढ़, दुमका जैसे शहरों में भी अफरातफरी का माहौल है। लोग इलाज के अभाव में मर रहे हैं।

कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए निजी अस्पताल और एम्बुलेंस वाले मजबूरी का फायदा उठाने में कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं। लोगों की मजबूरियों को देखते हुए निजी अस्पताल वाले मनमानी पर उतर आए हैं। निजी अस्पताल वाले किसी मरीज को आधे घंटे वेंटिलेटर पर रखने के लिए 15,000 रु तक वसूल रहे हैं। रांची के सबसे बड़े निजी अस्पताल में भर्ती एक मरीज ने बताया कि यहां 250 रुपये के सैनिटाइजर के लिए 693 रुपये वसूले जा रहे हैं। इतना ही नहीं, जनरल वार्ड में भी हर मरीज से पीपीई किट के नाम पर 1,000 रु वसूला जा रहा है। इन हालातों पर रांची के सांसद संजय सेठ कहते हैं, ”कोविड-19 को लेकर राज्य की स्थिति खराब होती जा रही है। स्थिति को संभालने के बजाय मुख्यमंत्री मधुपुर के उपचुनाव में व्यस्त हैं। मुख्यमंत्री की निष्क्रियता को देखते हुए 10 दिन पहले उन्हें एक पत्र लिखा था, मगर उसका उन्होंने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है।” श्री सेठ ने यह भी कहा, ”राज्य के अस्पतालों में बेड की कमी को देखते हुए मैंने केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी और रेलवे से बात की, ताकि उन विभागों की मदद से ऑक्सीजन सिलेंडर और अन्य आवश्यक संसाधन मुहैया कराया जा सके, लेकिन राज्य सरकार के स्तर पर अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से केंद्र के उन विभागों से भी मदद नहीं मिल पा रही है।”
इस हालत में यही कहा जा सकता है कि झारखंड में कोरोना के मरीज भगवान भरोसे ही हैं।

रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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