भारत ने 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की। इसमें दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और ऊर्जा उत्पादक देशों के नेता शामिल हुए, जो दुनिया की लगभग आधी आबादी और परचेज़िंग-पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर वैश्विक उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा हैं। हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज में ‘ग्लोबल साउथ’ के बढ़ते प्रभाव और पश्चिमी संस्थानों पर निर्भरता कम करने की कोशिशों को दिखाने के बजाय, कुछ आंतरराष्ट्रीय माध्यमो ने ब्रिक्स के विज्ञापनों के नीचे से गुज़रते साइकिल सवारों, मोपेड सवारों और मज़दूरों की तस्वीरों पर ध्यान केंद्रित किया। इससे भारत की पुरानी छवि—जैसे सपेरों और ग्रामीण जीवन वाला देश—फिर से उभरकर सामने आई।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज में भारत की तस्वीर
इस कवरेज के विश्लेषण से कुछ बातें बार-बार सामने आती हैं: धूल भरी सड़कें, हाथ से खींची जाने वाली गाड़ियाँ, ऑटो-रिक्शा और भीड़-भाड़ वाली सड़कें। ये तस्वीरें भारत की महत्वाकांक्षाओं और हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर दिखाती हैं और पुरानी रूढ़िवादी सोच को और मज़बूत करती हैं। एक विकासशील देश के तौर पर भारत की बड़ी उपलब्धियों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय मीडिया अक्सर इन सफलताओं को एक सीमित और रूढ़िवादी नज़रिए से पेश करता है।
इतिहास पर नज़र डालें तो यह सोच “हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ” (धीमी आर्थिक विकास दर) के झूठे विमर्श से बदलकर अब भारत को एक विशाल और उभरती हुई ताकत के रूप में समझने की ओर बढ़ी है। भले ही देश की तरक्की को पहचाना जा रहा है, लेकिन तस्वीरों में अब भी विरोधाभासों पर ही ज़ोर दिया जाता है: जैसे गायों के साथ सैटेलाइट, शॉपिंग मॉल के बगल में झुग्गी-बस्तियाँ, और पारंपरिक वाहनों के साथ आधुनिक वाहन।
भारत की आधुनिक उपलब्धियों की तस्वीर
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि ऑटो-रिक्शा, साइकिल और सादा जीवन जीने वाले लोग बेशक भारत की हकीकत का हिस्सा हैं, लेकिन वे पूरे देश की पहचान नहीं हैं। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहाँ अत्यधिक गरीबी में भारी कमी आई है, मज़बूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर है और ISRO के अंतरिक्ष मिशनों ने कम लागत में बड़ी सफलताएँ हासिल की हैं। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रभावशाली है और एक उल्लेखनीय उपलब्धी है, जबकि ISRO के किफायती और सफल मिशन कोई इत्तेफ़ाक नहीं हैं।
1.4 अरब लोगों के लिए बनाए गए भारत के UPI डिजिटल पेमेंट सिस्टम की कहानी तो बहुत ही दिलचस्प है। रूस के बाद दूसरे स्थान पर रहने वाली भारत की ‘यूरेनियम क्रांति’ एक बड़ी उपलब्धि है, और 1000 किलोमीटर का क्वांटम कम्युनिकेशन नेटवर्क तेज़ी से बनाना एक ऐसी कामयाबी है जिसे हासिल करने में कई विकसित देशों को भी संघर्ष करना पड़ रहा है। जिस तेज़ी से भारत में स्टार्टअप और यूनिकॉर्न उभर रहे हैं, उसके बहुत अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। एक प्राइवेट सैटेलाइट का पहला लॉन्च एक बड़ी सफलता है, और AI के क्षेत्र में भी तेज़ी से प्रगति हो रही है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान यह साबित हुआ कि भारत का रक्षा उत्पादन और एकीकरण अब दुनिया में सबसे अच्छे स्तर पर है। कृषि उत्पादन हर साल बढ़ रहा है और सभी क्षेत्रों में कौशल विकास में भी बढ़ोतरी हो रही है। UPI डिजिटल पेमेंट सिस्टम और अलग-अलग क्षेत्रों में हुई तरक्की भारत के तेज़ी से हो रहे विकास को दिखाती है, जिससे पता चलता है कि देश कई क्षेत्रों में शानदार प्रगति कर रहा है।
भारत का दिलचस्प आर्थिक इतिहास
