राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर बड़ी चेतावनी दी है। इसका उपयोग करना सीखना चाहिए। इसमें आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि विज्ञान और तकनीक की प्रगति को कोई नहीं रोक सकता। ज्ञान प्राप्त होता है और तकनीक आती है। तकनीक को रोकना व्यर्थ है; उसका लाभ ही है।
नागुपर के रेशिमबाग में विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक जी ने यह भी कहा कि विज्ञान और तकनीक की प्रगति मनुष्यों को भौतिक दृष्टि से सुखी जीवन जीने में, जीवन में ज्ञान और तर्क के आधार पर अपने व्यवहार को निर्दोष करने में मदद करती है। पर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तकनीकी केवल साधन है। केवल उपभोगवादी अथवा जड़वादी दृष्टिकोण से विकास होता है तो सुख सुविधा के साथ उससे बड़ी हानि मोल लेनी पड़ती है। इसके कारण मनुष्य-निर्मित और प्रकृति-निर्मित आपदाएँ आती हैं।
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नेपाल त्रासदी और कोलकाता हादसे पर सभी को दुख है
नेपाल की त्रासदी और कोलकाता के हादसे जिक्र करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि इन दोनों ही घटनाओं का सभी को दुख है। वहां राहत पहुंचाने के प्रयास हुए। लेकिन इन घटनाओं के लिए केवल प्रकृति को दोष नहीं दिया जा सकता; हमारे बिगड़ते व्यवहार पर भी विचार करना होगा। ऐसे में विकास की समग्र व संतुलित दृष्टि निर्माण होना आवश्यक है। वह कहते हैं कि ऐसा विकास होना चाहिए जो सभी को साथ लेकर चले और टिकाऊ हो। विकास इतना महँगा नहीं होना चाहिए कि उसके चलते विकास करने वाले ही जीवित न रह सकें। हमें ऐसा विकास करने का शास्त्र फिर से सीखना पड़ेगा।
सरकारों ने भी विज्ञान और तकनीक की प्रगति के संबंध में कहा है कि इसे आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन इसके साथ अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और नैतिकता का भी विचार करना पड़ेगा। मनुष्य के ज्ञान और तकनीक की प्रगति इन तीनों की मर्यादाओं के भीतर होनी चाहिए।
AI तकनीक पर गंभीर चेतावनी दी
AI जैसी तकनीक आएगी और उसका उपयोग करना सीखना चाहिए। इसमें आगे बढ़ना चाहिए। अन्यथा परमाणुओं के रचना के ज्ञान से स्वच्छ ऊर्जा से ज्यादा जीवन संहारक अस्त्र निकलेंगे व कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे अत्यंत उपयोगी तंत्रज्ञान से भी मनुष्य को भ्रमित करने वाले, ठगने वाले, झूठ के उपक्रम निकलते रहेंगे। ऐसा न हो, इसके लिए दृष्टिकोण में बदलाव आवश्यक है।
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इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि भारत की सनातन, अपनी समग्रता व एकात्मकता के कारण बनी जीवन दृष्टि समन्वय व संयम के संस्कारों की संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व में देखना चाहती है। उसको हमारे पूर्वजों ने ‘सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा’ ऐसा संबोधित किया है। भारत को इस दृष्टि के आधार पर समग्र, एकात्म विकास का नया प्रतिमान उदाहरण के रूप में दुनिया के सामने खड़ा करना होगा।











