16 अक्टूबर 2026 को द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने आयुषी कर की एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें गृहमंत्री अमित शाह और निर्वाचन आयोग के उन बयानों को चुनौती दी गई है, जिनमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को अवैध घुसपैठियों की पहचान से जोड़ा गया था। रिपोर्ट का केंद्रीय दावा है कि आयोग ने घुसपैठियों की पहचान का उद्देश्य तो घोषित किया, लेकिन उन्हें चिह्नित करने की कोई व्यवस्था नहीं बनाई और उसके पास ऐसे व्यक्तियों का रिकॉर्ड भी नहीं है।
रिपोर्ट सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों, निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर की जांच और उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने संबंधी पूर्व रिपोर्टों पर आधारित है। इन दस्तावेजों के आधार पर उठाए गए कुछ प्रश्न निश्चित रूप से गंभीर हैं, लेकिन रिपोर्ट की प्रस्तुति में एक स्पष्ट समस्या दिखाई देती है। इसमें उपलब्ध तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल से अधिक उन तथ्यों को एक विशेष राजनीतिक निष्कर्ष के समर्थन में व्यवस्थित करने की प्रवृत्ति नजर आती है।
चयनात्मक तरीके से सरकार को टार्गेट किया
रिपोर्ट की शुरुआत ही गृहमंत्री अमित शाह द्वारा राहुल गांधी पर घुसपैठियों को बचाने के आरोप से होती है। उसके बाद निर्वाचन आयोग की प्रशासनिक प्रक्रिया को उसी राजनीतिक विवाद का विस्तार बनाकर प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार पाठक के सामने शुरुआत से ही एक राजनीतिक पक्ष और उसका कथित दोषी खड़ा कर दिया जाता है। जबकि, निर्वाचन आयोग ने 24 जून 2025 को विशेष गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता बताते हुए जनसंख्या के स्थानांतरण, शहरीकरण, मृत मतदाताओं के नाम सूची में बने रहने, दोहरी प्रविष्टियों, नए पात्र मतदाताओं तथा विदेशी नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने की आशंका जैसे अनेक कारण गिनाए थे। स्पष्ट है कि घुसपैठियों की पहचान पुनरीक्षण का एक उद्देश्य हो सकती है, लेकिन उसका एकमात्र उद्देश्य नहीं थी। इस महत्वपूर्ण अंतर को पर्याप्त स्थान न देकर रिपोर्ट राजनीतिक बयान को संपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया की कसौटी बना देती है।
पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता
अमित शाह के आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, लेकिन उनके बयानों के आधार पर निर्वाचन आयोग के संवैधानिक दायित्व का मूल्यांकन करना विश्लेषण की गंभीर कमजोरी है। यहां पत्रकारिता का राजनीतिक झुकाव केवल प्रयुक्त शब्दों में नहीं, बल्कि विषय के चयन, तथ्यों के क्रम और निष्कर्षों की दिशा में दिखाई देता है। रिपोर्ट यह प्रश्न तो प्रमुखता से उठाती है कि कितने घुसपैठिए मिले, लेकिन मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों और अपात्र नामों की पहचान से संबंधित व्यापक उद्देश्य को उसी गंभीरता से नहीं परखती। यदि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की पूरी सफलता या विफलता केवल विदेशी नागरिकों की पहचान से निर्धारित की जाएगी, तो चुनावी शुचिता का मूल प्रश्न पीछे छूट जाएगा। यही चयनात्मक दृष्टि रिपोर्ट की निष्पक्षता पर पहला गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण आधार बिहार के 100 से अधिक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों से सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तर हैं। दावा किया गया है कि इनमें विदेशी नागरिकों की पहचान का कोई स्पष्ट विवरण नहीं मिला। यह जानकारी महत्वपूर्ण है और आयोग को इसका संतोषजनक उत्तर देना चाहिए। लेकिन किसी कार्यालय में विदेशी नागरिकों का अलग रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होना और जांच में एक भी विदेशी नागरिक का नहीं मिलना दो बिल्कुल अलग स्थितियां हैं।
