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साहित्यिकी
तोल मोल के बोल
बड़े फायदे मौन के, जितना हो कम बोल।
अगर बोलना ही पड़े, शब्दों को लें तोल।।
अपने दुश्मन हो गए, सुन-सुन कड़वे बोल।
सुख जीवन की चाह तो, वाणी में रस घोल।।
मीठा सबसे बोलिए, रखो क्रोध को दूर।
संयम वाणी का गया, दुख देता भरपूर।।
आमदनी का अंश कुछ, जोड़ा करो जरूर।
विपदा आने पर वही, कष्ट करेगा दूर।।
बच्चों को तुम प्यार दो, बड़ों को दो सम्मान।
होगी बारिश प्रेम की, नहीं कभी अपमान।।
सबसे पहले छोड़ दो, तुम कुसंग का संग।
रस्ते भी मिल जाएंगे, नहीं रहोगे तंग।।
सुबह-शाम पूजा करो, दिन भर काटो जेब।
प्रभु नहीं मिल पाएंगे, बुरे से करो परहेज।।
हिस्सा किसी गरीब का, तुम गर लोगे मार।
निकल जाएगा कई गुना, होंगे कष्ट अपार।।
साधना-पथ के पथिकों का पाथेय-गायत्रेय
गवाक्ष
थ् शिवओम अम्बर
गो-गंगा-गीता और गायत्री भारतीय सांस्कृतिक चेतना की चार व्याहृतियां हैं। इनमें से गायत्री वस्तुत: सावित्री-साधना की संदर्शिका है। सविता अर्थात् प्रकाशरूप परमेश्वर का साकार प्रतीक सूर्य गायत्री का उपास्य देव है और मानवीय बुद्धि को प्रकाश प्रदान करने की प्रार्थना गायत्री का अन्त: स्वर है। महर्षि विश्वामित्र को गायत्री मंत्र का द्रष्टा कहा गया है। तब से आज तक न जाने कितने तप: पूत ऋषियों ने अपने जीवन में गायत्री की साधना की है और समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन सके हैं। हमारे अपने समय में भी एक अद्भुत नैष्ठिक साधक ने कठोर तप के द्वारा, निश्छल अन्त:करण के द्वारा परम प्रज्ञा की उपलब्धियों की और वेदमाता गायत्री का जीवन वरदान बनकर युग निर्माण योजना की रूपरेखा रची, सात्विक साधकों का एक समर्पित समूह संगठित किया और दिव्यता से आप्लावित समाज की संरचना का स्वप्न देखा, उसे साकार करने का संकल्प लिया। सिद्धि के आसन को सुशोभित करने वाले आचार्य श्रीराम शर्मा अभिधान से पुकारे जाने वाले उसी आर्ष विभूति के समग्र जीवन-व्यापार और प्राञ्जल जीवन-दर्शन को प्रकट करने वाले महाकाव्य का नाम है- “गायत्रेय”। लघुकाय क्षणिकाओं के नाम हो चले इस अति व्यस्त और आत्मत्रस्त युग में आचार्य देवेन्द्र देव जैसे धारा के खिलाफ तैरे हैं और काव्य के अति दुर्लभ स्वर्णकमल को लाकर पूजा की वेदी पर अर्पित करने में सफल रहे हैं। इस महाकाव्य के सन्दर्भ में गुयाना (दक्षिण अफ्रीका) स्थित डा. हरीशंकर शर्मा “अचल” का अभिमत है-
गायत्री-पुत्र, युग-पुरुष आचार्य श्रीराम शर्मा का जीवन, काल-ग्रन्थ पर नियति-नटी द्वारा दाहिने हाथ से लिखित दिव्य पुरुष के व्यावहारिक अध्यात्म की ऐसी गौरव गाथा है जिसे किसी दैवी चेतना की अवतार-कथा भी कहा जा सकता है।….. उनके महत् तत्व के विविध आयामों को उद्घाटित करने वाली अनेक विशिष्टताएं साहित्य और संस्कृति के अजर साधक आचार्य देवेन्द्र देव ने अपने सद्य: प्रणीत महाकाव्य “गायत्रेय” में श्लाघनीय रूप से समेकित की हैं।
