Explainer: ISRO ने EOS-05 लॉन्च किया, कितने तरह की होती हैं सैटेलाइट ऑर्बिट?
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Explainer: ISRO ने EOS-05 लॉन्च किया, कितने तरह की होती हैं सैटेलाइट ऑर्बिट?

ISRO ने भारत का पहला खास इमेजिंग सैटेलाइट EOS-05 जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में लॉन्च किया। जानें LEO, MEO, GSO और GEO ऑर्बिट के प्रकार, फायदे और क्यों रॉकेट सीधे ऑर्बिट में नहीं छोड़ते।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Sep 6, 2026, 01:26 pm IST
inभारत, विज्ञान और तकनीक

ISRO ने हाल ही में भारत का पहला खास इमेजिंग सैटेलाइट ईओएस-05 लॉन्च किया है। यह लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में काम करेगा। भारत के कई अन्य अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट लोअर अर्थ ऑर्बिट में घूमते हैं और समय-समय पर तस्वीरें लेते हैं। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में सैटेलाइट धरती के हिसाब से एक जगह टिका रहता है, इसलिए वह एक ही इलाके को लगातार देख सकता है।

ऑर्बिट क्या होते हैं और उनके प्रकार

यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मुताबिक, ऑर्बिट वह घुमावदार रास्ता है जो कोई वस्तु गुरुत्वाकर्षण के कारण दूसरी वस्तु के चारों ओर तय करती है। सैटेलाइट धरती के चारों ओर घूमते हैं। वैज्ञानिक धरती के ऑर्बिट को मुख्य रूप से ऊंचाई के आधार पर तीन हिस्सों में बांटते हैं। हर एक का अपना काम है।

लो अर्थ ऑर्बिट (ELO)यह धरती के सबसे करीब का इलाका है, लगभग 160 किलोमीटर से 2,000 किलोमीटर ऊंचाई तक। यहां सिग्नल देर से नहीं पहुंचते। इसलिए कम्युनिकेशन, ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और बड़े सैटेलाइट समूह यहां ज्यादा होते हैं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन भी यहीं है। इसमें VLO (बहुत कम ऊंचाई) और SSO (सन-सिंक्रोनस) जैसे छोटे प्रकार भी हैं। VLO में सैटेलाइट धरती के और करीब होने से बेहतर तस्वीरें दे सकते हैं, लेकिन वायुमंडलीय घर्षण ज्यादा होता है और ईंधन ज्यादा लगता है। ELO वाले सैटेलाइट धरती का एक चक्कर 90 से 120 मिनट में पूरा कर लेते हैं। सितंबर 2024 तक यहां 15,562 सक्रिय सैटेलाइट थे। भारत के 22 सक्रिय सैटेलाइट भी यहां काम कर रहे हैं।

मीडियम अर्थ ऑर्बिट (MEO) यह 2,000 किलोमीटर से शुरू होकर लगभग 35,786 किलोमीटर तक जाता है, जियोसिंक्रोनस से ठीक नीचे। यहां सैटेलाइट किसी खास रास्ते तक सीमित नहीं रहते। गैलीलियो जैसे नेविगेशन सिस्टम यहां हैं। ये कम सिग्नल देरी और बड़े कवरेज का संतुलन देते हैं। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट (GSO) यह लगभग 35,786 किलोमीटर या उससे ऊपर होता है। सैटेलाइट भूमध्य रेखा के ऊपर पश्चिम से पूर्व की ओर उड़ते हैं और धरती के घूमने की गति से मेल खाते हैं। इसलिए धरती से देखने पर वे एक जगह टिके लगते हैं।

इसके अंदर जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (जीईओ) होता है। जब सैटेलाइट भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर गोलाकार रास्ते पर शून्य डिग्री झुकाव के साथ हो और धरती के घूमने के समय से मेल खाए, तो वह पूरी तरह स्थिर दिखता है। तीन ऐसे सैटेलाइट लगभग पूरी दुनिया को कवर कर सकते हैं। भारत के 31 सक्रिय सैटेलाइट जीईओ में हैं।

इसे भी पढ़ें: नेपाल बाढ़: मौत का आंकड़ा 1344 पार, 5000 से अधिक लापता, सुरंग से चीनी नागरिक समेत दो लोगों का रेस्क्यू

रॉकेट सैटेलाइट को सीधे ऑर्बिट में क्यों नहीं छोड़ते

EOS-05 काफी भारी है, वजन 2,367 किलोग्राम। सीधे वहां भेजने में बहुत ज्यादा ईंधन लगेगा। इसलिए ISRO आमतौर पर सैटेलाइट को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) या उससे थोड़ी कम ऊर्जा वाले सब-GTO में छोड़ देता है। फिर सैटेलाइट अपने खुद के इंजन से ऊंचाई बढ़ाता है, रास्ता गोल बनाता है और झुकाव कम करके अंतिम जगह पर पहुंचता है।

इस लॉन्च में GSLV रॉकेट ने EOS-05 को सब-GTO में छोड़ दिया, जो धरती से 190 किलोमीटर से ज्यादा ऊंचाई पर था। रॉकेट की क्षमता सैटेलाइट के वजन से थोड़ी कम थी, इसलिए यह तरीका अपनाया गया। उसके बाद सैटेलाइट खुद अपनी जगह पर पहुंचता है।

जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में सैटेलाइट क्यों चाहिए

ज्यादातर इमेजिंग सैटेलाइट लो अर्थ ऑर्बिट में ही काम करते हैं। लेकिन वहां वे धरती के गुरुत्वाकर्षण से बचने के लिए बहुत तेज गति से उड़ते हैं। नतीजा यह कि वे किसी इलाके को सिर्फ थोड़ी देर के लिए देख पाते हैं और आगे निकल जाते हैं। इससे कवरेज में अंतराल रह जाते हैं।

जियोस्टेशनरी ऑर्बिट में सैटेलाइट धरती के हिसाब से स्थिर रहते हैं। इससे एक बड़े इलाके को लगातार और बार-बार देखा जा सकता है। नुकसान यह है कि दूरी ज्यादा होने से तस्वीर का रिज़ॉल्यूशन कम हो जाता है। सूरज, चांद और धरती के असमान गुरुत्वाकर्षण के असर से पथ बदलने की संभावना रहती है, इसलिए जगह बनाए रखने के लिए अतिरिक्त ईंधन लगता है।

Topics: जियोस्टेशनरी ऑर्बिटलो अर्थ ऑर्बिटभारत सैटेलाइटISROअर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइटEOS-05जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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