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हिन्दू संस्कृति का अनुपम संरक्षण

Written byArchiveArchive
Aug 7, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 07 Aug 2017 10:56:11

इंडोनेशिया के द्वीप जावा  में अनेक हिंदू जनजातियां हैं जिनमें लोगों के नाम भले मुस्लिम हों, पर व्यवहार में वे हिंदू ही हैं। भारत के प्रति उनमें अनूठी आस्था है

 श्याम परांडे
नौंवीं शताब्दी में निर्मित दुनिया का सबसे सुंदर महायान बौद्ध मंदिर बोरोबुदुर और 10वीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दू मंंिदर प्रंबनन के जिक्र के बगैर जावा का परिचय अधूरा है। प्रंबनन इंडोनेशिया के द्वीप जावा की हिंदू संस्कृति की उत्कृष्ट वास्तुकला का नमूना है और भारत के कई ऐतिहासिक मंदिरों की तरह इसकी भी अपनी एक गाथा है।
किंवदंती के अनुसार, बांडुंग बोंडोवोसो नाम का एक व्यक्ति था, जो रोरो जोंगग्रांग नाम की एक खूबसूरत महिला को चाहता था। लेकिन जोंगग्रांग को उसका प्यार मंजूर नहीं था, इसलिए  उसने बोंडोवोसो के सामने एक शर्त रखी कि उसे एक ही रात में 1000 मूर्तियों वाला एक मंदिर बनाना होगा। यह असंभव था। फिर भी बोंडोवोसो ने अपने हाथ आए इस अवसर को पूरा करने की ठान ली और 1000 मूर्तियों के मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया। उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति देखकर जोंगग्रोंग को महसूस हुआ कि कार्य पूरा हो जाएगा। इसलिए जैसे ही बोंडोवोसो ने 999 वीं मूर्ति का निर्माण पूरा किया, जोंगग्रांग ने गांव वालों को फुसलाया कि वे चावल की खूब सारी भूसी इकट्ठी करके जला दें जिससे एक नकली सूर्योदय की स्थिति बन जाए। जब बोंडोवोसो को पता चला कि उसे धोखा दिया गया है तो उसने जोंगग्रांग को मंदिर की 1000 वीं मूर्ति बन जाने का शाप दे दिया। बोरोबुदुर मंदिर चारों ओर से विहंगम पहाड़ों और हरियाली से घिरा है। इससे मंदिर ने सदियों से प्राकृतिक आपदाओं या मानव निर्मित तबाही के बीच अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखा है, लिहाजा इस स्मारक को दृढ़ता का प्रतीक कहा जा सकता है। हालांकि, इस विवरण का उद्देश्य बोरोबुदुर या प्रंबनन के अद्भुत मंदिरों के बारे में बताना नहीं, बल्कि उस समुदाय का परिचय कराना है जिनके पूर्वजों ने इन विशाल मंदिरों को एक सहस्राब्दी पहले बनाया था। इन दोनों मंदिरों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है और गूगल पर इनके इतिहास के बारे में जानकारी उपलब्ध है।  
जावा- जिंदादिल समुदाय
हैरानी की बात है कि हजारों मील दूर एक समुदाय भारत से आने वाले मेहमानों का स्वागत करने के सपने देखता है। मेरे लिए यह अविश्वसनीय था। फिर भी, मुझे अपनी आंखों और कानों पर विश्वास तो  करना ही था। जावा द्वीप में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और द्वीप के कुछ हिस्सों में उनकी आबादी नगण्य हैै। लेकिन उनका आत्मविश्वास काबिलेतारीफ है। मुझे महसूस हुआ कि यह समुदाय छोटा तो है, फिर भी उस विशाल द्वीप पर हर जगह मौजूद है और सभी हिंदू परंपराओं, संस्कारों और अनुष्ठानों का पूरी निष्ठा और नियम से पालन करने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं।
हम भारतीय यह सोच ही नहीं सकते कि विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक सुबह 6 बजे इकट्ठे होकर भारत से आए अपने मेहमानों का स्वागत करने के लिए तत्पर रहेंगे, पर ऐसा नजारा पूर्वी जावा के दूसरे सबसे बड़े शहर मलांग में दिखाई दिया। मैं सुबह-सुबह मलांग के सेकोलाह तिंगी अगामा हिंदू संतीका धर्म, अश्रमा गुन्गंग अगंग या साधारण शब्दों में कहें तो मलांग हिंदू कॉलेज पहुंचा, क्योंकि हमारा पूरा दिन बड़ा व्यस्त था। यह दौरा एक दिन पहले होने वाला था पर उड़ान रद्द होने के कारण नहीं हो सका। हम सड़क मार्ग से 400 किलोमीटर की यात्रा करके वहां पहुंचे ताकि इस कार्यक्रम में भाग ले सकें। न तो मेरे मेजबान और न मैं कार्यक्रम  छोड़ना चाहता था। यह एक सुखद एहसास था कि वैदिक साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन पर केंद्रित एक कार्यक्रम के लिए उतनी सुबह भारी संख्या में शिक्षक और विद्यार्थी हमारे स्वागत के लिए मौजूद थे।