रंजन प्रकाशन, बरेली (मो. 94126-79349) से प्रकाशित (मूल्य-400/-रु.) इस महाकाव्य के प्रकाशक डा. रंजन विशद (मानद निदेशक, रंजन प्रकाशन) ने अपने वक्तव्य में आचार्य देवेन्द्र देव की जिन पंक्तियों को उद्धृत किया है, वे अपने आपमें एक वृहत् संघर्ष की सूत्रवत् सूचनाएं हैं-
काम यों ही कोई नहीं होता
नाम यों ही कोई नहीं होता,
तपना पड़ता है गलना पड़ता है
राम यों ही कोई नहीं होता।
प्रथम सर्ग “अवतरण” में शक्ति के अवतरण की पृष्ठभूमि चित्रित करते हुए कवि की यह उद्भावना एक शाश्वत सत्य की सारस्वत अभिव्यञ्जना है-
मरू के अधरों को प्यास विवश कर देती है
तब अहं छोड़कर बादल जल बरसाते हैं,
हो जाते हैं संतृप्त वारि-धारा से जब
सिकता-कण उठकर स्वयंमल्हारें गाते हैं।
डा. योगेन्द्रनाथ शर्मा “अरुण” के अनुसार- “गायत्रेय” युग के रवि को उसके ही वंशधर कवि द्वारा प्रदान किया गया पावन अघ्र्य है तो डा. सारस्वत मोहन “मनीष” उसे महाकाल के भव्य भाल पर दिव्य तिलक के रूप में निरूपित करते हैं। प्रो. विष्णु विराट चतुर्वेदी के अनुसार, “चौबीस सर्गों का संयोजन, विविध सत्रह प्रकार के छन्दों का सहज और आकर्षक प्रयोग, अलंकारों की सतरंगी छटा, भाषिक संस्कार-युक्त अभिव्यक्ति की ओजस् प्रस्तुति, धर्म-संस्कृति-समाज-परिवार और मानवीयता की वैश्विक उदारवादी सोच इस महाकाव्य को अभिनवता प्रदान करती है।”
अन्त में कविप्रवर बालकवि वैरागी की इस सद्भावना के साथ अपनी शुभकामनाएं भी संयुक्त करता हूं-“व्यापक प्रसार पाने पर काव्य-गाथा की इस पोथी को गायत्री-परिजन अपने पूजा-गृहों में स्थान देंगे। उनके अनुयायी इसे कण्ठस्थ करके इसका पूजन-पाठन करेंगे- यह युगीन परिवर्तन होगा।
तत्समी शिल्प-शैली के सम्राट चन्द्रसेन विराट
डा. मधु खराटे के सम्पादन में विद्या प्रकाशन (सी-449, गुजैनी, कानपुर, उ.प्र., दूरभाष-0512-2285003) से प्रकाशित “चन्द्रसेन विराट की प्रतिनिधि हिन्दी गजलें” (मूल्य-200/- रुपए) उन सब साहित्यानुरागियों के लिए एक स्नेहिल उपहार है जो समकालीन गीति-काव्य की चर्चित विधा हिन्दी गजल को उसकी जातीय श्री से अभिमण्डित देखना चाहते हैं। गीत-गजल-मुक्तक-दोहा आदि गीति काव्य की सभी विधाओं में अपनी अनवरत सर्जना से श्रेष्ठता के प्रतिमान स्थापित करने वाले चन्द्रसेन विराट ने हिन्दी गजल के क्षेत्र में सबसे बड़ा काम उसे परिनिष्ठित भाषा-संस्कार देने का किया है। उनके अब तक प्रकाशित ग्यारह सफल संग्रहों में से उनकी दृष्टि और दर्शन को प्रकट करने वाली गजलों का संचयन करने वाले डा. मधु खराटे की मान्यता है कि विराट जी की गजलों में समसामयिक बोध को यथार्थ अभिव्यक्ति मिली है, वहीं डा. श्रीराम परिहार का अभिमत है कि विराट जी ने गीत से भी दोगनी ताकत के साथ गजल को हिन्दी संस्कार दिया। उसे अपनी जमीन का पहनावा दिया, उसे अपनी भाषा दी, नई स्थापना दी। मुगलकालीन गलियारों से निकालकर हिन्दी की हरी दूब पर बैठा दिया। हिन्दी में बोलने का तजुर्बा दिया, तर्ज दी।