चुनाव आयोग को जबरन कटघरे में खड़ा करने की कोशिश
संभव है कि संबंधित अधिकारियों को ऐसा कोई मामला नहीं मिला हो। यह भी संभव है कि मामले सामने आए हों, लेकिन उन्हें दूसरी श्रेणियों में दर्ज किया गया हो अथवा किसी सक्षम प्राधिकारी को भेजा गया हो। रिपोर्ट इन संभावनाओं को स्वतंत्र रूप से खारिज किए बिना इस निष्कर्ष की ओर बढ़ती है कि आयोग ने घुसपैठियों की पहचान करने की व्यवस्था ही नहीं बनाई थी। क्या सभी अधिकारियों से समान प्रश्न पूछे गए थे। कितनों ने स्पष्ट रूप से शून्य मामले बताए। कितनों ने सूचना उपलब्ध नहीं होने की बात कही। कितने मामलों में आवेदन दूसरे कार्यालय को भेजा गया। इन आवश्यक जानकारियों का समग्र विश्लेषण कहां है। इसी प्रकार रिपोर्ट का दूसरा बड़ा दावा निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर में विदेशी नागरिकों को चिह्नित करने का विकल्प नहीं होने से संबंधित है। यदि ऐसा था तो यह गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक कमी है। लेकिन निर्वाचन आयोग के आधिकारिक प्रपत्र 7 में भारतीय नागरिक नहीं होना, मतदाता सूची से नाम हटाने अथवा नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति का स्पष्ट आधार है। इस वैधानिक प्रावधान का अर्थ है कि नागरिकता की पात्रता जांचने की व्यवस्था चुनावी प्रक्रिया में मौजूद है। तब जांच का वास्तविक विषय यह होना चाहिए कि सॉफ्टवेयर में संबंधित विकल्प क्यों नहीं था, क्या अलग प्रक्रिया उपलब्ध थी और क्या ऐसे मामलों को अन्य माध्यम से दर्ज किया जा सकता था। केवल सॉफ्टवेयर की किसी सुविधा के अभाव से यह स्थापित नहीं होता कि पूरी चुनावी व्यवस्था में नागरिकता की जांच का कोई प्रावधान नहीं था।
आयोग के निर्देशों को दरकिनार कर फैलाया गया झूठ
रिपोर्ट की दूसरी गंभीर कमी 13.39 करोड़ मतदाताओं के आंकड़े की प्रस्तुति में दिखाई देती है। निर्वाचन आयोग के अनुसार इस संख्या में लगभग 6.30 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित, 3.01 करोड़ अनुपस्थित अथवा अज्ञात, 2.80 करोड़ मृत और 1.02 करोड़ दोहरी प्रविष्टियों सहित अन्य श्रेणियों में चिह्नित नाम शामिल थे। आयोग ने स्पष्ट किया था कि प्रारंभिक चरण में चिह्नित सभी प्रविष्टियों को अंतिम रूप से हटाए गए मतदाताओं की संख्या नहीं माना जाना चाहिए। दावे, आपत्तियां और पुनः पंजीकरण की प्रक्रिया का भी अपना महत्व है। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या को सीधे हटाए गए मतदाताओं के रूप में प्रस्तुत करना विवाद को अधिक उत्तेजक बनाता है। इस आंकड़े से प्रभावित वास्तविक मतदाताओं की समस्याओं को कम नहीं आंका जा सकता, लेकिन प्रारंभिक प्रशासनिक आंकड़े और अंतिम परिणाम का अंतर मिटा देना भी उचित नहीं है।
यहां रिपोर्ट की भाषा और आंकड़ों की प्रस्तुति एक दूसरे को पुष्ट करती दिखाई देती हैं। बड़ी संख्या पाठक को विचलित करती है और उसी प्रभाव के बीच आयोग की कार्यप्रणाली के विरुद्ध व्यापक निष्कर्ष स्थापित कर दिया जाता है। गंभीर खोजी पत्रकारिता का दायित्व आंकड़ों को उनके वास्तविक संदर्भ में रखना है, न कि उनकी विशालता को राजनीतिक प्रभाव पैदा करने का माध्यम बनने देना।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आधा-अधूरा सामने रख फैलाया भ्रम
इस रिपोर्ट की सबसे उल्लेखनीय संपादकीय कमी सर्वोच्च न्यायालय के 27 मई 2026 के निर्णय के संदर्भ में दिखाई देती है। न्यायालय ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधानिकता स्वीकार की और संविधान के अनुच्छेद 324 तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग की शक्तियों की पुष्टि की। न्यायालय ने मतदाता सूची की शुद्धता को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की आवश्यक शर्त माना। उसने यह भी स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग मतदाता की पात्रता निर्धारित करने के लिए नागरिकता संबंधी सीमित जांच कर सकता है, हालांकि नागरिकता का अंतिम कानूनी निर्धारण सक्षम प्राधिकारी का विषय है। न्यायालय ने गैरनागरिक होने के आधार पर हटाए गए संबंधित मामलों को सक्षम प्राधिकारी के पास भेजने तथा वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार निर्णय करने के निर्देश भी दिए।
