यह श्लोक केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं था, बल्कि आज के परिदृश्य में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है:
श्लोक-
पारतन्त्र्यस्य निगडं दृढीकुर्वन्ति ते नराः।
ये राष्ट्रार्थं न जानन्ति मर्तुमात्मविरोधिनः।।
भावार्थ-
जो लोग राष्ट्र के लिए मरना नहीं जानते वे परतन्त्रता की बेड़ी को और दुढ या मजबूत करते हैं तथा वे अपने ही शत्रु हैं। ये राष्ट्र के लिए त्याग या बलिदान देना नहीं जानते, वे वस्तुतः अपने ही विरोधी (आत्मविरोधी) हैं। ऐसे लोग गुलामी और पराधीनता की बेड़ियों (जंजीरों) को ढीला करने के बजाय उन्हें और अधिक मजबूत ही करते हैं।
आज के समय में प्रासंगिकता :
राष्ट्रीय उत्तरदायित्व और नागरिक कर्तव्य: यह श्लोक स्मरण कराता है कि केवल अधिकारों की मांग करना और राष्ट्र हित की उपेक्षा करना देश को आंतरिक रूप से कमजोर करता है। राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। सांस्कृतिक और रणनीतिक स्वतंत्रता: आज के युग में पराधीनता केवल भौतिक नहीं होती, बल्कि यह वैचारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भी हो सकती है। राष्ट्र हित से ऊपर उठकर व्यक्तिगत या स्वार्थी हितों को प्राथमिकता देना देश को पुनः अदृश्य दास्ता की ओर ले जाता है।
आत्मविरोध से बचाव: जब कोई नागरिक राष्ट्र के व्यापक हितों के विपरीत काम करता है (जैसे भ्रष्टाचार, असामाजिक गतिविधियां या देश विरोधी एजेंडा), तो वह अंततः अपने और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को ही संकट में डालता है।
















