तसलीमा नसरीन ने अपना जीवन बांग्लादेश के इस्लामी समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मानसिकता और दाढ़ीधारी मजहबी कट्टरपंथ के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करते हुए बिताया है। इस संघर्ष के दौरान उन्होंने अपने ही देश में अपनी जान को जोखिम में डाला। वर्ष 1994 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल में वहां से जाने के लिए विवश होने के बाद उन्हें पश्चिमी देशों में शरण लेनी पड़ी।
अपने देश में उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगी थीं। इस बीच, दुनिया भर के उदारवादी लेखकों ने उनके विचारों और लेखन का समर्थन करते हुए अपनी आवाज उठाई। वर्ष 1993 में उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया और उनके विरुद्ध फतवा जारी किया गया। भीड़ उनके कथित अपराध के लिए उनका सिर मांग रही थी। अब तक वह 24 पुस्तकें लिख चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अनेक कविताएं भी लिखी हैं, जिनमें उन्होंने कठोर मजहबी कट्टरपंथ के नियमों और मान्यताओं के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त किया है।
उनके उपन्यास ‘लज्जा’ ने अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं की दयनीय स्थिति को उजागर किया। इसके कारण उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई। वर्ष 2004 में ‘लज्जा’ भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कसौटी साबित हुई। भारत सरकार ने उनके विरुद्ध धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य करने के आरोप में मामला दर्ज किया। अपनी जान को लगातार मिल रही धमकियों के बावजूद तसलीमा नसरीन ने इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लेखकों के उत्पीड़न, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, महिलाओं पर पुरुषों के अत्याचार तथा बांग्लादेश में विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के शोषण के विरुद्ध बोलना जारी रखा। उनके अनुसार, उनके जीवन के सभी भयावह अनुभव उस धर्म के कारण हुए, जो सातवीं शताब्दी के धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं से बंधा हुआ है।
मजहब और महिलाओं की स्थिति पर तसलीमा नसरीन के विचार
तसलीमा नसरीन ने वर्ष 2003 में अपने लेख ‘बिकॉज़ ऑफ रिलिजन’ में लिखा है-
“इस्लाम महिला को एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में नहीं देखता। पुरुष को मूल रचना माना गया और स्त्री को पुरुष के सुख के लिए बाद में बनाया गया। इस्लाम महिला को एक दासी या यौन वस्तु के रूप में देखता है, इससे अधिक कुछ नहीं। महिला की भूमिका घर पर रहने और अपने पति की आज्ञा मानने तक सीमित है, क्योंकि इसे उसका कर्तव्य माना जाता है। महिलाओं को कमजोर समझा जाता है। इसलिए उनकी देखभाल करने के नाम पर उनके शरीर और मन, उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं, उनके अधिकारों और स्वतंत्रता पर पुरुषों का नियंत्रण होना चाहिए। इस्लाम महिलाओं को बौद्धिक, नैतिक और शारीरिक रूप से पुरुषों से हीन मानता है।
विवाह के मामले में इस्लाम केवल पुरुषों के अधिकारों की रक्षा करता है। विवाह संपन्न हो जाने के बाद इस क्षेत्र में महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं रह जाता। कुरान ने पुरुषों को पूरी स्वतंत्रता देते हुए कहा है, ‘तुम्हारी स्त्रियां तुम्हारी खेती हैं, अतः अपनी खेती में जिस प्रकार चाहो, जाओ।’” अपने कठिन संघर्ष और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद एक लोकप्रिय लेखिका बनने की अपनी यात्रा का वर्णन करते हुए वह अपने लेख में लिखती हैं:
