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सामाजिक संतुष्टि का पंचामृत

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Dec 5, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 05 Dec 2016 13:02:26

 

कृषि, पर्यावरण, स्वास्थ्य, समृद्धि और आस्था का संरक्षण

संघ की प्रेरणा से आज हजारों स्वयंसेवक गोआयाम से जुड़े हैं। कहीं गोबर से गैस बनाई जा रही है तो कहीं बिजली। मथुरा के पास बरसाना में बिजली बनाने का एक प्रकल्प जल्दी ही शुरू होने वाला है। कहा जा रहा है कि इस से बरसाना जगमग करेगा। 

शंकरलाल

 

सदियों से भारतीय संस्कृति, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और संस्कार का आधार गोमाता रही है। यह बात पूरी तरह प्रमाणित है कि गाय के द्वारा ही भारत की वास्तविक उन्नति हो सकती है। लेकिन एक गहरी साजिश के तहत गोवंश को आम जनजीवन से बाहर कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप देश से समृद्घि, स्वास्थ्य और संस्कार गायब होते चले गए।

विडंबना ही है कि आज देश में पंजीकृत कत्लखानों की संख्या 1,623 है, जबकि दूध प्रसंस्करण इकाइयों की संख्या महज 213 और अन्य दुग्ध इकाइयों की संख्या मात्र 793 है। वैसे तो गली-मुहल्लों में चल रहे अवैध कत्लखानों की संख्या हजारों में है। गोवंश का जितना नुकसान मुगल काल और अंग्रेजी शासन में नहीं हुआ, उससे अधिक कथित आजादी मिलने के बाद हो चुका है। गाय कीे 70 भारतीय नस्लों में से महज 45 नस्लें ही आज बची हैं। इनमें से केरल की बेेचूर और कर्नाटक की कृष्णावेली कुछ ऐसी नस्लें हैं जिनकी सीमित संख्या ही बची है। दुनिया में सर्वाधिक दूध देने वाली गायें भारतीय नस्ल की हैं, लेकिन हमारे अपने देश में ही गाय को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियां फैलाई गईं। संविधान की धारा 48 मेें सभी राज्यों को गोहत्या बंदी निर्देश दिया गया है। देश के 29 में से 24 राज्यों में गोवंश हत्या अथवा मांस की बिक्री पर रोक भी है। यही नहीं, उच्चतम न्यायालय ने भी 26 अक्तूबर, 2005 को विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा गोहत्या रोकने के लिए बनाए कानूनों को संवैधानिक करार दिया है, फिर भी देश में गोवंश की हत्या जारी रहना अत्यंत शर्मनाक है।

 

सभी समस्याओं का समाधान समाज जागरण है। इसलिए गोवंश को बचाने के लिए जरूरी है कि आज जो भी व्यक्ति अथवा संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर गोसेवा कर रही हैं, वे चाहे किसी भी पार्टी, पंथ, जाति अथवा पूजा पद्धति के मानने वाले हों, उनके द्वारा किए जाने वाले अच्छे कामों को समाज के सामने लाना आवश्यक है। ऐसी सभी सकारात्मक गतिविधियों में समन्वय स्थापित करने का काम आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं।

पूजनीय डॉक्टर जी के समय से ही संघ गोसेवा में लगा है। एक कसाई जब गाय को काटने के लिए ले जा रहा था, तो डॉक्टर साहब ने पैसे देकर उसे खरीदकर कटने से बचाया था। इसलिए गोसेवा तो अपने खून में है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संघ कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन सांसदों से संपर्क कर इस विषय को संसद में उठवाया। लेकिन नेहरू जी के अड़ने के कारण वह विषय उस समय लटक गया था। नेहरू जी ने उस समय कहा था, ''आपको गाय चाहिए कि नेहरू।'' इसलिए उस समय देशभर में एक सघन हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप 1952 में एक करोड़ 77 लाख हस्ताक्षर संकलित कर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सौंपे गए। इसके बाद स्वयंसेवक फिर गोसेवा के अपने-अपने प्रयासों को आगे बढ़ाने में लग गए। लेकिन जब सरकार की तरफ से कुछ नहीं हुआ, तो 1966 में पूज्य करपात्री जी महाराज, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी, पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी, श्री रामचन्द्र वीर सहित अनेक संतों के नेतृत्व में दिल्ली में एक विशाल प्रदर्शन किया गया, जिसमें लाखों गोभक्तों ने भाग लिया। स्वयंसेवकों ने देशभर से गोभक्तों को उस प्रदर्शन हेतु दिल्ली लाने का काम किया। बाद में गोरक्षा महाअभियान समिति बनी जिसमें पूजनीय श्रीगुरुजी भी थे। संघ की ओर से गोरक्षा हेतु ठोस प्रयास श्री मोरोपंत पिंगले के माध्यम से शुरू हुए। बाद मंे संघ की ओर से नागपुर स्थित देवलापार गो अनुसंधान केन्द्र की स्थापना हुई। आज वह केन्द्र गोरक्षा के क्षेत्र में एक सशक्त प्रयास सिद्ध हुआ है। वहां गोपालन के साथ-साथ गाय पर वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रेरक प्रयोग हुए हैं और गोबर और गोमूत्र पर कई अन्तरराष्ट्रीय पेंटेंट हासिल किए गए हैं। आज हर साल हजारों किसान वहां प्रशिक्षण हेतु आते हैं। वर्ष 2004 में जब मैं राजस्थान में क्षेत्र प्रचारक था तो मोरोपंत पिंगले जी का मेरे पास फोन आया और उन्होंने कहा, ''राजस्थान में सर्वाधिक गोवंश है इसलिए उसे बचाने के लिए विशेष प्रयास करो, गाय बचेगी तो देश बचेगा।'' फिर कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उसके बाद 2009 में विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा निकली। गोरक्षा के इतिहास में वह अभी तक का सबसे बड़ा जागरण अभियान था। उसके बाद आठ करोड़ पैंतीस लाख वयस्कों के हस्ताक्षर-युक्त ज्ञापन तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल को सौंपा गया। पर सरकार ने कुछ नहीं किया। लेकिन उन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूव देशभर में गाय के बारे में जागृति आई है। धीरे-धीरे जैविक कृषि, गोपालन, पंचगव्य उत्पादों की मांग बढ़ी है। लोग देशी और विदेशी गाय में अंतर समझने लगे हैं। आज हमारे पास 10,000 से अधिक देशी गायों की मांग है।