हमारे मेजबान डॉ़ मिसवांतो कॉलेज के अकादमिक मामलों के उपाध्यक्ष थे। इस संस्थान के पुस्तकालय में हिंदू धर्म और दर्शन पर अच्छी संख्या में पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनमें से कुछ आईसीसीएस की ओर से भेजी गई हैं। छात्रों के एक समूह ने सस्वर मंत्र-पाठ से मेहमानों का स्वागत किया। यह दुखद है कि हिंदू धर्म का अध्ययन छात्रों को न तो उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है, न ही सफलता की कोई उम्मीद प्रदान करता है। फिर भी वे चुनौतियों से घबराते नहीं। उनमें से कुछ की ख्वाहिश भारत में हिंदू धर्म का अध्ययन करने और अपनी आजीविका के लिए एक और विषय पढ़ने की है क्योंकि हिंदू धर्म का अध्ययन उनकी आमदनी का जरिया नहीं बन सकता। हमें यह देखना होगा कि क्या भारत में  हिंदू धर्म की शिक्षा के बाद उपाधि देने के लिए कोई प्रतिष्ठान या संस्था है? मलांग में बहुसंख्यक मुसलमानों के बीच हिंदू समुदाय की आबादी नाममात्र की है लेकिन उन्हें अपनी विरासत पर गर्व है।
सुमात्रा के लैपंग की हमारी यात्रा अत्यंत शिक्षाप्रद रही। बहुसंख्यक समुदाय के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते बरकरार रखते हुए अपने धर्म को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में हिंदू समुदाय जिस तनाव से गुजरता होगा उसे हम बखूबी समझ सकते हैं। हमें सेकोलाह हिंदू तिंगी के छात्रों से मिलने का मौका मिला, जिनके पास बहुत सारे प्रश्न थे। हम लैपंग के बुद्ध मंदिर पहुंचे जहां हमने मठ में मौजूद बौद्ध समुदाय के साथ बातचीत की।
हालांकि, लैपंग की यात्रा की सबसे अच्छी यादें बालिनूरागा नाम के एक गांव में बंजार (पंचायत) के दौरे की हैं जहां पूरे ग्रामीण समुदाय ने, विशेष रूप से अपने बालों में फूल सजाए युवा लड़कियों ने अपनी पारंपरिक पोशाक में बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया था। वे भारत से आए हिंदुओं को देखकर बहुत खुश थे। एक साल पहले एक उग्र भीड़ ने मंदिर के विशाल परिसर को जला दिया था, जिसमें इस गांव के 14 निवासियों की मृत्यु हो गई थी। हालांकि, इस समुदाय ने सरकार से कोई मांग किए बगैर पूरी निष्ठा के साथ इस मंदिर की अलौकिक छटा का पुनर्निर्माण किया।  बालिनूरागा एक कृषि-प्रधान परिश्रमी गांव है, जिसके निवासी भजन-कीर्तन और रामलीला आदि करते हैं। हमें बताया गया कि इस गांव की समृद्धि से आस-पास के बहुसंख्यक समुदाय के गांवों को ईर्ष्या होती है। इस क्षेत्र का हिंदू समुदाय बाली से आया है, जिसे कुछ दशक पहले इंडोनेशियाई सरकार ने इस स्थान पर बसाया था।  आज यह समुदाय भारी तनाव में है। दक्षिणी लैपंग के नतर, पैडेंगर्मिन, पेसवारन और सिदोम्योली आदि आस-पास के गांवों में  3 वर्ष के दौरान उन पर 5 बार हमले हुए। फिर भी, यह समुदाय अपनी पीड़ा पर मरहम लगाकर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में बसे जावा से आए इस हिंदू समुदाय की अदम्य शक्ति की हम सराहना की जानी चाहिए।
जकार्ता में हिन्दू शिक्षाविद्
राजधानी जकार्ता विभिन्न प्रकार की गतिविधियों का केंद्र है, हालांकि यहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं। सरकारी नौकरियों में कार्यरत हिंदुओं की संख्या नाममात्र की है। जकार्ता में कुछ आप्रवासी समुदाय भी हैं जो व्यवसाय और उद्योग चला रहे हैं। सेकोलाह (स्कूल) तिंगी हिंदू कॉलेज में जावा के विभिन्न क्षेत्रों से आए छात्र हैं, हालांकि उनकी संख्या बहुत कम है।
हिंदू धर्म विभाग के महानिदेशक प्रो़ डॉ़  इडा बागुस युधा त्रिगुना और पूरे देश में हिंदू विषयों के विभिन्न विभागों के सभी 9 प्रमुखों के साथ एक बहुत ही उपयोगी बैठक हुई। यह विभाग इंडोनेशिया गणराज्य के पांथिक मामलों के मंत्रालय के अधीन है और मंत्रालय की भव्य इमारत में ही स्थित है। डॉ़ त्रिगुना गरिमा और दृढ़ विश्वास का प्रतीक हैं। उनके नेतृत्व में विभाग अच्छी प्रगति कर रहा है और हिंदू धर्म पर भारत के शिक्षाविदों के साथ नियमित संवाद के लिए तैयार है। हमने इंडोनेशिया में हिंदू धर्म के मुख्यालय पेरिसदा का दौरा किया जो हिंदुओं का इंडोनेशिया सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त स्थानीय निकाय है। वहां निदेशक मंडल के साथ हमारी एक विस्तृत बैठक हुई। पेरिसदा को भारत के हिंदुओं के साथ संपर्क और नियमित संवाद की उम्मीद है। इंडोनेशिया में श्रेष्ठ इस्लामी प्रथाओं के पालन के साथ-साथ हिन्दू संस्कृति का पोषण एक ऐसी कुंजी है जो देश के लिए शांतिपूर्ण माहौल की नींव गढ़ सकता है।  
(लेखक अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के   महामंत्री हैं)

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