गत 14 अगस्त को लखनऊ में ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ पर मौन यात्रा निकाली गई। इसका नेतृत्व प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। इसमें उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के अलावा अनेक वरिष्ठ मंत्री और अन्य लोग शामिल हुए।
इस अवसर पर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि करोड़ो हिंदुओं को अपनी ही जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा था। लाखों की संख्या में हिंदू, बौद्ध और सिखों का कत्लेआम हुआ था। किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं थी। संवेदना की बात तो दूर सत्ता प्राप्त करने की लिप्सा इस हद तक थी कि एक सनातन राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए।
उन्होंने कहा कि यह दिवस इतिहास के उन काले अध्यायों से हमें बहुत कुछ सीखने की एक प्रेरणा भी प्रदान कर रहा है। उसका स्मरण मात्र करने भर से इसकी समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।
यह समस्या क्यों पैदा हुई? किन लोगों के कारण पैदा हुई? इसके कितने दोषियों को सजा दी गई और आखिर कब तक भारत इसकी कीमत चुकाता रहेगा? ये प्रश्न आज भी हम सबके सामने उसी मजबूती के साथ उपस्थित हैं। इसलिए इतिहास केवल परीक्षा का एक पाठ्यक्रम नहीं होता है, इतिहास गौरवशाली क्षणों पर गर्व की अनुभूति करने और अतीत की गलतियों का परिमार्जन करने का एक अवसर भी हमें देता है।
जो लोग 1947 में मौन थे, जिनके स्वर नही फूट रहे थे, उनकी नजरें सत्ता पर थीं। उन्होंने कहा कि आज भी वे क्या कर रहे हैं?
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए बनाया। इसके विरोध का कोई औचित्य नहीं था। यह कानून अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मजहबी उन्मादियों द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई भारत में शरण लेते हैं, तो उन्हें भारत की नागरिकता दे सकता है।
इस कानून में कहीं यह नहीं है कि हम मुसलमान की जमीन लेंगे या कांग्रेस की जमीन लेंगे या समाजवादी पार्टी की जमीन ले लेंगे। लेकिन कुछ लोगों को भड़का कर इस कानून के विरोध में जगह-जगह आंदोलन कराए गए।

















