मुस्लिम मुल्कों में हिजाब को लेकर इन दिनों हंगामा हैं, और प्रश्न हैं। आंदोलन हैं, आँसू हैं और विरोध भी हैं। मगर यह बहुत रोचक है कि कहीं इसे पहनने की आजादी पर हंगामा है तो कहीं हंगामा इसलिए है क्योंकि इसे जबरन पहनाया जा रहा है।
यह बहुत ही रोचक है, क्योंकि जहां ईरान में लड़कियां इन दिनों इस बात के लिए आंदोलन कर रही हैं, अपनी जान खतरे में डाल रही हैं और लगातार विरोध प्रदर्शन कर रही हैं कि उनपर जबरन हिजाब क्यों थोपा जा रहा है? तो वहीं दूसरी तरफ 96% मुस्लिम आबादी वाले देश अजरबैजान में इसलिए लड़कियां सड़कों पर उतरी हैं, स्कूल नहीं जा रही हैं क्योंकि वहाँ पर सरकार ने यह कानून बना दिया है कि हिजाब पहनकर स्कूल नहीं जा सकते हैं।
यह विरोधाभास बहुत चकित कर सकता है, परंतु स्थितियों को गहराई से देखेंगे तो यह अंतर नहीं दिखाई देगा। पहले इन दोनों देशों की स्थिति पर एक दृष्टि डालते हैं और उसके बाद यह मामला समझ आएगा।
ईरान और अजरबैजान दोनों ही हैं शिया मुल्क
ईरान और अजरबैजान दोनों ही देश इस्लामिक हैं और दोनों ही शिया बहुल देश हैं और पड़ोसी हैं। मगर यही एक समानता इन दोनों मुल्कों में हैं।
यदि हम इसके अतिरिक्त असमानता देखेंगे तो कई दिखेंगी, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जहां ईरान में कट्टर इस्लामी शासन है, तो वहीं अजरबैजान में धर्मनिरपेक्ष या कहें उसकी अपनी जड़ों की संस्कृति के अनुसार शासन है। और वहाँ पर अभी तक जो सिर ढकने की परंपरा थी, वह स्थानीय संस्कृति के अनुसार थी। जिसे पारंपरिक ‘केलाघायी’ (Kelaghayi) कहा जाता है और अभी भी वहाँ पर इसे पहना जाता है और जो नया स्कूल का ड्रेस कोड आया हुआ है, उसमें भी केलाघायी को पर्वों और विशेष समारोहों के दौरान पहनने की अनुमति है, परंतु हिजाब पर नहीं!
क्या है ड्रेस कोड में?
सबसे महत्वपूर्ण है कि आखिर अजरबैजान की सरकार ने स्कूलों की यूनिफ़ॉर्म को लेकर क्या ड्रेस कोड जारी किया है?
21 सितंबर 2026 को अजरबैजान के मंत्री मण्डल ने देश के शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षार्थियों की पोशाकों की आवश्यकताओं को संशोधित किया। इस रेसोल्यूशन के अंतर्गत स्कूल के ड्रेस कोड की एकरूपता या फिर धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के सिद्धांतों का विरोध करने वाले किसी भी अतिरिक्त वस्त्र को पहनने की अनुमति नहीं है।
इसके साथ ही स्कूल की परिषदों के पास यह भी अधिकार होगा कि वे देश के इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय और आध्यात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित आयोजनों के दौरान राष्ट्रीय पोशाकों और उसके तत्वों को पहनने की अनुमति दे सकती हैं।
यह महत्वपूर्ण है कि कहीं भी इस आदेश में हिजाब नहीं है, बस ड्रेस कोड का पालन है। तो फिर हिजाब प्रतिबंधित होने का एजेंडा कहाँ से आया? क्या वही राजनीतिक ताकते इस विरोध प्रदर्शन को हवा दे रही हैं, जो राजनीतिक इस्लाम फैलाना चाहती हैं?
क्या हिजाब राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक है?
