पत्रकारों की लिंचिंग के लिए क्या भड़का रहे हैं गोदी मीडिया के जनक
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जंतर मंतर की भीड़ को पत्रकारों के खिलाफ लिंचिंग के लिए क्या भड़का रहे हैं गोदी मीडिया के जनक

जंतर-मंतर पर पत्रकारों के खिलाफ उभरी हिंसक भीड़ और 'गोदी मीडिया' नैरेटिव पर सवाल उठे। जानिए चित्रा त्रिपाठी व अन्य पत्रकारों ने रवीश कुमार पर क्या आरोप लगाए।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Shivam Dixit
Jul 22, 2026, 10:29 pm IST
inभारत, दिल्ली

जंतर मंतर पर हालिया प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के खिलाफ उभरी हिंसक भीड़ और लिंचिंग की कोशिशें एक गंभीर चेतावनी हैं। इस भीड़ को भड़काने और पत्रकारों को निशाना बनाने वाले प्रमुख चेहरों में यू-ट्यूबर रवीश कुमार का नाम सबसे आगे है।

एक समय स्वतंत्र पत्रकारिता का प्रतीक माने जाने वाले रवीश कुमार आज राजनीतिक एजेंडे के लिए भीड़ को उकसाने का काम कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने इस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि रवीश कुमार पत्रकारों के खिलाफ लिंचिंग के माहौल को बढ़ावा दे रहे हैं।

चित्रा त्रिपाठी ने लिखा कि रवीश कुमार ने एक राजनीतिक दल की यात्रा में शामिल होकर अपनी पत्रकारिता पहले ही बेच दी है। अब वही बेची हुई पत्रकारिता दूसरों को सिखाने का दंभ भर रहे हैं। नैतिक रूप से उनका यह अधिकार पहले ही समाप्त हो चुका है। उल्लेखनीय है कि रवीश कुमार, बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित बृजेश कुमार पांडेय के सहोदर भाई हैं। उनके भाई पर अनुसूचित समाज की बच्ची द्वारा लगाए गए बलात्कार के गंभीर आरोपों पर रवीश की चुप्पी उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाती है।

कांग्रेस की आलोचना का पर्यायवाची बना गोदी मीडिया

रवीश कुमार ने ‘गोदी मीडिया’ शब्द को लोकप्रिय बनाया। यह टर्म उन्होंने उन पत्रकारों और मीडिया हाउसों के लिए ईजाद किया था जो कांग्रेसी विचारधारा से असहमत थे। कांग्रेस या वामपंथी एजेंडे की आलोचना करने वाले किसी भी पत्रकार को तुरंत ‘गोदी मीडिया’ का ठप्पा लग जाता था। आज जब उनके सगे साथी पत्रकारों-जिन्हें वे अपना मानते हैं-को गोदी मीडिया कहा जा रहा है, तो उन्हें गहरी पीड़ा हो रही है। यही उनका दोहरा चरित्र है। जब स्वयं पर या अपने गुट पर आरोप लगता है तो “कुछ अच्छे लोग भी हैं” कहकर बचाव करते हैं, लेकिन दूसरों पर हमला बोलते समय कोई संवेदना नहीं दिखाते।

एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार मनोज्ञा लोईवाल ने तीखा प्रहार करते हुए लिखा, “जो लोग स्क्रीन काली करके सबको अंधेरा दिखाते हैं, अब बिन मांगे प्रशस्ति पत्र बांटकर ज्ञान सिखाते हैं।” टीवी पैनलिस्ट स्वाति ने रवीश से सीधा सवाल किया: “अपने बायो से जर्नलिस्ट हटाकर चरण चाटुकार लिखिए। सपा-बसपा के मिलन पर बल्लियां उछालने वाले रवीश विशुद्ध राजनीतिक यात्रा में क्या वजन कम करने गए थे? जहां पैसा, वहां रवीश कुमार। गोदी मीडिया की नींव रखने वालों में से एक।” स्वाति ने यह भी पूछा कि भाई के टिकट के लिए बिहार में कितना गिड़गिड़ाएंगे और बलात्कार आरोपित भाई पर निष्पक्ष पत्रकारिता कब दिखाएंगे।

कभी सत्ता की चापलूसी नहीं की

रवीश रंजन शुक्ला जैसे सहयोगियों को भी सफाई देनी पड़ी। रवीश शुक्ला ने लिखा कि 22 साल के करियर में उन्होंने कभी सत्ता की चापलूसी नहीं की, न ही किसी से फायदा उठाया। लेकिन रवीश कुमार के फैलाए गए कीचड़ से छींटे उन्हें भी पड़े।

रवीश कुमार ने जंतर मंतर पर पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और हिंसा की निंदा करते हुए भी मूल मुद्दे को गोदी मीडिया पर केंद्रित रखा। उन्होंने लिखा, “मूल बात यह है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है।” उन्होंने सलाह दी कि रिपोर्ट करने आए पत्रकारों के साथ हंगामा न किया जाए, लेकिन फिर भी गोदी मीडिया की आलोचना जारी रखी। उन्होंने केरला के सिद्दीक कप्पन, जम्मू-कश्मीर के आसिफ सुल्तान, इरफान मेहराज और मणिपुर के किशोरचंद्र वांगखेमचा जैसे मामलों का हवाला दिया। लेकिन सवाल यह है कि जब उनके अपने गुट पर सवाल उठता है तो क्यों चुप्पी साध लेते हैं? रिया चक्रवर्ती कवरेज का उदाहरण देकर वे यह साबित करना चाहते हैं कि गोदी मीडिया के बावजूद जनता जिंदा है, लेकिन अपनी तरफ के पूर्वाग्रहों पर चुप्पी क्यों?