…. प्रसंगवश विराट जी के उन ग्यारह गजल संग्रहों का नामोल्लेख भी यहां समीचीन होगा जिनसे इस संग्रह हेतु रचनाएं चुनी गई हैं- निर्वसना चांदनी (1970), आस्था के अमलतास (1980), कचनार की टहनी (1983), धार के विपरीत (1984), परिवर्तन की आहट (1987), लड़ाई लम्बी है (1988), न्याय कर मेरे समय (1991), फागुन मांगे भुजापाश (1993), इस सदी का आदमी (1997), हमने कठिन समय देखा है (2002) तथा खुले तीसरी आंख (2010)।
इस संग्रह में कुल 161 गजलें संकलित की गई हैं। हर गजल के साथ उसके मूल संकलन का नाम भी उल्लखित है। विराट जी के कृती व्यक्तित्व को परिभाषित करती उनकी अभिव्यञ्जना की कुछ भंगिमाएं यहां उद्धृत हैं-
प्राण थे आदिवासी मगर,
प्यार पाकर सुसंस्कृत हुए।
ईश को भूल बैठा मगर,
एक क्षण तुम न विस्मृत हुए।
तथा
आयु में कुछ और उत्सव हो न हो,
स्नेह की हो सप्तमी पर्याप्त है।
शुद्धतम हिन्दी गजल के वास्ते,
शिल्प-शैली तत्समी पर्याप्त है।
प्रीति की उद्भावना और हिन्दी गजल की संभावना को शब्दायित करती इन पंक्तियों के पाश्र्व में ही प्रतिष्ठित करने योग्य हैं अन्तरतम की कामना को निरूपित करती ये पंक्तियां भी-
वक्ष का रस-स्रोत सूखे दिग्दहन में भी नहीं,
नित्यनीरा वेदना की वन्दना करते रहें।
सत्य-शिव-सुन्दर हमारी लेखनी का लक्ष्य हो,
श्रेष्ठ मूल्यों की सतत संस्थापना करते रहें।
जीवन की तमाम विसंगतियों के मध्य कवि की सकारात्मक दृष्टि स्वास्तिकर दृश्यों का सन्धान कर लेती है और वह बड़े ही विश्वस्त स्वर के साथ स्वयं को तथा समाज को सम्बोधित करता है-
असुन्दरता बहुत जग में मगर सौन्दर्य भी काफी,
सुमन के साथ कांटे हैं सुरभि मकरन्द भी तो है।
बहुत है पद्य गद्यात्मक मगर है काव्य सच्चा भी,
जहां कविता अछान्दस है वहीं पर छन्द भी तो है।
और कवि की यही दृष्टि उसे निराश नहीं होने देती। वह भोगलिप्सा का आखेट बने आधुनिक आदमी की विडम्बना को, आदर्शों के शाश्वत प्रतीक श्रीराम की करुणा का स्मरण दिलाते हुए अंधेरी रात की देहरी पर आस्था का प्रदीप सजाता रहता है-
देह के सुख के लिए इतनी बटोरी वस्तुएं,
वह हृदय के स्थान पर अलमारियां रखता गया।
सेतु बन्धन में जुटी उस गिलहरी की पीठ पर,
राम का वात्सल्य स्थायी धारियां रखता गया। द
अभिव्यक्ति मुद्राएं
एक गूंगा था, एक अंधा था
और एक था बहरा
अन्धे ने गूंगे और बहरे से पूछा
भाई, कैसा है प्रजातंत्र?
बहरे ने सुना नहीं, गूंगा बोलने में था असमर्थ
आगे की कहानी है व्यर्थ!
-श्याम मिश्र
नन्ही सी चिड़िया बाज के पंजे में देखकर
सपने में रातभर मुझे बिटिया दिखाई दी।
-मंगल नसीम
मेरे हाथों का पत्थर कह रहा है,
तेरा घर भी तो शीशे का बना है।
-शिवशरण बन्धु











