ज्ञान की महत्ता हमेशा बनी रहती है। नीतिशतकम् का यह श्लोक मनुष्य के जीवन में ज्ञान (विद्या) की महत्ता को अद्भुत ढंग से दर्शाता है।
श्लोक-
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतं
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥
भावार्थ –
‘विद्या’ मनुष्य का अधिक सौन्दर्य है, ढका हुआ सुरक्षित धन है, विद्या विविधभोग, यश तथा सुख की जननी है, विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विद्या विदेश में आत्मीयजन के समान है। राजा महाराजाओं में विद्या का जो आदर होता है, वैसा धन और धनिक का नहीं होता। विद्या से रहित मनुष्य पशु के समान माना जाता है।
प्रासंगिकता
आज के दिखावे और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में आपकी असली पहचान पैसों से नहीं बल्कि ज्ञान और विवेक से बनती है। ट्रोलिंग और भटकाव के इस दौर में विद्या ही एकमात्र मार्गदर्शनक है।

















