Archive भारत में शरई अदालतों से जितने भी फैसले आए हैं वे देश के कानून को ध्यान में रखकर दिए गए हैं। एक तरह से दारुल कजा और दारुल इफ्ता भारत की अदालतों के बोझ को ही कम करती है और एक तरह से दो पक्षों के बीच समझौता कराने का काम करती है। इस पर उंगली उठाए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होना चाहिए। -मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नौमानी बनारसी दारुल उलूम दारुल इफ्ता दो पक्षों में शरीयत की रोशनी में फैसला कराती है। वह किसी भी पक्ष को फैसला मानने के लिए बाध्य नहीं करती है और न ही किसी के साथ जोर जबरदस्ती करती है। फतवा कोई हुक्म या आदेश नहीं है। यह केवल सलाह है। जिसे मानना या न मानना संबंधित पक्ष पर निर्भर करता है -अशरफ उस्मानी जनसंपर्क अधिकारी,दारुल उलूम