विभाजन का असली इतिहास
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विभाजन का असली इतिहास

Written byArchiveArchive
Dec 5, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 05 Dec 2016 12:00:32


स्वातंत्र्य समर के बाद नागरिकों की रक्षार्थ आगे आए स्वयंसेवकों की अमिट गाथा

 श्रीधर पराडकर

भारत के विभाजन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों में जिस प्रकार संघ ने समाजहित में आगे रहकर काम किया, वह असाधारण था। युद्धकाल हो या प्राकृतिक आपदा, स्वयंसेवक स्वत:स्फूर्त प्रेरणा से राष्ट्रकार्य में सबसे आगे रहे हैं। यही कारण है कि देश ही नहीं, विश्वभर में आज संघ के प्रति श्रद्धा है

विभाजन की विभीषिका की चर्चा करने पर अक्सर कहा जाता है कि 70 वर्ष पुरानी घटनाओं की चर्चा करने की आवश्यकता क्या है? अब इन गड्डे़े मुदार्ें को उखाड़ने का क्या औचित्य है? इससे तो भूतजीवी बनने की प्रवृति समाज में पनपेगी।'' परन्तु देश व समाजहित की कसौटी पर कसकर हम निष्कर्ष निकालेंगे तो यही उत्तर मिलेगा कि 70 साल बाद भी इस इतिहास को प्रकाश में लाना हर दृष्टि से उपयोगी है, वांछनीय है।

 

 

संघ ने खोले राहत शिविर

लाहौर की तरह ही अन्य स्थानों पर संघ के स्वयंसेवकों ने विस्थापितों के लिये शिविर खोले थे। डेराबाबा नानक के शिविर में 50000 लेगों की व्यवस्था थी, इसी प्रकार माधवपुर में 10000, सुजानपुर में 3500, गुरुदासपुर में 4000, बटाला में 7000, धर्मवाल में 1000 की व्यवस्था स्वयंसेवकों ने की। अबोहर में 65000 लोगों को 15 दिन तक भोजन दिया तथा 25000 लोगों को बर्तन दिये। 10 सितंबर को भारी उत्पात कर दिल्ली कब्जाने की देश विघातकों की योजना थी। स्वयंसेवकों ने कुलपति की कोठी से योजना के कागजात अपने कब्जे में लिये और गृह मंत्री को सौंपे।कागजातों के आधार पर सैन्य कार्यवाही हुई, दिल्ली बच गई।

 

 

यह कोई सामान्य इतिहास नहीं है, चिरप्रेरणा देने वाला इतिहास है। इसे वीर देशभक्त स्वयंसेवकों ने, माता-बहनों ने व हमारे सैनिकों ने अपने खून से लिखा है। इतिहास में हम आज तक पद्मिनी के जौहर को ही प्रेरणा के लिये उद्धृत करते आये हैं, परन्तु यह इतिहास तो असंख्य पद्मिनियों की जौहर ज्वालाओं से आलोकित है। इस इतिहास में से एक दो नहीं, असंख्य वीर हकीकत व अभिमन्यु झांकते नगर आते हैं। अनेक बाजीप्रभु देशपांडे अवतरित हुए थे। विश्व में जो

कभी भी और कहीं भी उदात्ततम और प्रेरणादायी घटा है, उन सबके नमूने एक साथ देश विभाजन के समय सजीव हो उठे थे। उसके विस्मरण से अपने अतिनिकट भूत में ही उपस्थित किये गये तेजस्वी उदाहरणों से प्रेरणा पाने से समाज वंचित रह जाता है और अपनी भूख मिटाने हेतु दूर के भूतकाल को ही टटोलता रह जाता है।

