श्रद्धांजलिविवेकानंद के प्रतिरूप थे सुरु जी
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श्रद्धांजलिविवेकानंद के प्रतिरूप थे सुरु जी

Written byArchiveArchive
Nov 28, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 28 Nov 2016 17:03:28

 

वी. भागैया

अदम्य साहसी, प्रेम के प्रतीक, कद्दावर शख्सियत, मानवता को समर्पित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरष्ठि प्रचारक श्री के सूर्यनारायणराव का पिछले दिनों 18 नवंबर की रात 11:15 पर देहावसान हो गया। सौभाग्य की बात है कि हाल ही में 9 नवंबर को बेंगलुरू अस्पताल में मुझे उनसे मिलने का अवसर मिला था। उस समय उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था और उन्होंने 20 मिनट तक बात भी की थी। उनके व्यवहार में वही प्रेम और वश्विास था। अमेरिका दौरे पर कार्यकर्ताओं ने स्व. रावजी के बारे में पूछा तो भारत लौटने के बाद मैंने उन्हें फोन किया। वह बहुत खुश हुए और बोले- फोन पर जब मैं यह सुन रहा हूं तो मुझे बहुत खुशी हो रही है। उनकी महानता ऐसी थी।

वास्तव में जब हम उन्हें सुनते थे तो हमें खुशी होती थी और प्रेरणा मिलती थी। जब मैंने उन्हें सेन फ्रांसस्किो में विजयादशमी उत्सव और आंध्र प्रदेश में अखिल भारतीय शारीरिक वर्ग तथा कॉलेज छात्रों के शिविर के बारे में बताया तो वे बोले, ''संघ के काम कई तरह से बढ़ रहे हैं। कई नए लोग आ रहे हैं, जम्मिेदारी उठा रहे हैं और नष्ठिा से काम कर रहे हैं। मैं बहुत खुश हूं। यह सब ईश्वर की

कृपा है।''

सूर्य नारायणराव जी, जन्हिें हम सुरु जी कहते हैं, ने पूरे देश का भ्रमण किया और सेवा विभाग की स्थापना की। कई जगहों पर लोग जब उनसे पूछते कि इतने दबाव के बावजूद आप हमेशा प्रसन्न कैसे रहते हैं तो वे कहा करते थे, ''मैंने कभी तनाव लिया ही नहीं। संघ का काम मेरे जीवन का ध्येय है। मैं सभी से स्नेह करता हूं इसलिए कोई तनाव नहीं होता।'' उनके जीवन पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव था। वे अपने जीवन में शेर की भांति जिये। अस्पताल में कई दिनों से कष्ट में होने के बावजूद उन्होंने इसे जाहिर नहीं किया।

9 नवंबर को जब मैं उनसे मिला, तब वे प्रसन्नचत्ति, अपार स्नेह और वश्विास से भरे हुए थे। संघ कार्यकर्ताओं की इस पीढ़ी के लिए यह सब स्मरणीयहै। वे संघ के विकास और विभन्नि क्षेत्रों में काम कर रहे स्वयंसेवकों, नए लोगों के आने तथा उन्हें जम्मिेदारी उठाते देख बहुत संतुष्ट थे।

वज्ञिान में स्नातक होने के बावजूद वे 1946 से प्रचारक जीवन में आ गए। वे दक्षिण क्षेत्र के प्रचारक थे, लेकिन संघ चाहता था कि वे तमिलनाडु प्रांत में प्रचारक के रूप में काम करें। उन्होंने नष्ठिापूर्वक कई वर्षों तक प्रान्त में प्रचारक रूप में काम किया। 75 साल के बाद कार्यकर्ताओं को कार्यकारिणी पद छोड़ना पड़ता है। लेकिन सुरू जी ने इस परंपरा को न केवल समृद्ध किया, बल्कि आखिरी सांस तक सक्रिय रहे और सभी स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करते रहे। एक बार मध्याह्न भोजन के बाद उन्हें एक स्वयंसेवक के पास ले जाया गया, जो एक छोटी पहाड़ी पर कमरे के फर्श पर पत्थर लगा रहा था। यह देखकर उन्होंने कहा, ''मैं खुश हूं कि संघ सुदूर इलाके में काम कर रहा है।''

हमारे अपने समाज के दबे-कुचले वर्गों के लिए उनकी चिंता ऐसी थी।

कर्मठता की उस अनुपम मूर्ति को भावसक्ति श्रद्धांञ्जलि।

    (लेखक रा. स्व. के सह सरकार्यवाह हैं)

 

''संघ कार्यकर्ताओं ने एक और अभिभावक खो दिया''

 

श्री मोहनराव भ्ाागवत,                                                 सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

 

श्री के. सूर्यनारायणराव जी के देहावसान का आघात हम सब संघ कार्यकर्ताओं के लिए वरष्ठि अनुभवी पितृसमान कार्यकर्ता की छत्रछाया उठ जाने का अतीव दु:खद अनुभव है। कुछ दिन पहले ही स्व. सूर्यनारायणराव जी के परिवार में उनके सबसे कनष्ठि बंधु श्री गोपीनाथ का निधन हुआ। उसके तुरंत बाद यह दूसरा आघात भी परिवार सहित हमको व्याकुल करता है, फिर भी प्रकृति के नियमों के सामने हतबल होकर पचाना पड़ेगा। श्री सूर्यनारायणराव जी कर्नाटक में संघकार्य के प्रारंभिक दिनों से जुड़े रहे। उन्होंने प्रथम प्रतिबंध के प्रतिकार का पर्व सहभागी होकर देखा था। बाद में तमिलनाडु उनका कार्यक्षेत्र बना। तमिलनाडुु के कार्य के आज के स्वरूप की सृजना में वे एक प्रमुख सर्जक थे। वैसे ही संघ, कार्य के सेवा विभाग की प्रारंभिक और मूल रचना अखिल भारतीय सेवा प्रमुख के नाते उन्हीं के हाथों से हुई।

स्वामी विवेकानंद के साहत्यि का उनका गहन और वस्तिृत अध्ययन था। आत्मीय स्वभाव, कठोर परश्रिम तथा संघशरणता का दर्शन उनके आचरण में सहज ही झलकता था। उनके जाने से हम आज के संघ कार्यकर्ताओं ने एक और अभिभावक खो दिया है। माननीय श्री के. नरहरि तथा श्रीमती रुक्मिणी अक्का व परिवार की सांत्वना हम कैसे करें? हम सबकी स्थिति एक जैसी है।

संघ कार्यकर्ता के संघ प्रचारक के जीवन की जिस परंपरा को श्री सूर्यनारायणराव ने अपनी जीवन समिधा से समृद्ध व अग्रेसर किया, उसको अपने योगदान से अधिक समृद्ध करने का कर्तव्य हम सबके सामने उपस्थित है। उसको पूरा करने की शक्ति व धैर्य परमात्मा हम सबको दे तथा स्वयं की अखण्ड तपस्या से अर्जित उत्तम गति के मार्ग पर श्री सूर्यनारायणराव जी की दिवंगत जीवात्मा को शांति व आश्वस्त प्राप्त हो, यह प्रार्थना करता हुआ, मैं उनकी आत्मीय, पवत्रि व प्रेरक स्मृति में अपनी व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।  

 

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