सागर मंथन : ‘केवल अपने लिए किया गया कार्य अधर्म’- डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी
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सागर मंथन : ‘केवल अपने लिए किया गया कार्य अधर्म’- डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

सागर मंथन में सुशासन, धर्म, कूटनीति, फिल्मों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सिनेमा के सामाजिक प्रभाव जैसे विभिन्न विषयों पर चर्चा

Written byतृप्ति श्रीवास्तवतृप्ति श्रीवास्तव
Dec 31, 2024, 01:58 pm IST
in भारत, विश्लेषण, गोवा, पाञ्चजन्य इवेंट

सागर मंथन में सुशासन, धर्म, कूटनीति, फिल्मों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सिनेमा के सामाजिक प्रभाव जैसे विभिन्न विषयों पर चर्चा के लिए ‘सुशासन का धर्म’शीर्षक से एक सत्र रखा गया था। इस सत्र में प्रसिद्ध लेखक, फिल्मकार और अभिनेता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी से पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने बातचीत की। उस संवाद को यहां लेख के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है-

प्राचीन काल में राजा का कोई अस्तित्व नहीं था। लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते थे और समाज स्वाभाविक रूप से संतुलित रहता था। लेकिन जब लोभ, ईर्ष्या और असंतोष जैसे भाव बढ़ने लगे, तो समाज में अनुशासन और न्याय को बनाए रखने के लिए राजा की आवश्यकता महसूस हुई। राजा का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि प्रजा की रक्षा करना था। यह सुनिश्चित करना था कि बड़ी मछली छोटी मछली को न खा सके यानी कोई ताकतवर किसी निर्बल को हानि न पहुंचाए। राजा को प्रजा से कर (टैक्स) के रूप में योगदान मिलता था, लेकिन यह कर तभी न्यायोचित था, जब राजा अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाए। धर्म का वास्तविक अर्थ है-जो सबको धारण करे। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसा अनुशासन है, जो समाज को संतुलित रखता है। जो कार्य केवल अपने लिए किया जाए, वह अधर्म है। ईशावास्योपनिषद् का एक मंत्र है-

ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: मा गृध: कस्यस्विद्धनम्।

यह मंत्र भारतीय विचारधारा का सार है। इसका अर्थ है कि यह समस्त संसार ईश्वर की रचना है। जब हम इसे समझते हैं, तो ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद मिट जाता है। हमें केवल उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितनी हमारी आवश्यकता है, और किसी और के धन का लालच नहीं करना चाहिए। धर्म वह शक्ति है, जो प्रकृति, व्यक्ति और समाज को एक साथ जोड़ती है। यह केवल नियमों का पालन नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि समाज में हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे।

सागर मंथन में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते कलाकार

सुशासन में कूटनीति की आवश्यकता

प्राचीन काल में सेंगोल को धर्मदंड कहा जाता था, जो राजा के कर्तव्यों और न्याय का प्रतीक था। प्राचीन भारत में ग्रामसभा और समिति की व्यवस्थाएं सुशासन की आधारशिला थीं। उदाहरण के लिए यदि किसी गांव में किसी व्यापारी का सामान चोरी हो जाता था, तो उसे खोजने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती थी। अगर चोरी का सामान नहीं मिलता था, तो राज्य उस नुकसान की भरपाई करता था। प्राचीन भारत में न्याय और प्रशासन की ऐसी व्यवस्था थी, जो आज के समय में भी अद्वितीय है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार के अनुसार अतिथि का पंजीकरण, चोरी की रिपोर्टिंग और अपराधियों की निगरानी जैसे प्रावधान सुशासन की जड़ें मजबूत करते थे।

सुशासन और वर्तमान समाज

वर्तमान समाज को प्राचीन भारत की उत्कृष्ट शासन व्यवस्था से प्रेरणा लेनी चाहिए। सुशासन का मतलब केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि समाज में सामंजस्य और न्याय स्थापित करना है। ‘रामचरितमानस’ और ‘महाभारत’ जैसे ग्रंथ सुशासन के आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रामराज्य में हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता था और समाज संतुलित था। सुशासन समाज के हर व्यक्ति को जिम्मेदारी से जीने की प्रेरणा देता है। सुशासन तभी संभव है, जब हम अपने धर्म, कर्तव्य और परंपराओं को समझें और उनका पालन करें। भारतीय परंपराएं केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे आज भी हमारे जीवन और समाज को दिशा देने में सक्षम हैं।

फिल्मों का धर्म

भारतीय परंपरा में नाटक और कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को शिक्षित और जागरूक करना भी था। प्रजापति ब्रह्मा ने नाट्यशास्त्र की रचना इसलिए की, ताकि समाज में मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान का प्रसार हो। लेकिन आज फिल्मों का धर्म केवल मनोरंजन तक सीमित हो गया है। आज फिल्मों के जरिए पुन: समाज को शिक्षित करने और सकारात्मक संदेश देने की जरूरत है। आज का समाज अत्यधिक संवेदनशील हो गया है। हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन मतभेद और विरोध के लिए भी जगह होनी चाहिए। हमारे ऋषियों ने वेदों की आलोचना को भी सहर्ष स्वीकार किया। मतभेद और संवाद भारतीय परंपरा की नींव हैं। हमें अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम दूसरों की आवाज को दबाएं। मतभेद को स्वीकार कर संवाद करने से समाज मजबूत बनता है।

संस्कृति से जुड़ाव

आजकल दक्षिण भारतीय फिल्मों की सफलता और बॉलीवुड के संघर्ष पर खूब बातें होती हैं। दक्षिण भारतीय फिल्मों की
सबसे बड़ी ताकत है उनका संस्कृति से जुड़ाव। उनकी फिल्में, उनके समाज और परंपराओं को दर्शाती हैं। फिल्म ‘बाहुबली’ में नायक का शिवलिंग को कंधे पर उठाकर ले जाना दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है। यह दृश्य हमारी परंपराओं और भावनाओं का सम्मान करता है। दक्षिण भारतीय फिल्मों के अभिनेता अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, जबकि बॉलीवुड में यह जुड़ाव कम ही देखने को मिलता है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

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