Archive, Author at पाञ्चजन्य - 1064 का पृष्ठ 613
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भारत की संसद पर जिहादी आतंकवादियों के हमले को 11 वर्ष पूरे हो गए, लेकिन इस जघन्य कृत्य का मुख्य आरोपी अफजल सर्वोच्च न्यायालय से फांसी की सजा मिलने के बाद भी देश के सुरक्षा तंत्र और न्यायिक प्रणाली को मुंह चिढ़ा रहा है और उस हमले में मारे गए सुरक्षा जवानों के दुखी परिजन अपने जांबाजों की शहादत की सरकारी अनदेखी से क्षुब्ध और अपमानित हैं, इतने कि इन शहीदों की बहादुरी का सम्मान करते हुए सरकार द्वारा दिए गए वीरता पदक भी वे राष्ट्रपति को लौटा चुके हैं। वास्तव में अफजल की फांसी को टालते रहना या उसे फांसी से बचाए रखने की वोट राजनीति की कोशिशें उन बलिदानियों का अपमान हैं। इस अपमान की पीड़ा ने ही कोसी (मथुरा) के शहीद घनश्याम पटेल की पत्नी सोमौती को उन शहीदों की याद में हर साल किए जाने वाले रस्मी सम्मान समारोह में आने से रोका और उसका यह कहना कि 'हत्यारे को फांसी आखिर क्यों नहीं दी जा रही' सरकार, विशेषकर इसका नेतृत्व करने वाली कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर एक तमाचा है, जिसने राष्ट्र की सुरक्षा के प्रश्न को वोट राजनीति की चौखट पर बलि चढ़ा दिया है। कांग्रेस की कुत्सित मानसिकता का परिचय तो उसके एक केन्द्रीय मंत्री ने यह कहकर दे दिया है कि अफजल को फांसी की बजाय उम्रकैद की सजा दी जानी चाहिए। इस कथन से कांग्रेस की मंशा साफ हो जाती है कि वह किस कारण अफजल की फांसी की फाइल को दिल्ली व केन्द्र सरकार के बीच वर्षों से लटकाए हुए है।