मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने मुंबई के बोरीवली में आयोजित एक कार्यक्रम (02 अक्तूबर 2026) के दौरान अपने संबोधन में कहा कि हमारा राष्ट्र धर्म के लिए है. हमारे यहाँ राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं. राष्ट्र का प्रयोजन धर्म है और धर्म का उपयोग होता है राष्ट्र की धारणा के लिए. दोनों परस्परावलंबी हैं. एक है तो दूसरा भी है, एक नहीं तो दूसरा भी नहीं.
“अगर राष्ट्र दुर्बल हो गया तो धर्म संकट में आ जाएगा और धर्माचरण दुर्बल हो गया तो राष्ट्र नीचे आ जाएगा। इसीलिए इन दोनों को सम्यक रूप में साथ चलाना अपना कर्तव्य है।” — डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी बोरीवली में आयोजित ‘ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप’ के 14वें अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे।
“हमारा राष्ट्र धर्म के लिए है…
हमारे यहाँ राष्ट्र और धर्म अलग नहीं है।
राष्ट्र का प्रयोजन धर्म है और धर्म का उपयोग होता है राष्ट्र की धारणा के लिए। दोनों परस्परावलंबी हैं। एक है तो दूसरा भी है, एक नहीं तो दूसरा भी नहीं।
अगर राष्ट्र दुर्बल हो गया तो धर्म संकट में आ जाएगा और… pic.twitter.com/NuZA72avfl
— Panchjanya (@epanchjanya) October 2, 2026
इस अवसर पर पद्मभूषण परम पूज्य आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि जी महाराज, आचार्य महाबोधी सूरीश्वर जी तथा अन्य आचार्य और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

दुनिया आशा की दृष्टि से भारत की ओर देख रही है
समारोह में सरसंघचालक जी ने कहा कि आज दुनिया विभिन्न विरोधाभासों, संघर्षों और चरमपंथी विचारधाराओं के कारण अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। इस परिस्थिति में मानवता का मार्गदर्शन करने की क्षमता भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में है। इसलिए आज दुनिया आशा की दृष्टि से भारत की ओर देख रही है।
उन्होंने कहा कि भारत ने अपने ज्ञान का प्रसार कभी भी अन्य देशों पर आक्रमण करके या बलपूर्वक धर्मांतरण कराकर नहीं किया है। बल्कि, मानव कल्याण की निःस्वार्थ भावना से भारत ने अपना ज्ञान दुनिया को दिया है। यही भारत की ज्ञान परंपरा की विशिष्ट पहचान है।
वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता के साथ-साथ जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसे महान ग्रंथों में मानवता को दिशा देने वाला व्यापक ज्ञान समाहित है।
संतों की शिक्षाओं से भी मानव कल्याण, समरसता और सेवाभाव का संदेश मिलता है। इस ज्ञान संपदा की आज संपूर्ण विश्व को आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारत की इस महान ज्ञान परंपरा का संरक्षण करना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रति हमारा कर्तव्य है। संत परंपरा और सेवाभावी प्रवृत्ति का संवर्द्धन यानी मानव समाज के सुरक्षित और कल्याणकारी भविष्य का संवर्द्धन करना है।

संस्कृति समाप्त हो गई तो देश को नष्ट
इस अवसर पर विहार सेवकों और अन्य उपस्थित लोगों को अपने आशीर्वचन में पद्मभूषण परम पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरि महाराजा जी ने कहा कि “देश की संस्कृति समाप्त हो गई तो देश को नष्ट होने में समय नहीं लगता है। इसलिए देश की संस्कृति को बचाना और उसका जतन करना आवश्यक है और यह केवल हमारे संस्कारों से ही संभव होगा। राष्ट्र बचेगा तो धर्म बचेगा और धर्म बचेगा तो हम सुरक्षित रहेंगे।” साथ ही, राष्ट्र की सुरक्षा और संस्कृति की रक्षा के लिए हम संघ के साथ हैं।
536वीं पुस्तक का विमोचन
‘ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप’ देश भर में पैदल विहार करने वाले जैन साधुओं की यात्रा को सुरक्षित और दुर्घटनामुक्त बनाने में सहायता करता है। पद्मभूषण परम पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरि महाराज जी ने अब तक 500 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं।
आज उनकी ‘आनंद यात्रा- अठारह कर्तव्य’ नामक 536वीं पुस्तक का विमोचन मोहन भागवत जी के करकमलों से संपन्न हुआ।
