विश्वमंगल गो-ग्राम यात्रा के बाद देशभर में 1,000 से अधिक नई गोशालाएं खुली हैं। अनेक संत अब गोकथा करने लगे हैं। आज देशभर में 400 स्थानों पर पंचगव्य उत्पाद बनते हैं और उनकी मांग तेजी से बढ़ रही है। सूरत में एक कार्यकर्ता अमोल विरानी सालभर में करीब 25 लाख रुपए के पंचगव्य उत्पाद बेचते हैं। इसी प्रकार रायपुर के पास एक तहसील है जहां प्रतिदिन 2,000 किलो सीएनजी गैस गोबर से बनाई जाती है। वहां एक किलो गैस से 40 किमी तक कार चलती है। वडोदरा के पास एक स्थान पर रोज 7,000 किलो सीएनजी गैस बनाई जाती है। कुछ स्थानों पर बैलचालित जनरेटर सफलतापूर्वक चल रहे हैं। इसकी मदद से 150 फीट नीचे तक का पानी निकाला जा रहा है। इसके अलावा आटा चक्की, कुट्टी काटने की मशीन और थ्रेशर आदि भी इससे चलते हैं। बनारस में श्री वाचस्पति त्रिपाठी बैलों से आटा चक्की चलाते हैं। वे ठंडा आटा बनाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी है। उसकी बहुत मांग है। मथुरा के पास राधा जी के गांव बरसाना में पूज्य रमेश बाबा (जिनके पास 40,000 से अधिक गायें हैं जो कत्लखानों से बचाई गई हैं) ने 3,000 घनमीटर का एक गोबर गैस संयंत्र लगाया है जिसकी मदद से वे पूरे बरसाने को बिजली देने की तैयारी कर रहे हैं।

केन्द्र सरकार की भी कई योजनाएं हैं। वे देख रहे हैं कि बड़े गोबर गैस संयंत्र लगाकर पाइपलाइन के माध्यम से गैस घरों में कैसे दी जा सकती है। दिल्ली आईआईटी के प्रोफेसर विरेन्द्र विजय के माध्यम से यह प्रयास हो रहा है। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों पर यदि विधानपूर्वक सोमयज्ञ किया जाए तो पूरे भारत में अकाल नहीं पड़ेगा, यह अपने पूर्वजों द्वारा दी गई गांरटी है। इसका प्रांरभ 4 फरवरी, 2017 से रामेश्वरम में हो रहा है।

जैविक कृषि को लेकर देशभर में प्रेरक प्रयास हो रहे हैं जिनके अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में लाखों किसान इस दिशा में सक्रिय हुए हैं। छोटे-छोटे स्थानों पर भी किसानों को जैविक कृषि सिखाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित हो रही हैं और लोग गंभीरता से इसे सीखना चाहते हैं। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में भाऊसाहब भुस्कुटे न्यास का प्रयास प्रशंसनीय है। कर्नाटक में कई हजार किसान कृषि प्रयोग परिवार के माध्यम से जैविक कृषि कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में करीब नौ लाख किसान इसमें लगे हैं। इन्दौर में अजित और रवि केलकर के माध्यम से लोग जैविक कृषि से जुड़ रहे हैं। अमरावती के सुभाष पालेकर के कारण देशभर में बड़ी संख्या में लोग जैविक कृषि में लगे हैं। यवतमाल में सुभाष शर्मा भी बहुत अच्छा प्रयास कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थानाभवन में एक किसान धर्मपाल सिंह ने जैविक कृषि के माध्यम से गन्ना उत्पादन का रिकार्ड बनाया है। उन्होंने एक एकड़ में एक हजार कुंतल गन्ना पैदा किया है। इसी प्रकार असम के तिनसुकिया में दिनेश पारीख ने जैविक कृषि के बहुत अच्छे उदाहरण खडे़ किए हैं। अमदाबाद के गोपालभाई सुतरिया ने 30 किलो से अधिक दूध देने वाली 70 गायें तैयार की हैं। पिछले सात साल में 1,000 से अधिक माता-बहनों को गोबर का रस देकर दर्दरहित सामान्य प्रसूति कराई गई है। देश में कुछ स्थानों पर गोअभयारण्य स्थापित करने के प्रयास भी हुए हैं। मध्य प्रदेश में एक अभयारण्य शीघ्र ही शुरू होने वाला है। हरियाणा और अन्य स्थानों पर भी प्रयास जारी हैं। गोसेवा के इन सभी प्रयासों को देखने के बाद निकट भविष्य में बहुत अच्छे परिणाम सामने आने का विश्वास है।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय गोसेवा प्रमुख हैं)

प्रस्तुति : प्रमोद कुमार

 

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