बड़े ही छलपूर्वक घोषणा की जाती है कि, 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल़.़', पर वास्तविकता अलग ही रही है। जहां एक ओर संपूर्ण देश में स्वतंत्रता का स्वागत हषार्ेल्लास के साथ किया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी कब्जे वाले पंजाब, सिंध व बंगाल के हर शहर, हर गांव में मोहल्ले के मोहल्ले धू-धू कर जल रहे थे। हिन्दुओं के मकान-दुकानों को खुलेआम लूटा जा रहा था। मां-बहनों पर जो गुजरी थी वह तो कल्पना से परे ही है। हर ओर लाशों के ढेर लगे थे। परिणामस्वरूप अपनी जमीन-जायदाद ही नहीं बल्कि परिवार के सदस्यों को खोकर शरणार्थियों के काफिले आजाद भारत की ओर रोते-बिलखते हुए आये थे। उनके कष्टों का पारावार नहीं था। उसको आज भी कैसे भूला जा सकता है और क्यों कर भूलना चाहिये?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक देश पर आये प्रत्येक संकट के समय कसौटी पर खरे उतरे हैं। फिर चाहे वह संकट प्राकृतिक हो, दैवीय अथवा मानवीकृत। ऐसा ही संकट देश पर उस समय आया था जब स्वतंत्रता प्राप्ति को आतुर हमारे देश के तत्कालीन नेताओं ने देश का विभाजन स्वीकार कर लिया था। जबकि वे देशवासियों को आश्वासन देते रहे थे कि लोग निश्चिन्त रहें, किसी भी हालत में देश का विभाजन स्वीकार नहीं किया जायेगा। उनके वचनों पर विश्वास कर जनता आश्वस्त थी। उसका पूर्व का अनुभव भी था कि राज्य बदलते हैं, राजा बदलते हैं पर प्रजा वही रहती है और वहीं रहती है। इसी कारण लोगों ने विभाजन से उत्पन्न होने वाली स्थिति की कोई तैयारी भी नहीं की थी। लेकिन अपने वचन से मुकर कर नेताओं ने देशवासियों को भीषण संकट में डाल दिया था।

देश का विभाजन स्वी

त हुआ और नये बने पाकिस्तान में हिन्दुओं के मकान, दुकान, व्यवसाय, खेती-बाड़ी ही नहीं, प्राण तक संकट में पड़ गये। उनकी सहायता करना तो दूर, पुकार तक सुनने वाला कोई नहीं था। ऐसे समय देश, समाज, धर्म को समर्पित संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता के लिये आगे आये और जैसी, जितनी संभव थी, सहायता की। पहली आवश्यकता हिन्दुओं को वहां से सुरक्षित निकालने की थी। दूसरी उनके लिये जीवनावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की थी और तीसरी, भारत पहुंचने पर उनको बसाने की थी। ये तीनों ही काम स्वयंसेवकों ने बड़े साहस, बहादुरी व सूझबूझ से किये। अपनी स्वयं की, अपने परिवार की चिन्ता किये बिना वे प्राणपण से मोर्चे पर डटे रहे। हिन्दुओं की रक्षा के लिये उन्हें जो कुछ करना पड़ा, वह उन्होंने किया। एक आलेख में सबका वर्णन करना तो संभव नहीं है, पर बानगी के तौर पर कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।

पंजाब

पश्चिमोत्तर प्रान्त से लुट-पिटकर लाहौर की ओर आ रहे शरणार्थियों की सहायता के लिये सहायता समिति का गठन किया गया था। इस सहायता समिति में कांग्रेस के लोग भी थे और स्वयंसेवक भी। लेकिन पहले ही दिन से दिक्कतें आने लगीं। कांग्रेस के नेता केवल बयानबाजी करते, पीडि़तों की सहायता के लिये प्राप्त सामग्री व वाहनों का नि:संकोच प्रयोग करते। स्वयंसेवक तो अपना काम प्रामाणिकता से कर रहे थे। इस पर भी उनके काम में रोड़े अटकाये जाने लगे। तब स्वयंसेवकों ने 'पंजाब रिलीफ कमेटी' का गठन कर अलग से काम प्रारंभ किया। स्वयंसेवकों के अलग होते ही कांग्रेसियों की सहायता समिति निष्प्राण हो गयी, क्योंकि नि:स्वार्थ भाव से कार्य करने वाले कार्यकर्ता उनके पास कम ही थे।