यह प्रश्न लगातार ही हिजाब के विरोधी उठाते हैं कि क्या हिजाब राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक है? क्योंकि उसके चलते कई प्रकार के विरोध प्रदर्शन आदि होते रहते हैं। उसे मुसलमानों की मजहबी पहचान के रूप में देखा जाता है।
यह प्रश्न अजरबैजान को लेकर इसलिए उठता है कि क्योंकि बीते हाल ही के कुछ वर्षों में अजरबैजान में पारंपरिक कलाघायी को पहनने के स्थान पर मुस्लिम हिजाब को पहनने का चलन बढ़ा है और इस परिवर्तन को लेकर अजरबैजान का राजनीतिक नेतृत्व असहज है। क्योंकि उसे लग रहा है कि कहीं न कहीं ईरान आम लोगों में स्थानीय इस्लाम के स्थान पर राजनीतिक इस्लाम को बढ़ावा दे रहा है।
क्या ईरान कर रहा हस्तक्षेप?
कई रिपोर्ट्स यह संकेत कर रही हैं कि अजरबैजान का शिया बहुल इस्लामिक देश होते हुई भी जो धर्मनिरपेक्ष रूप था, उसे लगातार ईरान भड़का रहा है और अपने नेटवर्क के माध्यम से आम लोगों में मजहबी कट्टरता भर रहा है। यही कारण है कि कई आम लोग परंपरागत कलाघायी के स्थान पर हिजाब को पहनना पसंद कर रहे हैं।
और सबसे हैरान करने वाली बात यही है कि हिजाब के समर्थन में जो विरोध प्रदर्शन आरंभ हुए, वे ईरानी सीमा से लगते हुए स्थानों जैसे कि जलीलाबाद, मसल्ली, और लंकरान से हुए। सबसे बड़ी शुरुआती प्रदर्शन जलीलाबाद के स्कूल नंबर 9 के बाहर देखे गए थे।
लंकरान ईरान से मात्र 25-30 किलोमीटर की दूरी पर है और यहाँ पर अजरबैजान की अपेक्षा ईरान के विचारों का प्रभाव अधिक देखा जाता है। मसल्ली और जलीलाबाद ईरान की सीमा से लगभग 60-70 किलोमीटर की दूरी पर हैं। मगर इन तीनों ही स्थानों पर ईरान के कट्टरपंथी शिया विचारकों का प्रभाव सबसे ज्यादा है।
यही कारण था कि वर्षों से ईरान के प्रति सशंकित अजरबैजान ने इन विरोध प्रदर्शनों पर कड़ी कार्यवाही की और यह भी बताया कि कुछ विदेशी ताकतों के इशारे पर ही यह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
वहीं हिजाब को राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके माध्यम से अपने ही देश के खिलाफ लड़कियों को खड़ा कर दिया जाता है।
ईरान की 1979 की क्रांति में हिजाब की महत्वपूर्ण भूमिका
हालांकि यह अभियान केवल इस आधार पर आरंभ होता है कि लड़कियों को पहनने की आजादी होनी चाहिए। जैसे कि ईरान में वर्ष 1979 की जो क्रांति हुई थी, उसमें भी ईरान के शाह के कथित पश्चिम के प्रति झुकाव का विरोध करने के लिए महिला प्रदर्शनकारियों ने पहनने की आजादी के नाम पर हिजाब पहनकर प्रदर्शन किए थे, मगर क्रांति के बाद हिजाब पहनना उनके लिए पहनने की आजादी नही, बल्कि अनिवार्य बन गया और अभी तक ईरान की लड़कियां इस अनिवार्य हिजाब के प्रति एक जंग लड़ रही हैं।
हिजाब के आलोचकों का कहना है कि इसके बहाने अलगाववाद का एक विमर्श बनाया जाता है। लड़कियों की मजहबी सांस्कृतिक पहचान को उनकी परंपरागत सांस्कृतिक पहचान के सामने खड़ा कर दिया जाता है और देखते ही देखते वे अपनी जड़ों की संस्कृति के खिलाफ हो जाती हैं।
और इसी बीच उनके आंसुओं का प्रयोग किया जाता है। विमर्श गढ़ा जाता है कि महज एक कपड़े के टुकड़े के चलते लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है, जैसा कि इन दिनों अजरबैजान में हो रहा है कि लड़कियों के स्कूल के बाहर खड़े हुए रोते हुए वीडियो वायरल हो रहे हैं और फिर इन्हीं मजहबी जज़्बातों के चलते लोगों की सहानुभूति उसमें जुड़ जाती है।