“मुझसे किसी ने विरोध करने के लिए नहीं कहा था, लेकिन मेरे भीतर यह दृढ़ भावना विकसित हुई कि उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ना आवश्यक है। किसी ने मुझसे आँसू बहाने के लिए नहीं कहा था, लेकिन मैंने आँसू बहाए। जब मैंने गद्य लिखना शुरू किया और वह समाचार पत्रों में साप्ताहिक रूप से प्रकाशित होने लगा, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरे विरोध की आवाज पाठकों का ध्यान आकर्षित कर रही है। लोग या तो मुझसे नफरत करते थे या मुझे प्यार करते थे। मुझे अत्यधिक नफरत और अत्यधिक प्रेम से भरे पत्र प्राप्त करने की आदत पड़ गई। धीरे-धीरे मेरी पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। केवल प्रकाशक ही नहीं, बल्कि समाचार पत्रों के संपादक भी मुझसे लिखने का आग्रह करने लगे। दृढ़ता और निरंतर प्रयासों के बल पर मैं सर्वाधिक बिकने वाली लेखिका बन गई।” वर्ष 1992 में राष्ट्रीय पुस्तक मेले में नसरीन की पुस्तकों को सार्वजनिक रूप से जला दिया गया था। लेकिन इससे इस साहसी लेखिका का रास्ता नहीं रुका और उन्होंने सत्य के लिए अपना संघर्ष जारी रखा।
वह लिखती हैं-
“मैंने लिखना जारी रखा। अपनी कविताओं, गद्य, निबंधों और उपन्यासों में मैंने उत्पीड़ित महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदाय का पक्ष लिया है। मैंने समानता और न्याय के लिए जोरदार आवाज उठाई है। मैंने प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय की माँग की है, चाहे उसका मत कुछ भी हो या वह किसी भी लिंग का हो। मैंने धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में मुखर होकर अपनी बात रखी। मैंने उन सभी धार्मिक कानूनों का विरोध किया, जिनके अंतर्गत महिलाओं का उत्पीड़न होता है। मेरी पुस्तक पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। महिलाओं को आज भी कोड़े मारे जाते हैं और उन्हें पत्थर मारकर मौत के घाट उतार दिया जाता है। महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, फिर उन पर ही बलात्कार के लिए सहमति देने का आरोप लगाया जाता है और बलात्कारी आजाद घूमते रहते हैं।
महिलाएँ मानव तस्करी, गुलामी और हर प्रकार के भेदभाव का शिकार होती रही हैं। पुरुष महिलाओं के चेहरों पर तेजाब फेंकते हैं और फिर खुशी-खुशी वहाँ से चले जाते हैं। धर्म और तथाकथित परंपराएँ- दोनों ही महिलाओं को मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं करतीं। एक दंपति के लिए सबसे अवांछित चीजों में से एक लड़की का जन्म है। यदि लड़की पैदा होती है, तो या तो पत्नी को लड़की को जन्म देने के ‘अपराध’ में तलाक दे दिया जाता है, या उसे अपना शेष जीवन अपमान और तिरस्कार के साथ बिताना पड़ता है।” बांग्लादेश में उनकी तीन पुस्तकों- ‘लज्जा’, ‘माय चाइल्डहुड’ (मेरा बचपन) और ‘द्विखंडितो’ पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
धर्म, असमानता और महिलाओं का उत्पीड़न
तसलीमा नसरीन लिखती हैं-
“सब कुछ धर्म के कारण है। धर्म के कारण हर जगह खून-खराबा होता है। धर्म के कारण लोगों के बीच नफरत पैदा होती है। धर्म के कारण पूरी दुनिया में अज्ञानता फैली हुई है। धर्म के कारण निरक्षरता और गरीबी है। धर्म के कारण अन्याय और असमानताएँ हैं। धर्म के कारण लाखों महिलाएँ पीड़ा सह रही हैं। उन्हें कोड़े मारे जाते हैं, जलाया जाता है और पत्थर मारकर मौत के घाट उतार दिया जाता है। धर्म के कारण मेरी पुस्तकें जलाई जाती हैं और उन पर प्रतिबंध लगाया जाता है। धर्म के कारण मुझे अपने देश से बाहर निकाल दिया गया।
लेकिन हम कुछ कर सकते हैं। ईश्वर में विश्वास के कारण मानवता के सामने उत्पन्न होने वाली सभी समस्याओं को हम समाप्त कर सकते हैं। इस आधुनिक दुनिया में धार्मिक ग्रंथों का आँख मूँदकर अनुसरण करना खतरनाक है। केवल कुरान ही नहीं, बल्कि सभी धार्मिक ग्रंथ समय और परिस्थिति की दृष्टि से अप्रासंगिक हो चुके हैं।” बचपन में नसरीन अत्यंत धार्मिक थीं और पूरी श्रद्धा के साथ कुरान पढ़ती थीं। लेकिन उनके मन में यह जानने की जिज्ञासा थी कि वह जो कुछ पढ़ रही हैं, उसका वास्तविक अर्थ क्या है।
