न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने भारत की विशेषता पर बात की। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए सभी को रक्षाबंधन की शुभकामनाएँ दी। उन्होंने बताया मैं भारत के नागपुर से यहाँ आया हूँ, ताकि आपके साथ आज की ये खुशी और भावना बाँट सकूँ। इस दौरान सरसंघचालक जी ने भारत की विशेषता पर बात की।
उन्होंने कहा कि जब हम अमेरिका की बात करते हैं तो अक्सर बहुलवाद यानी प्लुरलिज्म की चर्चा होती है। और जब भारत की बात आती है तो एकता में विविधता का जिक्र होता है। भारत के लिए ये एकता और विविधता दोनों उसकी प्रकृति में बसी हुई हैं। राष्ट्र सिर्फ जमीन के टुकड़े नहीं होते। इस ब्रह्मांड की रचना में हर राष्ट्र का कोई न कोई फर्ज होता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हर राष्ट्र को कोई संदेश देना होता है, कोई मिशन पूरा करना होता है और कोई नियति पूरी करनी होती है। भारत की नियति क्या है?
भारत इसलिए है कि वो इस एकता को समझे और समय-समय पर दुनिया को भी समझाए कि विविधता के बावजूद हम एक हैं। विविधता एकता को और सुंदर बनाती है। इसलिए विविधता का जश्न मनाना चाहिए, उसका सम्मान करना चाहिए और उसे स्वीकार करना चाहिए। साथ ही एकता का भाव भी हमेशा याद रखना चाहिए। ये भाव बहुत असली है।
हम अलग दिखते हैं, फिर भी एक हैं
कई बार लगता है कि हम कैसे एक हो सकते हैं। हम दिखने में अलग हैं—अलग राष्ट्रीयताएँ, भाषाएँ, धर्म, रहन-सहन। वैज्ञानिक रूप से भी हम अलग हैं। हर किसी को अपना खाना अलग खाना पड़ता है। अगर मैं भूखा नहीं हूँ तो इसका मतलब ये नहीं कि आप भी भूखे नहीं हैं। मेरा पेट भर जाने से आपका पेट नहीं भरता। हमें अलग कमाना पड़ता है, अलग खर्च करना पड़ता है। ये दुनिया का भौतिक सच है। लेकिन भीतर एक जन्मजात एकता भी है। इसलिए हम एक-दूसरे के लिए महसूस करते हैं।
उन्होंने कहा कि एक छोटा सा प्रयोग करके देखिए। जब आप खाना खा रहे हों, तो कोई भूखा आदमी आपके सामने खड़ा हो जाए और भूखी आँखों से आपकी थाली की तरफ देखता रहे। न तो उसकी नजर हटाएँ, न उसे भगाएँ, और बिना उसे एक कण दिए अपना खाना खा लें। आप ऐसा नहीं कर पाएँगे। कोशिश कर लें, फिर भी नहीं हो पाएगा। क्योंकि हम इंसान हैं। ये भाव हममें है। जानवरों में भी होता है, लेकिन वो उस पर अमल नहीं करते क्योंकि वो स्वतंत्र नहीं हैं। वो सिर्फ जन्म और मौत के बीच जीते हैं, भूख लगती है तो खाते हैं। प्रकृति उन्हें मजबूर करती है।
एक गाय घास चर रही हो तो पेट भरने तक खाएगी। पेट भरने के बाद दूसरी गाय को घास खाने से रोकेगी अगर खुद अभी भूखी है। लेकिन, वो घास बाँधकर कल के लिए घर नहीं ले जाएगी। जानवर ऐसा नहीं करते। सिर्फ इंसान सोच सकता है कि आज पेट भर गया, कल फिर भूख लगेगी, इसलिए बचाकर रख लूँ। सोचने की ये क्षमता इंसान का वरदान है। लेकिन सोच किस दिशा में है, ये महत्वपूर्ण है। सही सोच से हम ईश्वर के करीब जाते हैं, गलत सोच से जानवरों की तरफ। सही दिशा में जीवन जीने वाला व्यक्ति ईश्वर के राज्य का जिम्मेदार नागरिक बनता है।
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इंसान और जानवर में फर्क
सरसंघचालक जी ने कहा कि खाना, संतान पैदा करना, आराम करना और जिंदा रहने की चिंता—ये सब इंसान और जानवर दोनों में समान हैं। लेकिन इंसान में एक खासियत है। वो सोच सकता है और दूसरों के प्रति संवेदनशील होता है। अगर सही सोचे तो पूरी दुनिया को संभाल सकता है। इंसान को सोचने की खास शक्ति मिली है और सही-गलत समझने की समझ भी। इसलिए वो विविधता के बावजूद एकता महसूस कर सकता है। लेकिन कोशिश तो करनी पड़ती है।