निराधार, निराश्रित पीडि़तों को सब प्रकार की सहायता की आवश्यकता थी, क्योंकि अपने घरों से बिना कुछ सामान व धन लिये उन्हें भागना पड़ा था। अधिकांश तो बस तीन वस्त्रों में ही भागने को मजबूर हुए थे। संघ की अपील पर केशधारी व सहजधारी, दोनों ने सहयोग के दरवाजे मुक्त रूप से खोल दिये थे। स्वयंसेवक जहां भी   जाते, अपेक्षा से अधिक सहयोग मिलता। यहां तक कि कोई फटे-पुराने कपड़े सहायता में नहीं देता था। लोग नये कपड़े ही देते थे। संघ द्वारा संचालित सहायता शिविर में नये कपड़ों, औषधियों व अन्न की कभी नहीं रही। स्वयंसेवक सहायता मांगने चादर लेकर निकलते और कुछ ही समय में वह रुपयों से भर जाती थी। इसमें संघ के प्रति लोगों का विश्वास ही कारणीभूत था कि उनके द्वारा दिये जा रहे सहयोग का दुरुपयोग नहीं होगा और स्वयंसवेक के हाथ में दिया जा रहा धन सही जगह पहुंचेगा।

प्रारंभ में समिति का कार्यालय लाहौर के रतन बाग में दीवान कृष्णकिशोर की कोठी में खोला गया। कमेटी द्वारा दो शिविर लगाये गये। एक स्टेशन के सामने और दूसरा अरोड़ा वंश हॉल में। जब काम बढ़ा तो मोंटगुमरी रोड पर डॉ. गोकुलचंद नारंग की कोठी में कार्यालय ले जाया गया। उनकी कोठी में एक विशाल तहखाना था। वह भी छत तक सहायता सामग्री से अट जाता। धीरे-धीरे आवश्यकता के अनुसार समिति का कार्यक्षेत्र बढ़ता गया। निर्वासितों की सेवा के अलावा समिति को कई अन्य दायित्व निभाने पड़ रहे थे। यथा, दंगों के दौरान संकटग्रस्त क्षेत्रों में फंसी महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों को निकालकर शिविरों या सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना, दंगाग्रस्त मोहल्लों में जाकर फंसे हिन्दुओं को संरक्षण देना तथा हमलावरों को सबक सिखाना, घायलों को अस्पताल ले जाकर उनके उपचार की व्यवस्था करना। मृतकों के शवों का अंतिम संस्कार करना। आग बुझाने का साधन उपलब्ध कराना। सेना की सहायता से अपहृत महिलाओं को अपहर्ताओं के कब्जे से छुड़ाकर लाना इत्यादि। दिनोंदिन विस्थापितों की संख्या बढ़ती जा रही थी। सब ओर से लोग आने लगे थे। तब रिलीफ कमेटी की शाखाएं प्रान्त के कस्बों व नगरों में भी खोली गयीं। सभी स्थानों पर जनता का सहयोग लाहौर की भांति ही मिला। हालांकि यहां के लोगों को भी पता था कि शीघ्र ही उन्हें भी विस्थापित होना है।

पाकिस्तान बनने के पहले लाहौर के डी़ ए़ वी़ शिविर की व्यवस्था पंजाब पीडि़त सहायता समिति ही जन सहयोग से करती थी, परन्तु जब पाकिस्तान बन गया और लाहौर से पलायन शुरू हो गया, तब उस शिविर की व्यवस्था भारत सरकार ने संभाली। समिति के बाकी लोग तो वेतनभोगी थे पर 100 से अधिक स्वयंसेवक नि:स्वार्थ भाव से वहां सेवा कार्य करते थे। आसपास के जिलों में अपहृत महिलाओं तथा वहां अब भी फंसे हिंदुओं को शिविर में लाने का दायित्व भी इनका था।

अमृतसर में पंजाब रिलीफ कमेटी और कांग्रेस की कमेटी का शिविर लगा था। पर आने वाले विस्थापित कांग्रेस से इतने चिढ़े हुए थे कि वे उनके कार्यकर्ताओं की सूरत भी देखना नहीं चाहते थे। उन पर उनका कोई भरोसा नहीं था। जब विस्थापितों से भरी रेलगाड़ी अमृतसर के स्टेशन पर आती तो वहां संघ के स्वयंसेवक काली टोपी में तथा कांग्रेस के कार्यकर्ता सफेद टोपी में उपस्थित रहते थे। परन्तु विस्थापित प्राय: एक स्वर में कहते थे कि हमें तो संघ के स्वयंसेवकों ने ही बचाया है, हमें उन पर ही भरोसा है, हम उनके साथ ही जायेंगे। इन सफेद टोपी वालों के कारण ही तो हमें अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा है।

