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अपनेपन की धूप
योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'
पेड़ काटकर जब हुई, कालोनी आबाद।
शुद्ध हवा की उस समय, आई बेहद याद।।
निभा रहे हैं इस तरह, हम घर के दस्तूर।
तन से तो हैं पास में, लेकिन मन से दूर।।
अंजाने से हो गए, आपस के सम्बंध।
कुशल-क्षेम तक पूछना, करते नहीं पसन्द।।
खिंची-खिंची सी जिन्दगी, नुचे-नुचे अरमान।
बिन मंजिल की दौड़ में, दौड़ रहा इंसान।।
वृद्ध पिता को डंस रही, रात अंधेरी स्याह।
महंगाई में किस तरह, हो बेटी का ब्याह।।
नई कोपलें कर रहीं, आंधी से संघर्ष।
चुभन शूल भी दे रहे, कैसे उपजे हर्ष।।
अपनेपन की खोज में, छाना जब इतिहास।
मिले मुखौटे शून्य के, लिए हुए सन्त्रास।।
महंगाई के दौर में, जीना हुआ मुहाल।
आसमान पर चढ़ गए, आटा-सब्जी-दाल।।
छंटा कुहासा मौन का, निखरा मन का रूप।
रिश्तों में जब खिल उठी, अपनेपन की धूप।।
तेरे मेरे बीच जब, खत्म हुआ आवेश
रिश्तों के अखबार में, छपे सुखद संदेश।।











