छत्तीसगढ़ के जिस गांव में सूरज ढलते ही छा जाता था अंधेरा, वहां 78 साल बाद पहुंची बिजली, खुशी के मारे नहीं सो पाए लोग
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होम भारत छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के जिस गांव में सूरज ढलते ही छा जाता था अंधेरा, वहां 78 साल बाद पहुंची बिजली, खुशी के मारे नहीं सो पाए लोग

गांव के लोगों को उम्मीद है कि इससे डिजिटल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, संचार नेटवर्क और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।

Written byसुनीता मिश्रासुनीता मिश्रा
Apr 28, 2026, 05:47 pm IST
inछत्तीसगढ़
ईरपानार गांव में आजादी के बाद पहली बार पहुंची बिजली (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

ईरपानार गांव में आजादी के बाद पहली बार पहुंची बिजली (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ का ईरपानार गांव ​इन दिनों खासा चर्चा में है। भारत की आजादी के 78 वर्षों बाद इस गांव में पहली बार बिजली पहुंची है। घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसा यह गांव नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। गांव के लोगों के लिए अपने घरों में रोशनी देखना किसी सपने से कम नहीं था। वह पहली बार बिजली देखने के बाद खुशी के मारे पूरी रात नहीं सो पाए।

बताया जाता है कि बिना बिजली के यह गांव दशकों तक लगभग पूरी तरह से दुनिया से कटा रहा। यहां बिजली का आना सिर्फ रोशनी की बात नहीं, बल्कि यह तो एक नई शुरुआत है। यहां तक का रास्ता किलोमीटरों में नहीं मापा जाता। यह घने जंगलों, ऊंची-नीची पहाड़ियों और टूटे-फूटे कच्चे रास्तों से होकर गुजरता है, जहां अक्सर लंबा सफर पैदल ही तय करना पड़ता है। मानसून के दौरान यह गांव लगभग पूरी तरह से दुनिया से कट जाता है।

‘हम पूरी रात बस बल्ब को जलते हुए देखते रहे’

ईरपानार के एक ग्रामीण का कहना है, “हम उस पूरी रात जागते रहे। बस बल्ब को जलते हुए देखते रहे।” नक्सल प्रभावित इस दुर्गम इलाके में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड ने पहाड़ियों और जंगलों के रास्ते बिजली के खंभे, तार और उपकरण पहुंचाए, जिससे यहां के लोगों का दशकों पुराना बिजली का सपना पूरा हो पाया। बिजली विभाग के अधिकारियों ने बताया कि काफी दिक्कतों के बावजूद बिजली पहुंचाने का काम ‘मिशन मोड’ में किया गया। ईरपानार तक बिजली पहुंचाना कोई आसान काम नहीं था। नारायणपुर जिले की डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर नम्रता जैन ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि इस इलाके में बिजली का कनेक्शन ले जाना बहुत मुश्किल था। उन्होंने यह भी कहा, “इसमें हर कदम पर शारीरिक मेहनत की जरूरत पड़ी। सामान पहुंचाने से लेकर मुश्किल इलाकों में बिजली के खंभे लगाने तक हर चीज में बहुत मेहनत करनी पड़ी। लेकिन हमारा केवल एक ही लक्ष्य था कि कोई भी गांव, चाहे वह कितना भी दूर क्यों न हो, पीछे नहीं छूटना चाहिए। 56.11 लाख रुपये की लागत से पूरा किया गया यह प्रोजेक्ट, उन घरों तक बिजली का कनेक्शन ले आया है, जिन्होंने पहले कभी रोशनी नहीं देखी थी।”

एक नई जिंदगी की शुरुआत

ईरपानार गांव में कई पीढ़ियों तक शाम का मतलब होता था लालटेन, जलती लकड़ी और जल्दी छा जाने वाला अंधेरा। गांव में बिजली आने के बाद अब बच्चे सूरज डूबने के बाद भी पढ़ाई कर सकते हैं। मोबाइल फोन, जो कभी चार्ज न होने पर किसी काम के नहीं रह जाते थे। अब धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं। पंखे, लाइट आदि से लोगों का जीवन आरामदायक बनेगा। गांव के लोगों को उम्मीद है कि इससे डिजिटल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, संचार नेटवर्क और यहां तक कि रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया, “जब पहली बार लाइट जली, तो हर कोई अपने घरों से बाहर निकल आया। लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्हें लगा जैसे उनकी एक नई जिंदगी शुरू हो गई है। हम सोना ही नहीं चाहते थे।”

Topics: Chhattisgarhरायपुरअबूझमाड़RaipurIrpanar Village Electricityईरपानार गांवछत्तीसगढ़ समाचार
सुनीता मिश्रा
सुनीता मिश्रा
हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री। इग्नू दिल्ली से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री। पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव। [Read more]
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