लाहौर की तरह ही अन्य स्थानों पर संघ के स्वयंसेवकों ने विस्थापितों के लिये शिविर खोले थे। डेराबाबा नानक के शिविर में 50000 लेगों की व्यवस्था थी, इसी प्रकार माधवपुर में 10000, सुजानपुर में 3500, गुरुदासपुर में 4000, बटाला में 7000, धर्मवाल में 1000 की व्यवस्था स्वयंसेवकों ने की। अबोहर में 65000 लोगों को 15 दिन तक भोजन दिया तथा 25000 लोगों को बर्तन दिये।

जैसी कथनी, वैसी करनी

संघ के स्वयंसेवकों को निर्देश था कि वे भगदड़ न मचने दें, अपने स्थान पर रहें और समाज में साहस जगायें। स्वयंसेवकों ने इस बात का पूरा प्रयास किया, पर स्थितियां ऐसी बन रही थीं जिनमें समाज के अनेक लोग भागकर अमृतसर आदि स्थानों पर जा रहे थे। फिर भी स्वयंसेवकों ने आचरण के अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। उनके पास अपनी धन-दौलत लेकर पूर्वी पंजाब अथवा दिल्ली जाने के पर्याप्त अवसर थे। लेकिन स्वयंसेवकों ने ही नहीं, उनके परिवारवालों ने भी उन अवसरों का लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया।

पंजाब के बाजीप्रभु

17 अगस्त को 1947 को सीमा निर्धारण आयोग ने घोषणा कर दी कि झंग पाकिस्तान में जायेगा। आसपास से आये मुसलमानों ने झंग शहर पर हमला बोल दिया। शाहजीवना कस्बे के सैयद हुसैन व उसका भाई आबिद हुसैन मुस्लिम लीग के प्रभावी नेता थे। उन्होंने ही मुसलमानों को हमले के लिये उकसाया था। झंग में संघ की अच्छी शाखा थी। किशनचंद नारंग व बालकृष्ण नाारंग ध्येयनिष्ठ कार्यकर्ता थे। उनका घर नूरशाह गेट के बाहर था। हमला उसी ओर से हुआ था। दोनों भाइयों ने विचार किया कि हमलावरों को कुछ देर यहीं नहीं रोका गया तो शहर में सैकड़ों हिन्दुओं की नृशंसतापूर्ण हत्या हो जायेगी। आगे जाने के लिये उनके घर के सामने से ही संकरा रास्ता था। दोनों भाई तलवारें लेकर रास्ते पर डट गये। संघर्ष शुरू हो गया। हमलावरों को ऐसे प्रतिरोध की कल्पना नहीं थी। हमलावरों ने उनके घर में आग लगा दी, महिलाओं पर अत्याचार शुरू किये, पर दोनों भाई मोर्चे पर चट्टान की तरह डटे रहे। कुछ देर बाद बालकृष्ण का एक हाथ शत्रु की तलवार से कट गया। फिर भी वह लड़ता रहा। दोनों भाइयों ने अंतिम सांस तक शत्रुओं को शहर में घुसने नहीं दिया। वे अपने परिवार को बचाने की कोशिश कर सकते थे, पर अपने शहर के लिये उन्हांेने बलिदान देना उचित समझा। उनके कारण सैकड़ों हिन्दू सुरक्षित स्थान पर पहुंच सके थे।

जन विश्वास

मजहबी गुंडे केशधारियों के तो जानी दुश्मन बन गये थे। जब उन्हें यह लगने लगा कि मुल्तान में उनका रहना असंभव हो गया है तब अनेक धर्मप्रेमी केशधारी बंधु संघ कार्यालय में आये। उन्होंने संघ अधिकारियों से कहा कि अब हम यहां नहीं रह सकते, हम जाने को विवश हैं। हम अपने इस पवित्र ग्रंथ की रक्षा भी नहीं कर सकते, क्योंकि यहां न तो हम सुरक्षित हैं, न गुरुद्वारे। इसलिये आप इस धरोहर को संभालें। हमें विश्वास है कि आप संघ कार्यकर्ता हर हालत में इसकी पावनता की सुरक्षा करेंगे।

