हरिद्वार: अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, आभार और दिल से याद करते हुए, पितृमोक्ष अमावस्या पर गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में श्राद्ध कर्म किए गए। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, बिहार और गुजरात समेत अलग-अलग राज्यों के भक्तों और शांतिकुंज के भाई-बहनों ने कैंपस में चार अलग-अलग जगहों पर 18 राउंड में हुए इन अनुष्ठानों में हिस्सा लिया। वहीं, वर्चुअल माध्यम से जर्मनी, इटली, अमेरिका, इंग्लैंड, लिथुआनिया समेत कई देशों के श्रद्धालुओं ने रीति-रिवाजों के अनुसार अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म किए और पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की। पितृमोक्ष अमावस्या पर उन पितरों के निमित्त भी श्राद्ध करने की परंपरा है, जिनकी तिथि ज्ञात नहीं होती। इस अवसर पर लोगों ने अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए पारिवारिक परंपराओं के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
पूर्वजों के सम्मान और संस्कारों की निरंतरता पर जोर
इस दौरान शांतिकुंज में आचार्यों ने कहा कि भारतीय संस्कृति में श्राद्ध संस्कार पूर्वजों के उपकारों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव परिवार में संस्कारों की निरंतरता बनाए रखता है। नई पीढ़ी को इस परंपरा से परिचित कराना भी आवश्यक है, ताकि वह अपने सांस्कृतिक मूल्यों और पारिवारिक विरासत को समझ सके। उल्लेखनीय है कि युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की प्रेरणा एवं आदर्शों के अनुरूप शांतिकुंज में सभी संस्कार वैदिक पद्धति से उच्च प्रशिक्षित आचार्यों द्वारा निःशुल्क संपन्न कराए जाते हैं। इन संस्कारों के माध्यम से जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर भारतीय संस्कृति, परंपराओं और संस्कारों को अपनाने तथा उन्हें व्यवहार में उतारने की प्रेरणा दी जाती है।
















