क्या कभी मानवता के दुश्मन आतंकवादी किसी समाज के नायक हो सकते हैं? अगर इस तरह के लोगों को नायक बना कर पेश करते हैं तो फिर समाज का भविष्य क्या होगा, यह चिंता का विषय होना चाहिए। इसी चिंता को दरकिनार करते हुए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने अमृतसर स्थित संग्रहालय में दो आतंकियों की फोटो स्थापित किए हैं।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने कट्टरपंथी नेताओं की मौजूदगी में गोल्डन टेम्पल कॉम्प्लेक्स के सेंट्रल सिख म्यूज़ियम में तीन लोगों की तस्वीरें लगाई गईं। ये तीन लोग हैं खालिस्तानी नेता गजेंद्र सिंह, खालिस्तान कमांडो फोर्स के सह-संस्थापक गुरदेव सिंह देबू और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुलदीप सिंह। गजेंद्र सिंह वही है जिसने 1981 में श्रीनगर से लाहौर जा रही इंडियन एयरलाइंस की फ़्लाइट आई सी 423 को हाईजैक किया था। अरदास के बाद, तस्वीरें दिखाने का कार्यक्रम संयुक्त रूप से किया गया। इसमें अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज, तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार ज्ञानी टेक सिंह, कमेटी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी और गोल्डन टेम्पल के ग्रंथी ज्ञानी बलजीत सिंह मौजूद रहे।
1981 में हुआ था हाईजैक?
इस मौके पर दल खालसा के नेता कंवरपाल सिंह और परमजीत सिंह मंड, पूर्व उग्रवादी नेता दलजीत सिंह बिट्टू, प्रोफेसर जगमोहन सिंह और दमदमी टकसाल के पूर्व प्रवक्ता मोहकम सिंह भी मौजूद थे। दल खालसा के संस्थापक गजेंद्र ने अपने चार साथियों के साथ मिलकर 1981 में जरनैल सिंह भिंडरावाले की गिरफ़्तारी के विरोध में भारतीय विमान को हाईजैक किया था। पाकिस्तान की एक अदालत ने सितंबर 1981 में गजेंद्र और साथियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उसने लाहौर की जेल में 14 साल बिताए और अक्टूबर 1994 में रिहा हुआ। रिहाई के बाद, उसने 1996 में नई शुरुआत करने के लिए जर्मनी जाने की कोशिश की। हालांकि, जर्मन अधिकारियों ने उसे एंट्री देने से इनकार कर दिया और वापस पाकिस्तान भेज दिया, जहां उसने अपनी बाकी जिंदगी सरकारी सुरक्षा में बिताई।
भारत के मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में था गजेंद्र सिंह
2002 में, भारत के गृह मंत्रालय ने गजेंद्र को 20 सबसे ज्यादा वांछित आतंकवादियों की सूची में शामिल किया और लगातार उसके प्रत्यर्पण की मांग की। दशकों तक, पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस बात से इनकार किया कि वह उसकी जमीन पर रह रहा था। जुलाई 2024 में लाहौर में 73 साल की उम्र में गजेंद्र की मौत हो गई और उसका अंतिम संस्कार ननकाना साहिब के श्मशान घाट पर किया गया।
कौन था गुदेव सिंह देबू
गुरदेव सिंह, जिसे देबू के नाम से भी जाना जाता है, खालिस्तान कमांडो फोर्स में दोआबा क्षेत्र का एक प्रमुख उग्रवादी और एरिया कमांडर था। 1984 में, भारतीय सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, उसने मनबीर सिंह चहेरू और अन्य प्रमुख उग्रवादियों के साथ मिलकर खालिस्तान कमांडो फोर्स नामक आतंकी संगठन की स्थापना की। जुलाई 1987 में पुलिस हिरासत में देबू की मौत हो गई।
खालिस्तनियों की खुलेआम तारीफ
इस मौके पर सभा को संबोधित करते हुए जत्थेदार गड़गज ने कहा कि जिन तीन हस्तियों की तस्वीरें आज लगाई गई हैं। उन्होंने सिख समुदाय के अधिकारों के लिए बहुत बड़ा बलिदान दिया। इन आतंकियों को शहीद कहा गया। ज्ञात हो कि स्वर्ण मंदिर के इस संग्रहालय में पहले भी अनेकों आतंकियों की तस्वीरें लगी हुई है जिनको शहीद और योद्धा बताया जाता है। आतंकवाद का दो दशकों तक दंश झेलने वाले सीमांत राज्य पंजाब में इस तरह की हरकत पूरे देश के लिए खतरनाक साबित हो सकती है और यह इन आतंकियों के हाथों मारे गए निर्दोष हिंदू सिखों की शहादत का भी अपमान है।

