रिपोर्ट इस अंतिम निर्देश को प्रमुखता देती है, लेकिन न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण के उद्देश्य, औचित्य और वैधानिकता को स्वीकार किए जाने का व्यापक महत्व पाठक के सामने उसी विस्तार से नहीं रखती। यहां चयनात्मक प्रस्तुति का प्रभाव स्पष्ट है। न्यायालय का जो निर्देश आयोग से प्रश्न पूछने में सहायक है, उसे प्रमुखता मिलती है, जबकि वही निर्णय आयोग के पुनरीक्षण संबंधी अधिकार को भी मान्यता देता है। यह अधूरी न्यायिक व्याख्या है। हालांकि न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण की वैधानिकता स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि उसके क्रियान्वयन में हुई किसी त्रुटि को भी वैध मान लिया जाए।
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इस दृष्टि से रिपोर्टर्स कलेक्टिव की 9 अक्टूबर 2026 की उत्तर प्रदेश संबंधी जांच गंभीरता से देखने योग्य है। इसमें 85,854 मतदाताओं से संबंधित प्रपत्र 7 के सॉफ्टवेयर द्वारा स्वतः तैयार होने, अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर पहले से जुड़े होने और नाम हटाने के स्पष्ट कारण दर्ज नहीं होने का आरोप है। यदि यह स्थिति प्रमाणित होती है तो प्रशासनिक जवाबदेही और मतदाता अधिकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। प्रत्येक पात्र मतदाता को उचित सूचना, सुनवाई और अपील का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है कि संबंधित प्रपत्रों के अतिरिक्त कोई जांच अभिलेख था या नहीं, कितने लोगों के नाम वास्तव में हटे और कितने मामलों में अधिकारियों ने स्वतंत्र सत्यापन किया।
आरोप लगाते वक्त तथ्य साथ रखना चाहिए
इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटने और कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता प्रभावित होने का प्रश्न महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची में नाम न होने का अर्थ किसी व्यक्ति का विदेशी नागरिक होना नहीं है। इसलिए ऐसी स्थिति में किसी नागरिक को मिलने वाले वैधानिक लाभों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। इन दोनों मामलों में रिपोर्ट ने वास्तविक प्रशासनिक प्रश्न उठाए हैं। लेकिन यही तथ्य उसके संपूर्ण राजनीतिक निष्कर्ष की पुष्टि नहीं कर देते। गंभीर पत्रकारिता को जहां प्रशासनिक अन्याय दिखाई दे, वहां उसे प्रमाण सहित सामने लाना चाहिए। साथ ही जहां संविधान, कानून और न्यायालय किसी प्रक्रिया को वैधानिक आधार देते हैं, वहां उस तथ्य को दबाना या गौण करना भी स्वीकार्य नहीं है। किसी फैसले के अनुकूल हिस्से को आगे रखना और प्रतिकूल हिस्से को पीछे कर देना खोजी पत्रकारिता नहीं, सुविधानुसार की गई व्याख्या है।
द कलेक्टिव रिपोर्ट्स की संपादकीय पक्षपातपूर्ण
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की इस पूरी पड़ताल को देखने पर सबसे बड़ा प्रश्न निर्वाचन आयोग से भी पहले उस पत्रकारिता की संपादकीय नीयत और दृष्टि का उठता है, जो अपने को स्वतंत्र और निर्भीक बताती है, लेकिन उसके समाचारों में राजनीतिक पक्षधरता का प्रभाव लगातार दिखाई दे सकता है। यहां समस्या यह नहीं है कि किसी पत्रकार ने निर्वाचन आयोग या गृहमंत्री से कठोर प्रश्न क्यों पूछे। समस्या यह है कि प्रश्नों और प्रमाणों का चुनाव एक ही राजनीतिक दिशा में क्यों जाता दिखाई देता है। रिपोर्ट में आयोग के उत्तर को अपर्याप्त बताने के लिए कठोर भाषा इस्तेमाल की गई है।
