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भारत और चीन लगभग एक ही समय पर स्वतंत्र हुए थे। एक देश ने प्रजातंत्र का रास्ता अपनाया तो दूसरे ने कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही का। आज अगर हम इन दोनों देशों की तुलना करें तो आर्थिक और सामरिक, दोनों मापदंडों से चीन हमसे बहुत आगे निकल गया है। वह न केवल एशिया में सबसे शक्तिशाली देश के नाते उभर रहा है बल्कि अमरीका को चुनौती देने की स्थिति में पहुंचने की कोशिश में भी है। जब चीन में 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी तब उसका राजनीतिक नेतृत्व माओ के हाथ में था। माओ की सोच थी कि क्रांति हर समय चलती रहनी चाहिए, इसलिए उन्होंने कई प्रयोग किए, पर देश का विकास नहीं हो पाया। जब माओ युग का अंत हुआ तो 1979 में तंग श्याओ फंग ने सर्वोच्च नेता का पद संभाला। उन्होंने चीन को विकास का चार सूत्रीय मंत्र दिया- कृषि, विज्ञान, उद्योग और सैन्य-शक्ति। नतीजा सामने है कि चीन पिछले तीस साल से दस प्रतिशत विकास की दर से आगे बढ़ रहा है।
चीन का इतिहास देखें तो वह हमेशा एक साम्राज्यवादी देश रहा है। स्वतंत्र होते ही उसने पहला काम यह किया कि तिब्बत पर कब्जा कर लिया। उसके बाद कोरिया में संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं के साथ युद्ध किया। फिर भारतीय जमीन पर भी अपना हक जमाया और लद्दाख के अक्साई चिन इलाके के करीब 30,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा जमा लिया। इसके अलावा एशिया के तकरीबन हर देश से उसका कुछ न कुछ विवाद चल रहा है।
हमारी सबसे बड़ी चिंता इस समय चीन की बढ़ती सामरिक शक्ति है। चीन की थल सेना इस समय दुनिया की दूसरे नम्बर की सेना है और उसे अधिक शक्तिशाली बनाने में चीन कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। चीन का इस वर्ष का सैन्य बजट उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तकरीबन दस प्रतिशत है। उसके मुकाबले में हमारा सैन्य बजट सिर्फ 1.95 प्रतिशत है, जो कि आज तक का सबसे कम बजट है। ऐसा लगता है कि भारत सरकार को चीन से खतरे की कोई चिंता नहीं है। अभी हाल में हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन का बयान आया था कि भारत को चीन से कोई खतरा नहीं है और दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना नहीं है। लगता है कि हम फिर पचास के दशक वली सोच में खोए हैं, जब चीन की तमाम हरकतों के बावजूद हम 'हिन्दी-चीनी भाई-भाई' का नारा लगाते रहे, जिसका परिणाम सन् 62 की लड़ाई के रूप में आया। वह हार हम आज तक भुला नहीं पाए हैं।
अगर भारत और चीन की सामरिक शक्ति का आकलन करें तो कुछ तथ्य सामने आते हैं। चीन की थल सेना से हम लोहा ले सकते हैं। हमारी सेना की बढ़ोत्तरी भी हो रही है और सीमा पर सड़कों और अन्य सैन्य सुविधाओं का विकास हो रहा है। जहां तक नौसेना का प्रश्न है, हमारी नौसेना चीन से शक्तिशाली है, सिवाय पनडुब्बियों के क्षेत्र में। हमारे पास दो विमानवाहक जहाज भी हैं, जिससे हमें हिन्द महासागर में गश्त लगाने में सुविधा होगी।
जहां तक वायु सेना का सवाल है, चीन की दो समस्याएं हैं। एक तो यह कि उसके तमाम सैन्य हवाई अड्डे तिब्बत में ऊंचे स्थानों पर हैं जिससे उसकी साजो- सामान और अस्त्र-शस्त्र ले जाने की क्षमता बहुत प्रभावित होती है। इसके अलावा फिलहाल उसके युद्धक विमान हमारे जितने आधुनिक नहीं हैं। मिसाल के तौर पर जहां हमारे पास सुखोई-30 विमान है। इसके अलावा हम रफेल विमान भी ले रहे हैं। इसी कारण चीन अपनी वायु सेना के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। वह रूस से सुखोई-35 विमान खरीद रहा है, जिससे उसकी मारक क्षमता में काफी बढ़ोत्तरी हो जायेगी।
इसके अलावा जिसकी हमें अधिक चिंता करनी चाहिए वह बिन्दु है चीन की साइबर युद्ध क्षमता, मिसाइल क्षमता और परमाणु हथियार। इस तरफ भारत ने भी ध्यान देना शुरू कर दिया है, पर इन सामरिक शक्तियों के क्षेत्र में चीन हमसे बहुत आगे है। आने वाले समय में इसी भारतीय कूटनीति की परीक्षा होगी। हमें चीन के साथ सामान्य संबंध बनाये रखकर अपनी सैन्य-शक्ति का विकास करते रहना होगी, ताकि अगर युद्ध की स्थिति आती है तो हमें मुंह की न खानी पड़े। सैन्य बजट कम करने से पहले इस बात का विचार करना भी आवश्यक है। मेजर जनरल (से.नि.) शेरू थपलियाल
हमें चीन के साथ सामान्य संबंध बनाये रखकर अपनी सैन्य-शक्ति का विकास करते रहना होगा, ताकि अगर युद्ध की स्थिति आती है तो हमें मुंह की न खानी पड़े।