वह लिखती हैं-
“मैंने सच कहा। मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी हुआ, उसे व्यक्त किया। सामान्यतः परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा किए गए बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के बारे में खुलकर बोलना वर्जित माना जाता है। लड़कियाँ अत्यधिक शर्मिंदगी के कारण चुप रह जाती हैं। लेकिन मैंने अपना मुँह बंद नहीं रखा। मुझे इस बात की परवाह नहीं थी कि लोग मेरे या मेरे परिवार के बारे में क्या कहेंगे। मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि अनेक महिलाओं को लगता है कि मैं उनकी उन कहानियों को भी सामने ला रही हूँ, जिन्हें वे अब तक किसी से कह नहीं पाई हैं। हम पीड़ित महिलाओं को अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। हमारी बात सुनी जानी चाहिए। हमें जोरदार विरोध करना चाहिए और अपनी स्वतंत्रता तथा अधिकारों की माँग करनी चाहिए। हमें बेड़ियों में जकड़े जाने, बाँधे जाने, पीटे जाने और धमकाए जाने से इनकार करना चाहिए। हमारे पास केवल एक जीवन है और हम इसे खुशी के साथ जीने का अधिकार माँगती हैं।
यदि महिलाएं शर्मनाक पितृसत्तात्मक और धार्मिक व्यवस्था के उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए संघर्ष नहीं करतीं, तो यह महिलाओं के लिए शर्म की बात है! विरोध न करने, संघर्ष न करने और ऐसी व्यवस्था को जारी रहने देने के लिए हमें शर्मिंदा होना चाहिए, जिसका प्रभाव हमारी बेटियों पर भी पड़ेगा। मेरी कहानी कोई अनोखी कहानी नहीं है। दुर्भाग्यवश, मेरे अनुभव उन लाखों पीड़ित महिलाओं के अनुभवों से मिलते-जुलते हैं, जिन्होंने ऐसी ही परिस्थितियों का सामना किया है। अपनी पुस्तक में मैंने अपने लिए आँसू बहाए। लेकिन मैंने उन सभी महिलाओं के लिए भी आँसू बहाए, जिन्हें वह सार्थक जीवन जीने का अवसर नहीं मिला, जिसकी वे क्षमता रखती हैं और जिसकी वे निश्चित रूप से हकदार हैं। हम महिलाओं को अब अकेलेपन में, किसी एकांत स्थान पर बैठकर चुपचाप रोते नहीं रहना चाहिए। मुझे अपने अब तक के कार्यों या अपने लिखे हुए किसी भी शब्द पर पछतावा नहीं है। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपनी मृत्यु तक बिना किसी समझौते के सभी बुरी शक्तियों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखूँगी। मैं अपने उद्देश्य के प्रति पहले से भी अधिक प्रतिबद्ध और दृढ़ संकल्पित हूँ।”
पितृसत्तात्मक समाज और महिलाओं की स्वतंत्रता
बांग्लादेश के रूढ़िवादी मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति की कठोर वास्तविकताओं को उजागर करते हुए वह कहती हैं-
“लेकिन जिस क्षण महिला को यह एहसास होता है कि वह अब कमजोर नहीं है, जिस दिन वह अपने भीतर साहस पैदा करती है और अपनी आवाज सुने जाने की माँग करती है, जिस क्षण वह अपने मन और शरीर पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए निरर्थक सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती है, उसी क्षण वह समाज से बहिष्कृत कर दी जाती है और घृणा की पात्र बन जाती है। मैं हमेशा से समाज के इस दोहरे चरित्र से परिचित रही हूँ, फिर भी मैंने कभी स्वयं जैसी हूँ, वैसी बने रहने से डर महसूस नहीं किया।” तसलीमा नसरीन को समाज द्वारा चरित्रहीन या पतित महिला कहे जाने का भय नहीं था, क्योंकि वह हमेशा अपना सम्मान करती थीं। उन्होंने पितृसत्ता के विरुद्ध और अपनी स्वतंत्रता के अधिकार के पक्ष में अत्यंत गर्व तथा दृढ़ता के साथ आवाज उठाई।
अपनी पुस्तक ‘एक्ज़ाइल’ (निर्वासन) में वह लिखती हैं-