लेकिन अपने निष्कर्षों की अपर्याप्तता को उसी कठोरता से क्यों नहीं परखा गया। आयोग द्वारा सूचना का अधिकार आवेदन बिहार भेजने को जानकारी देने से बचने की प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि यह स्थापित करना अभी बाकी है कि सूचना जानबूझकर रोकी गई अथवा संबंधित अभिलेखों के लिए राज्य कार्यालय को उत्तरदायी माना गया। इसी प्रकार सॉफ्टवेयर में विकल्प न मिलने से यह निष्कर्ष निकाल लेना कि आयोग ने कभी विदेशी नागरिकों की पहचान करने का इरादा ही नहीं किया था, उपलब्ध तकनीकी साक्ष्य से आगे बढ़कर संस्था की मंशा निर्धारित करना है।
विपक्ष की चिंता, लेकिन प्रशासन पर बिना तथ्यों के उठा दिए सवाल
किसी संवैधानिक संस्था की मंशा पर ऐसा आरोप लगाने के लिए आंतरिक पत्राचार, नीति निर्माण के दस्तावेज और निर्णय प्रक्रिया के ठोस प्रमाण चाहिए। इसके बिना जांच का निष्कर्ष एक राजनीतिक आरोप का रूप लेने लगता है। रिपोर्ट में विपक्ष की चिंताओं और निर्वाचन आयोग के विरुद्ध उठाए गए प्रश्नों को प्रमुखता मिलती है, लेकिन चुनावी सूची की शुद्धता की संवैधानिक आवश्यकता और अपात्र नामों के बने रहने से लोकतंत्र को होने वाले नुकसान की चर्चा तुलनात्मक रूप से कमजोर है। यह असंतुलन आकस्मिक है या सुनियोजित, इसका अंतिम निर्णय बिना अतिरिक्त प्रमाण के नहीं किया जा सकता, लेकिन प्रकाशित सामग्री का संपादकीय पूर्वाग्रह जांच के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। कोई समाचार संस्था स्वयं को खोजी पत्रकारिता का प्रतिनिधि बताती है तो उसे अपनी राजनीतिक पसंद और नापसंद से ऊपर उठकर प्रमाणों की समान कसौटी स्वीकार करनी होगी। यहां रिपोर्ट की मेहनत को नकारने की आवश्यकता नहीं है।
सूचना अधिकार से उत्तर प्राप्त करना, सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली देखना और मतदाताओं के संभावित अधिकार हनन की जांच करना उपयोगी कार्य है। लेकिन अच्छे दस्तावेज जुटा लेने से उनके आधार पर निकाला गया प्रत्येक निष्कर्ष सही नहीं हो जाता। इस रिपोर्ट में वास्तविक खोज और राजनीतिक व्याख्या इस तरह मिल गई हैं कि कई स्थानों पर पाठक को तथ्य नहीं, तैयार निष्कर्ष परोसा जाता है। इससे एक अधिक गंभीर प्रश्न पैदा होता है। क्या पत्रकारिता का उद्देश्य निर्वाचन प्रक्रिया की वास्तविक कमियां सामने लाना है या निर्वाचन आयोग के विरुद्ध पहले से चल रहे राजनीतिक अभियान को विश्वसनीयता प्रदान करना।
रिपोर्ट की संरचना और निष्कर्ष दूसरे विकल्प की आशंका को बल देते हैं। निर्वाचन आयोग को विदेशी नागरिकता से जुड़े संदिग्ध मामलों, हटाए गए नामों, प्राप्त आपत्तियों और पुनः जोड़े गए मतदाताओं का पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। किंतु आयोग की जवाबदेही की मांग करने वाले मीडिया को भी अपनी बौद्धिक जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती। मतदाता सूची में अपात्र व्यक्ति का नाम बना रहना जितनी गंभीर समस्या है, उतनी ही गंभीर समस्या किसी पात्र नागरिक का नाम गलत ढंग से हटना भी है। इन दोनों में से केवल एक पक्ष को लोकतंत्र का संकट बताना और दूसरे को लगभग अनदेखा कर देना निष्पक्ष पत्रकारिता का उदाहरण नहीं हो सकता।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं, लेकिन उन प्रश्नों को जिस राजनीतिक दिशा में मोड़ा है, वह उसके संपादकीय पूर्वाग्रह की ओर संकेत करता है। खोजी पत्रकारिता का दावा स्वयं में निष्पक्षता का प्रमाणपत्र नहीं है। यदि समाचार कक्ष पहले राजनीतिक निष्कर्ष चुन ले और बाद में उसके अनुकूल दस्तावेजों को सजाए, तो तथ्य सही होने के बावजूद समग्र समाचार भ्रामक बन सकता है। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह निर्वाचन आयोग की कमियां खोजते हुए अपनी ही चयनात्मक दृष्टि की जांच करना भूल जाती है।

















