चीन ने ताइवान के ठीक बाहर अपना अब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास क्या शुरू किया, अमेरिका से लेकर रूस तक में इसका असर दिख रहा है। चीन ने युद्धाभ्यास करके एक प्रकार से माहौल गरमा गया है। ताइवान ने भी इसे हल्के में न लेते हुए अपनी सेना के तीनों अंगों को एलर्ट मोड पर रखा है। अमेरिका ने हालांकि कहा तो है कि उसे ताइवान की सीमा पर चीनी युद्धाभ्यास से कोई लेना—देना नहीं है, लेकिन ताइवान को हथियार वहीं से पहुंच रहे हैं। चीन यह जानता है, इसलिए उसने अमेरिका को भी आगाह किया है कि अगर उसके रास्ते में कोई आया तो उसे बुरे नतीजे झेलने पड़ेंगे। फिलहाल चर्चा में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का हाल का वक्तव्य भी है।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी अमेरिका को संकेत दिया है कि यदि ताइवान के इलाके में युद्ध छिड़ता है और चीन के विरुद्ध किसी तीसरे देश द्वारा प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया जाता है, तो रूस चीन की सामने रहकर मदद करेगा। लावरोव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब चीन के ताइवान के ठीक बाहर चल रहे युद्धाभ्यास ने अमेरिका समेत कई अन्य देशों में सुरक्षा-चिंताओं को बढ़ा दिया है।
ताइवान को चीन अपने अभिन्न अंग के रूप में देखता है। चीन का मानना है कि ताइवान का मुख्य भूमि से मिलना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है, जबकि ताइवान के हिसाब से यह उसके अस्तित्व का संघर्ष है। साथ ही यह विषय वैश्विक सुरक्षा-चिन्ताओं से भी जुड़ा है।
अमेरिकी नीति में वन चाइना नीति को लेकर अस्थिर संतुलन कायम किया गया है, जिसमें अमेरिकी समर्थन, हथियार बिक्री और ताइवान की सैन्य तैयारियों को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह संतुलन क्षेत्रीय ताकतों के लिए एक बड़ा संकेत देता है।
लावरोव ने कहा ही है कि अगर तीसरे देश ने दखल दिया तो रूस चीन की प्रत्यक्ष रूप से मदद करेगा। इससे यह संकेत मिलता है कि रूस एक तरफ चीन के साथ सहयोग को मजबूत करके उसके संभावित आक्रामक कदमों को राजनीतिक-कूटनीतिक रूप से वैध साबित करने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि लावरोव के बयान का तात्पर्य यह भी हो सकता है कि रूस एक बहुपक्षीय परिदृश्य उभरने पर चीन के साथ एक से अधिक मोर्चों पर सहयोग को गहरा करेगा, खासकर यदि चीन की परिस्थितियां बदलीं तो रूस पर दबाव बढ़ सकता है कि वह अपने नीति-निर्णयों को समरूपता दे और चीन के पक्ष में लगते फैसलों को मजबूती दे।
चीन के ताजा युद्धाभ्यास से पूरी संभावना है कि क्षेत्रीय देशों में अस्थिरता बढ़ेगी, वे अमेरिका चीन के बीच सीधी टक्कर को उकसाते हैं। यह तनाव जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के लिए रक्षा-व्यय और रणनीतिक पुनर्गठन को मजबूर कर सकता है।
बढ़ते रूस-चीन गठबंधन से विश्व में एक नई सुरक्षा व्यवस्था बनाती दिख रही है। इससे यूरोप की सुरक्षा संरचनाओं, नाटो-नीत संतुलन और वैश्विक व्यापार-मार्गों पर दबाव बढ़ सकता है। ताइवान चिप उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। क्षेत्रीय अस्थिरता और बड़े देशों की दखल से वहां तकनीकी सप्लाई-चेन में बाधा आ सकती है, जिससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और मूल्यों में उछाल भी संभव है।

















