|
शिक्षा शब्द बना है सीख से। यानी अनुभव से सीखना और इसे अगली पीढ़ियों की ओर बढ़ाना। विडम्बना ही है कि अर्जित ज्ञान और सीखने के परंपरागत तरीकों को भूल हम एक भटकाव भरी राह पर चल पड़े हैं। बात हो रही है भारतीय ज्ञान आयोग और शिक्षा सुधारों की दिशा की। देश के प्रधानमंत्री की उच्चस्तरीय सलाहकार संस्था का उद्देश्य भारत को ज्ञानवान समाज बनाना है। अंग्रेजी के मुरीद आयोग की सिफारिश रही है कि 'अब समय आ गया है कि देश के लोगों, आम लोगों को स्कूलों में भाषा के रूप में अंग्रेजी पढ़ाएं। अगर इस मामले में तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी जाए तो एक समाहित समाज की रचना करने और भारत को एक ज्ञानवान समाज बनाने में मदद मिलेगी।' ऐसे में सवाल दो हैं। पहला, क्या विचार किसी खास भाषा का गुलाम है, और क्या अक्ल की बात सिर्फ अंग्रेजी में की जा सकती है? दूसरा, सुधारों के नाम पर प्राथमिक शिक्षा में बच्चों की बुनियाद बिगाड़कर हम किस ज्ञानवान समाज की रचना करने चले हैं?
दूरबीन छोड़िए, जब चश्मे का भी आविष्कार नहीं हुआ था तब भारतीय मनीषी नंगी आंखों से नक्षत्रों की गति बता देते थे। चर्च की मान्यता के उलट हमें सदियों से पता था कि धरती चपटी नहीं गोल है और सूर्य की परिक्रमा करती है। मगर हम अपना ज्ञान भूलकर खुद पश्चिम की परिक्रमा करने लगे। गोरों की चाकरी के लिए कालों की 'फौज' चाहिए थी। दांव खेला मैकाले ने, और तबसे हम एक भाषा को ही संपूर्ण ज्ञान मानने की भूलभुलैया में फंसते जा रहे हैं। अंग्रेजी जानना अच्छी बात हो सकती है मगर शैक्षिक सुधारों के नाम पर अंग्रेजी को अनिवार्य तौर पर बढ़ाने की इस कसरत ने प्राथमिक शिक्षा को मटियामेट कर डाला है। इस मामले में देश में शिक्षा के स्तर को सामने रखने वाली एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन (असर) की रिपोर्ट से आंखें खुल जानी चाहिए थीं। रिपोर्ट बताती है कि पांचवी कक्षा के आधे से ज्यादा बच्चे कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पाते। चौथी कक्षा के एक चौथाई बच्चे पढ़ नहीं सकते। कक्षा 3 के 31 फीसदी से ज्यादा बच्चे अपनी ही भाषा में लिखे शब्द नहीं पढ़ पाते। और तो और दहाई के अंकों की घटा–जमा में भी ज्यादातर बच्चों को दिक्कत होने लगी है। यह हाल तब है जब स्कूलों में दाखिले की दर 97 और उपस्थिति का स्तर 71 फीसदी पहुंचने की वजह से नीति नियंता इठला रहे हैं। राष्ट्रभाषा की बजाय अंग्रेजी को बढ़ावा और अंग्रेजी शिक्षा के जरिए सम्पत्ति निर्माण का सपना दिखाकर भारतीय मेधा की धार कुंद करने का पासा फेंका जा चुका है। नौ राज्यों और तीन केन्द्र शासित प्रदेशों में पहली कक्षा से अंग्रेजी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है। इसके अलावा बारह राज्यों और तीन केन्द्र शासित प्रदेशों ने प्राथमिक स्कूलों की विभिन्न कक्षाओं में अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया है।
अंग्रेजी 'एप्पल' को चखने के चक्कर में हम हिन्दी का 'कायदा' और स्थानीय बोली की तर्ज पर बंधे पहाड़े बिसरा चुके हैं। शायद जानकर अचरज हो लेकिन पहली कक्षा की कुछ हिन्दी की पुस्तकें अब वर्णमाला से शुरू नहीं होतीं। क से कबूतर की कहानी ख से खत्म हो रही है, सिर्फ ग से गधा बनाने का खेल है जो जोरशोर चल रहा है।