रवीश ने कभी पंकज, राजदीप या सागरिका को कहा क्या गोदी मीडिया

एक तरफ रवीश कुमार के अजीत अंजुम जैसे साथी, जो कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला के करीबी रहे, दूरदर्शन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी को गोदी मीडिया कहने में नहीं हिचकते। दूसरी तरफ रवीश का चैनल एनडीटीवी प्रणॉय जेम्स राय की वजह से कांग्रेस का सबसे करीबी चैनल माना जाता था। इस चैनल के पत्रकारों की भूमिका मंत्रीमंडल के गठन में भी होती थी।

रवीश कुमार के बॉस पंकज पचौरी, एनडीटीवी की नौकरी करने के दौरान ही तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार बनाए गए थे और जिस राजदीप सरदेसाई से रवीश ने पत्रकारिता सिखी, उनकी पत्नी सागरिका घोष को तृणमूल कांग्रस ने राज्यसभा सांसद बनाया। कभी आपने सुना कि रवीश ने पंकज, राजदीप या सागरिका को गोदी मीडिया कहा हो?

गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा

रवीश का हालिया पोस्ट और भी खतरनाक है। उन्होंने लिखा कि देश की हर पंचायत में, हर पार्टी के दफ्तर के बाहर, एयरपोर्ट पर और कारों के पीछे “गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है” का पोस्टर लगना चाहिए। उन्होंने दिल्ली पुलिस को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कुछ पता नहीं चला तो लोग प्रदर्शनों में डंडा लेकर आएंगे। यह सीधे-सीधे भीड़ को हिंसा के लिए उकसावा है। जंतर मंतर पर पत्रकारों के साथ जो व्यवहार हुआ, उसकी जड़ में इसी तरह का उकसावा है।

पत्रकारिता का मूल धर्म निष्पक्षता, सत्य और संतुलन है। रवीश कुमार ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया है। जब उनके भाई पर गंभीर आरोप लगे तो चुप्पी। जब उनके पसंदीदा पत्रकारों पर गोदी मीडिया का ठप्पा लगा तो पीड़ा। लेकिन जब विरोधी पक्ष के पत्रकारों पर हमला होता है तो चुप्पी या समर्थन। यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र और पत्रकारिता दोनों के लिए खतरा है।

भीड़ को भड़काकर, लोकतंत्र बचाया जा सकता है

आज यू-ट्यूब चैनलों का दौर है। अजीत अंजुम, अभिसार शर्मा, साक्षी जोशी, बरखा दत्त, आरफा खानम, मनीषा पांडेय, पूण्य प्रसून और रवीश पांडेय जैसे चेहरे हिन्दी मीडिया की जगह लेना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भीड़ को भड़काकर, पत्रकारों को निशाना बनाकर लोकतंत्र बचाया जा सकता है? क्या गोदी मीडिया का नारा लगाकर स्वयं गोद में बैठना नैतिक है?

जंतर मंतर की घटना सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि बढ़ते असहिष्णुता और मीडिया-विरोधी हिंसा का प्रतीक है। रवीश कुमार जैसे प्रभावशाली आवाजों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। हिंसा और उकसावे से पत्रकारिता नहीं, अराजकता बढ़ती है। सच्ची पत्रकारिता वह है जो हर पक्ष को बिना डरे दिखाए, न कि जो राजनीतिक गोद में बैठकर एकतरफा नैरेटिव थोपे।

Jantar Mantar Journalists Attack Ravish Kumar Godi Media Debate Chitra Tripathi Panchjanya

जिस हथियार से उन्होंने दूसरों को मारा, वही आज उनके अपने साथियों पर उलटा पड़ रहा है। राहत इंदौरी का यह शेर तो सुना ही होगा, ”लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में, यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।‘’ लगता है रवीश कुमार से शेर सुनकर, भावार्थ समझना रह गया।

आज ‘गोदी मीडिया’ का जनक स्वयं गोदी का शिकार हो रहा है तो पीड़ा स्वाभाविक है। लेकिन इस पीड़ा को भीड़ को भड़काने में इस्तेमाल करना खतरनाक है। रवीश कुमार जैसे पत्रकारों को भूलना नहीं चाहिए कि लोकतंत्र की रक्षा निष्पक्षता से होती है, न कि नफरत और हिंसा से।

Topics: Panchjanya newsJantar Mantar Journalists AttackRavish Kumar Godi MediaChitra Tripathi Ravish KumarDelhi Jantar Mantar ProtestMedia News IndiaDelhi News
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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