जब बाकी लोग थककर रुक गए, तब भी हमारे पुरखे खोजते रहे। हर कोई खुशी की तलाश में रहता है। उस समय मनुष्य संख्या कम थी, सब एक-दूसरे को जानते थे। दो तरह के स्वभाव वाले लोग थे। एक कहते थे—जियो और जीने दो। दूसरे कहते थे—सिर्फ वही जिएँ जो हमारी बात मानें। जो सिर्फ आज्ञा मानने वालों की रक्षा करते थे, उन्हें राक्षस कहा जाता था। जो कहते थे कि आज्ञा मानी या नहीं, राय क्या है, फायदा कितना है—ये छोटी बातें हैं, मुख्य बात ये है कि हम सब इंसान हैं, दुनिया को संभालना है, भाईचारे से रहना है—वो देव थे।
स्थायी खुशी की खोज
दोनों समाजों ने बहुत कुछ हासिल किया, सब कुछ उपलब्ध था, लेकिन संतोष नहीं मिला। भौतिक खुशी अस्थायी होती है। जैसे न्यूयॉर्क में डोनट्स। एक बार में कितने खा सकते हो? ज्यादा से ज्यादा पचास। उसके बाद देखना भी नहीं चाहते। कल फिर वही डोनट्स चाहिए। भौतिक सुख कभी स्थायी नहीं होता। दोनों राजा—इंद्र (देवों के) और विरोचन (असुरों के)—अपने गुरुओं के पास गए। दोनों को बताया गया कि जब तुम अपने भीतर के आत्मन यानी आत्मा को पहचान लोगे, तभी स्थायी संतोष मिलेगा। ये विद्या ब्रह्मा जी के पास है।
दोनों ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने पहले कहा कि आँखों से देखो आत्मा को। उन्होंने एक-दूसरे की आँखों में देखा तो अपनी परछाई दिखी। विरोचन सोचकर चला गया कि मैं और मेरा ही सब कुछ है। लेकिन इंद्र वापस आए। कई बार सवाल पूछे, आखिरकार असली आत्मन को समझा। चाहे ये कथा सच हो या न हो, लेकिन हमारे पुरखों ने इस आंतरिक तत्व को खोजा जिसे आत्मन कहते हैं। अलग-अलग नाम हैं, अलग शरीर, कपड़े, पूजा के बावजूद ये सच्चाई सबको जोड़ती है। जैसे माला के मोती एक धागे में पिरोए होते हैं, वैसे ही आत्मन सबमें है। यही स्थायी खुशी का स्रोत है। शरीर मर जाएगा, अंतर मिट जाएँगे, लेकिन ये तत्व हमेशा रहता है।
जीवन का उद्देश्य और धर्म
इस ज्ञान से उन्होंने समझा कि पूरी मानवता हमारी अपनी है। इसलिए ये ज्ञान दुनिया को देना होगा। हिमालय से समुद्र तक के लोगों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित किया गया। भारत की अवधारणा है—जीवन मिला है आत्मन की प्राप्ति के लिए, मुक्ति के लिए। लेकिन सिर्फ अपने अंदर नहीं, हर चीज और हर किसी में उस तत्व को देखो और दुनिया के कल्याण के लिए काम करो। मानव जीवन निरर्थक नहीं है। ये ज्ञान बाँटना और जीना ही भारत का मिशन है, संदेश है और नियति है। योगी अरविंद ने कहा था कि भारत का उदय अब निकट है क्योंकि इस जोड़ने वाले सिद्धांत की जरूरत है। ये सिद्धांत धर्म है। धर्म पूजा-पाठ या मजहब नहीं है। ये वो नियम है जिससे ब्रह्मांड चलता है, जिससे जीवन की दुविधाएँ संभलती हैं, जिससे सब एक साथ आगे बढ़ते हैं—व्यक्ति, समाज और पर्यावरण।
रक्षाबंधन का संदेश और हमारा फर्ज
आज रक्षाबंधन पर राखी बाँधते हुए याद रखें—ये बंधन हमें सीमित नहीं करता। दूसरों की जिम्मेदारी लेने से हम मुक्त होते हैं। ये हमें दूसरों की देखभाल से जोड़ता है। हम सिर्फ अपने शरीर में नहीं, हर जगह जीते हैं। रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण है। वो गंगा किनारे बैठे थे। एक गाय घास कुचल रही थी तो उन्होंने कहा—मुझे कुचला जा रहा है। उनकी छाती पर निशान पड़ गए थे। ये एकता हासिल करना ही जीवन का मकसद है।
हम अमेरिका में रहते हैं, कमाते हैं, तो अमेरिका के प्रति सच्चे रहें। भारतीय प्रवासियों का कर्तव्य है अपनी कर्मभूमि के प्रति। जन्मभूमि भारत है, तो उसकी दी हुई मूल्यों को जियो। एकता का ये मूल्य—इंसानों से एक, प्रकृति से एक। जो कुछ करें, वो सबको संभाले। विकास पर्यावरण को नष्ट न करे, संरक्षण विकास को न रोके।















