यह श्लोक मनुस्मृति (अध्याय 4, श्लोक 160) से लिया गया है। (इसी प्रकार का विचार श्रीमद्भगवद्गीता तथा चाणक्य नीति में भी देखने को मिलता है)।
श्लोक :
यद् यत् परवशं कर्म तत्तद्यत्नेन वर्जयेत्।
यद् यदात्मवशं तु स्वात् तत्तत्सेवेत यत्नतः॥
भावार्थ :
जो-जो कर्म परवश हों, उन्हें कभी न करे। जो जो कार्य स्ववश हो, उन्हें यत्न से करना चाहिए।
आज के युग में प्रासंगिकता (Modern Relevance)
मानसिक स्वास्थ्य और शांति : आधुनिक जीवन में तनाव का सबसे बड़ा कारण उन चीज़ों की चिंता करना है जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं (जैसे दूसरों की राय, बाज़ार की स्थिति या परिस्थितियां)। यह श्लोक ‘सर्कल ऑफ़ कंट्रोल’ के सिद्धांत को सिखाता है—जो बातें हमारे हाथ में नहीं हैं, उन पर ऊर्जा नष्ट करने के बजाय उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करें जो हमारे अपने नियंत्रण में हैं।
आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन : करियर और व्यक्तिगत जीवन में दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता व्यक्ति को कमज़ोर बनाती है। अपने कौशल (skills), निर्णयों और कर्मों को आत्मवश (स्वयं के नियंत्रण में) रखना ही स्वतंत्रता और प्रगति का मूल आधार है।
समय प्रबंधन और उत्पादकता : आज के समय में बाहरी विकर्षण (Distractions) बहुत अधिक हैं। जो काम दूसरों के इशारों पर या बाहरी दबाव में बिना किसी अर्थ के किए जाते हैं, उन्हें छोड़ना (वर्जन करना) और जो कार्य हमारे लक्ष्य तथा स्व-विकास से जुड़े हैं, उन पर ध्यान लगाना ही सफलता की कुंजी है।

