गुरुदासपुर को बचाया

 

यह लगभग तय हो गया था कि गुरुदासपुर जिला पाकिस्तान में जायेगा। हालांकि गुरुदासपुर हिन्दू बहुल जिला था। यदि गुरुदासपुर पाकिस्तान में चला जाता तो भारत और कश्मीर को जोड़ने वाला कोई मार्ग बचता ही नहीं और भारत का कश्मीर से सीधा संपर्क ही समाप्त हो जाता। 15 अगस्त तक गुरुदासपुर में भारत और पाकिस्तान के झण्डे लहरा रहे थे। मुसलमान पूरी तरह तैयार थे, हिन्दू हताश थे। पर स्वयंसेवक हताश नहीं थे। उन दिनों राशनकार्ड पर परिवार की संख्या के साथ-साथ यह भी अंकित होता था कि वे हिन्दू हैं या मुसलमान। इसका लाभ उठा कर स्वयंसेवकों ने योजना बनायी और फर्जी राशन इंस्पेक्टर बन कर गांव-गांव जाकर लोगों के राशन कार्ड जांचे और आवश्यक जानकारी एकत्र कर सीमा निर्धारण आयोग को देकर उसे अपना निर्णय बदलने के लिये बाध्य किया। इस प्रकार एकत्र आंकड़ों के आधार पर ही हिन्दू बहुल गुरुदासपुर जिला पाकिस्तान जाने से ही नहीं बचा, अपितु जिले के हिन्दुओं का कत्लेआम नहीं हो सका।  

जम्मू-कश्मीर

विभाजन के समय तक जम्मू-कश्मीर में संघ कार्य विस्तार पा चुका था। तभी स्वयंसेवक जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की जान बचाने में सफल हुए थे। हुआ यह कि 18 अक्तूबर से 6 दिन के प्रवास पर महाराज सीमावर्ती गांवों में प्रवास करने वाले थे। जम्मू के पुलिस अधीक्षक और चीफ ऑफ स्टाफ आस्तीन के सांप थे। दोनों लीगी जेहनियत के थे। दोनों ने प्रवास की सूचना शत्रुओं को देकर महाराज के अपहरण का षड्यंत्र रचा था। 21 अक्तूबर को भिम्बर में उनके अपहरण की योजना थी। स्वयंसेवकों ने दो दिन पहले इसकी सूचना महाराज को देकर सतर्क कर दिया। महाराज ने आखिरी समय पर प्रवास में परिवर्तन किया और उनके अपहरण की योजना विफल हो गयी।

कोटली नगर को जिहादियों ने घेर रखा था। कर्नल पठानिया छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ नगर की रक्षा कर रहे थे। सेना के आने की प्रतीक्षा थी। 56 दिन तक स्वयंसेवक व कर्नल पठानिया के सैनिकों ने जिहादियों से नगर की रक्षा की। तब जाकर भारतीय सेना सहायता के लिये पहुंची थी। लेकिन यह सहायता भी हिन्दुओं को कोटली से सुरक्षित निकाल ले जाने के लिये ही भेजी गयी थी। इस प्रकार 56 दिनों का संघर्ष सफल होकर भी विफल हो गया और कोटली गुलाम कश्मीर में चला गया।