अच्छी मुसलमान लड़की का विमर्श
और फिर देखते ही देखते अच्छी मुसलमान लड़की की परिभाषा इतनी व्यापक हो जाती है कि आम लड़कियां इसमें आसानी से प्रभावित हो जाती हैं और देखते ही देखते स्थानीय परंपरागत संस्कृति नेपथ्य में चली जाती है और हिजाब से जुड़ी तहजीब ही रह जाती है।
हिजाब के आलोचक इसे राजनीतिक इस्लाम का सबसे बड़ा हथियार कहते हैं, जो आम लोगों की भावनाओं का दोहन करके प्रयोग किया जाता है।
काफी समय से कदम
यही कारण है कि अजरबैजान में स्कूल यूनिफ़ॉर्म आदि को धर्मनिरपेक्ष रूप दिया जाता है और वहाँ पर हिजाब के प्रतिबंध की चर्चा आज की नहीं है। अजरबैजान ने वर्ष 2010 में भी स्कूल यूनिफ़ॉर्म के जो नियम बनाए थे, उनमें भी हिजाब नहीं था।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के जर्नल में 2013 में ही यह लिखा था कि स्कूलों की यूनिफ़ॉर्म के कोड में हिजाब नहीं है और इसके पीछे कारण यही था कि आधुनिक हिजाब अजरबैजानी संस्कृति के लिए बाहरी है। तो यह बहस आज की नहीं है और प्रतिबंध हिजाब पर नहीं है, बल्कि अजरबैजान में स्कूलों में एक ड्रेस कोड लागू किया है।
हिजाब के आलोचक जब यह तर्क देते हैं कि हिजाब को ही इस्लाम मान लिया जाता है और इसके आधार पर लड़कियों के मन में बैठाई जाती है कि वे अच्छी मुसलमान हिजाब के चलते ही होंगी तो यह तर्क बीबीसी की उस रिपोर्ट से सच प्रतीत होता है, जिसमें अजरबैजान में एक बच्ची के हवाले से यह कहा गया है कि “मैं क्यों अपना मजहब छोड़ दूँ?”
बीबीसी ने एक किशोरी के हवाले से यह लिखा है, जो अपने स्कूल के बाहर खड़ी है और रोते हुए कह रही है कि “मुझे अपना मजहब क्यों छोड़ देना चाहिए?”
जबकि जो ड्रेस कोड जारी हुए हैं, उनमें उन वस्त्रों पर प्रतिबंध है, जो शिक्षा में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के अनुसार नहीं हैं। इनमें हिजाब प्रतिबंध का कहीं नाम तक नहीं है।
हालांकि विरोध प्रदर्शन राजधानी बाकू में भी हो रहे हैं।
तुर्किए और ईरान के बीच फंसा अजरबैजान
अजरबैजान तुर्की और ईरान के बीच है। तुर्किए में भी राष्ट्रपति एर्दोगन के नेतृत्व में मजहबी कट्टरता बढ़ रही है और जहां पहले आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क की सरकार में सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों और स्कूलों में हिजाब पर पूरी तरह से प्रतिबंध था, क्योंकि उस समय की सरकार के अनुसार हिजाब दरअसल राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक था और वे धर्मनिरपेक्ष शासन रखना चाहते थे।
मगर 2000 के दशक के बाद जब मौजूदा राष्ट्रपति एर्दोगन की सत्ता आई तो उन्होनें इस प्रतिबंध को समाप्त किया और धीरे धीरे कट्टरता को अपनाना आरंभ कर दिया।
यही कारण है कि अजरबैजान के साथ हर समय खड़े होने वाले राष्ट्रपति एर्दोगन हिजाब के समर्थन में हो रहे आंदोलनों के पक्ष में खड़े हैं।
इन तमाम परिस्थितियों में हिजाब के आलोचकों का एक बार फिर यही कहना है कि कहीं न कहीं स्थानीय संस्कृति को मारकर हिजाब को ही संस्कृति मानने का यह अभियान है।

