“समाज ने मुझे जिस ‘पतित महिला’ का तमगा दिया है, मैं उसे गर्व से स्वीकार करती हूँ। यह एक निर्विवाद सत्य है कि जब कोई महिला अपनी परिस्थितियों से ऊपर उठने की इच्छा रखती है, जब वह समाज, राज्य या धर्म की दमनकारी शक्तियों के विरुद्ध खड़ी होती है, जब उसे अपने अधिकारों का एहसास होता है और वह उन शक्तियों के विरुद्ध विद्रोह करती है, जो उसे पीछे धकेलना चाहती हैं, तो सभ्य कहलाने वाला समाज उसे हमेशा पतित कहकर बहिष्कृत कर देता है। महिला की मुक्ति की पहली शर्त यह है कि उसे सामाजिक बंधनों और वर्जनाओं का अतिक्रमण करना होगा। इसके बिना सामाजिक परंपराओं की गिरफ्त से बाहर निकल पाना असंभव होगा। वास्तव में स्वतंत्र महिला वही है, जिसे हर कोई पतित कहकर फटकारता है।”
तसलीमा ने उस आवरण को तोड़ दिया है, जिसके पीछे अब तक अनेक सामाजिक वर्जनाएँ छिपी हुई थीं। उन्होंने इस्लामी समाजों में पितृसत्ता, प्रभुत्व और महिलाओं के प्रति पुरुषों की स्त्री-विरोधी मानसिकता से जुड़ी उन वास्तविकताओं को सामने रखा, जिन पर पहले खुलकर चर्चा नहीं की जाती थी।
वह लिखती हैं-
“महिलाओं को ये अधिकार इसलिए प्राप्त नहीं हैं, क्योंकि पितृसत्ता ने उन्हें इन अधिकारों के योग्य नहीं माना है। अशांति का मूल कारण यह है कि मैंने इन प्रतिबंधों की परवाह नहीं की और उन विषयों पर लिखा, जिनके बारे में मुझे लिखने की अनुमति नहीं थी—भले ही मेरी कहानी कितनी भी दुखद या हृदयविदारक क्यों न रही हो।”
शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता और समान नागरिक संहिता पर विचार
हाल ही में, लगभग दो दशकों तक कोलकाता से दूर रहने के बाद, निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने शहर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति और धार्मिक कट्टरपंथ सहित कई विवादास्पद मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए। कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित एक कार्यक्रम और बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुवेंदु अधिकारी को अपनी यात्रा को संभव बनाने और उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद दिया। ‘द स्टेट्समैन’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, नसरीन ने अपने संबोधन की शुरुआत बच्चों को धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं के आधार पर शिक्षा देने के विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए की।
उन्होंने कहा “धर्म के आधार पर शिक्षा की अलग-अलग व्यवस्थाएँ नहीं होनी चाहिए। हमें सभी बच्चों के लिए एक समान शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है।” नसरीन ने यह भी सुझाव दिया कि मदरसा व्यवस्था के स्थान पर आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मदरसों में गैर-मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ावा दिया जाता है और युवाओं में अलगाववादी मानसिकता को गहरा किया जाता है। उनके अनुसार, आधुनिक समय में शिक्षा का उद्देश्य युवाओं को रोजगार, आलोचनात्मक चिंतन और आधुनिक समाज में जीवन जीने के लिए तैयार करना होना चाहिए, न कि धार्मिक पहचान और रूढ़ मान्यताओं को और मजबूत करना। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की संख्या बढ़नी चाहिए, जो धर्म से मुक्त हों।
कोलकाता की अपनी हालिया यात्रा के दौरान उन्होंने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि कई पश्चिमी देशों में ऐसी व्यवस्था मौजूद है और वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता है। उनके अनुसार, व्यक्तिगत कानून धर्म पर आधारित नहीं होने चाहिए। सभी नागरिकों के लिए कानून समान अधिकारों के सिद्धांत पर आधारित होने चाहिए।

