संघ के स्वयंसेवक हर मोर्चे पर काम करने को तत्पर थे। छाजन मंे सेना तो पहुंच गयी थी पर उसकी बख्तरबंद गाडि़यों और ट्रकों का छाजन पहुंचना संभव नहीं था। इस हेतु चीफ इंजीनियर दौलतराम ने एक घुमाव बनाने पर मजदूर लगाये। पर मजदूर तो मजदूर थे, वे अपनी गति से काम कर रहे थे। तब चीफ इंजीनियर संघ प्रमुख अमृतसागर जी से मिले और रास्ता बनवाने में मदद की बात की। तुरन्त 60 स्वयंसेवक उनके साथ कर दिये गये। स्वयंसेवक वेतनभोगी मजदूर तो थे नहीं। वे जाते ही जी-जान से काम में जुट गये और तीन घण्टे में काम पूरा कर दिया। ऐसा ही तब हुआ जब पुंछ में सेना के हवाई जहाज उतारने के लिये हवाई पट्टी की आवश्यकता थी। सेना भी जानती थी कि संघ के स्वयंसेवक उनकी सहायता करेंगे ही। बिग्रेडियर प्रीतम सिंह ने संघ प्रमुख अमृतसागर जी से अपनी आवश्यकता बताई। दोनों ने नागरिकों व बाहर से आये विस्थापितों की बैठक बुलायी और हवाई पट्टी निर्माण की आवश्यकता के बारे में बताया। उत्साहपूर्ण प्रतिसाद मिलते ही हजूरीबाग के विशाल बगीचे के स्थान पर हवाई पट्टी बनाने का काम प्रारंभ किया गया। देखते ही देखते पेड़ों को काटकर तथा कुछ मकानों को हटाकर बगीचे को सफाचट मैदान में तब्दील कर दिया गया। इस कार्य में स्वयंसेवकों के साथ नगरवासियों का सहयोग अतुलनीय रहा। 72 घण्टे के अनवरत सामूहिक प्रयास से हवाई पट्टी तैयार हो गयी और जहाजों का उतरना प्रारंभ हो गया। नित्य 35 जहाज उतरने लगे।

इस हवाई पट्टी के निर्माण से भारतीय सेना की भारी कुमुक आ सकी और युद्घ का पासा पलट गया। दुश्मन सिर पर पैर रख कर भाग खड़ा हुआ। पुंछ शहर ही पाकिस्तानियों के हाथों जाते-जाते नहीं बचा, वरन् 40,000 नागरिक भी मौत के मुंह में जाने से बच गये।

पंजाब की ही तरह जम्मू-कश्मीर, बंगाल, असम में भी स्वयंसेवकों ने शिविर लगा कर सहायता कार्य किया। जम्मू-कश्मीर में पं़ प्रेमनाथ डोगरा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया था। जम्मू-कश्मीर सहायता समिति द्वारा 15 मार्च, 1947 से 10 अक्तूबर, 1947 तक तीन लाख लोगों को किसी न किसी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई गई। सैकड़ों परिवारों को बसाया गया। जम्मू से लेकर कठुआ तक 20 सहायता शिविर चलाये गये थे।

दिल्ली

देश के मध्य दिल्ली में भी षड्यंत्रकारियों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। 10 सितंबर को भारी उत्पात कर दिल्ली कब्जाने की देश विघातकों की योजना थी। पर स्वयंसेवकों ने जान पर खेल कर कुलपति की कोठी से योजना के कागजात अपने कब्जे में लिये और गृह मंत्री को सौंपे। उन कागजातों के आधार पर बड़ी सैन्य कार्यवाही के बाद दिल्ली बच सकी। दिल्ली बचाने के इस संघर्ष में 100 साहसी स्वयंसेवक शहीद हुए थे।

दिल्ली से सहायता सामग्री एकत्र कर संघ स्वयंसेवकों ने पंजाब भेजी थी। लेकिन जब विस्थापित दिल्ली आने लगे तब उनके लिये दिल्ली में भी शिविरों की व्यवस्था की गयी। बिरला मिल के सामने विशाल मैदान में शिविर स्थापित किया गया। इसमें 25,000 विस्थापित रहते थे।

ताकि सनद रहे

देश विभाजन की घटना हो गई। उसे रोका नहीं जा सका। पर उससे जो संदेश हिन्दू समाज को मिला उसे समाज द्वारा पूर्णत: ग्रहण करना शेष है। विभाजन का पहला संदेश यह है कि ऐसी त्रासदियों से बचना है। वे फिर से न दुहरायी जायें।  दूसरे, तब लोग उन्मादी तत्वों से अपनी बहू-बेटियों की रक्षा नहीं कर सके थे। उस लिहाज से सबल होना होगा। 

तीसरा संदेश यह है कि जिन्हें पाकिस्तान जाना था वे पाकिस्तान चले गये। जो इस देश को अपना देश मान कर यहीं रह गये, उनका पूर्ण भारतीयकरण नहीं किया गया। विभाजन दु:स्वप्न नहीं वरन् वास्तविकता था। उससे सबक लेने के लिये सतत स्मरण, चिंतन, मनन जरूरी है।    लेखक अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री हैं

 

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