ऐतिहासिक रूप से, ईसा पूर्व पहली सदी के अंत से लेकर ब्रिटिश शासन तक, भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। मौर्य साम्राज्य के तहत एकजुट भारत ने व्यापार और कृषि में समृद्धि को बढ़ावा दिया। 1 से 1000 ईस्वी के दौरान, वैश्विक GDP में भारत का योगदान लगभग 30% था। हालाँकि, ब्रिटिश शासन के कारण औद्योगिक गिरावट और आर्थिक पतन हुआ; 1750 में वैश्विक औद्योगिक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 25% थी, जो 1900 तक घटकर सिर्फ़ 2% रह गई।
इस गिरावट को समझने के लिए अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन का काम महत्वपूर्ण है; उनके विश्लेषण ने भारत के पुराने आर्थिक दबदबे को उजागर किया, जिसने पश्चिमी लोगों को चौंका दिया। मैडिसन के शोध का अनुमान है कि कभी भारत की GDP वैश्विक कुल का लगभग 30% थी। यह एक चौंकाने वाला आँकड़ा है, खासकर जब हम उन आक्रमणों और संघर्षों के ऐतिहासिक संदर्भ पर विचार करते हैं जिन्होंने भारत की आर्थिक कहानी को धुंधला कर दिया था।
‘हिंदू अर्थशास्त्र’ और तीसरे रास्ते की अवधारणा
यह समझ ‘हिंदू अर्थशास्त्र’ नामक अवधारणा से जुड़ी हो सकती है, जो डॉ. एमजी बोकारे और दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे विचारकों द्वारा प्रस्तावित ‘तीसरा रास्ता’ (Third Way) है। यह पारंपरिक पूंजीवाद और मार्क्सवाद दोनों को खारिज करता है और इसके बजाय लोकतंत्र को हिंदू आर्थिक सिद्धांतों के साथ जोड़ने का लक्ष्य रखता है। अलग-अलग विचारधाराओं के बावजूद, दोनों विचारकों ने हिंदू अर्थशास्त्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच तालमेल को पहचाना।
आत्मनिर्भर भारत और आर्थिक विकास
‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत घरेलू सुधारों और वैश्विक स्थिति को मजबूत करने से, हिंदू विचारधारा वाली सरकार के नेतृत्व में 2025 तक भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई। वास्तविक GDP में 6.5% की वृद्धि और नॉमिनल GDP के ₹106.57 लाख करोड़ (2014-15) से बढ़कर ₹331.03 लाख करोड़ (2024-25) होने के साथ, भारत दुनिया में सबसे तेज़ आर्थिक विकास का अनुभव कर रहा है।
वर्तमान में, जर्मनी की नॉमिनल GDP 4.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है और यह मध्यम गति से बढ़ रही है। नतीजतन, भारत 2026-2027 तक जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की कगार पर हो सकता है। ये अनुमान इस धारणा पर आधारित हैं कि कोई अप्रत्याशित बाधा गणनाओं को प्रभावित नहीं करेगी।
विकास के स्थापित मॉडलों पर बहस
हाल की घटनाओं ने कई पश्चिमी अर्थशास्त्रियों को विकास के स्थापित मॉडलों की आलोचना करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पूंजीवाद और मार्क्सवाद की विफलताएँ स्पष्ट हो रही हैं। जब विकसित देशों में ये चुनौतियाँ फिर से उभर रही हैं, तब भारत घरेलू सुधारों और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल की बदौलत लगातार तरक्की कर रहा है।
G7 शिखर सम्मेलन की तस्वीरों के साथ बेघर लोगों या अन्न बैंक की लाइनों की तस्वीरें दिखाने से सामाजिक मुद्दों के बारे में एक खास संदेश जाता है, लेकिन भारत के मामले में ऐसी तस्वीरों का इस्तेमाल अक्सर वैश्विक मंच पर उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए किया जाता है। अपनी चुनौतियों के बावजूद, विज्ञान, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ अहम हैं। स्थापित पश्चिमी देशों में भी असमानताएँ मौजूद हैं, लेकिन उनके मुद्दों को अक्सर जायज़ अधिकार के संदर्भ में देखा जाता है, जबकि भारत की जटिलताओं का इस्तेमाल अक्सर उसके उभार को कमजोर करने के लिए किया जाता है। इसलिए, भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं पर चर्चा के दौरान गरीबी पर ध्यान केंद्रित करने से प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठते हैं, खासकर तब जब देश ज़्यादा प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा हो।
भारतीय मूल के लोगों का वैश्विक प्रभाव
अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संगठन ‘इंडियास्पोरा’ की हालिया ‘इम्पैक्ट रिपोर्ट’ बताती है कि भारतीय मूल के अमेरिकी—जिनमें मुख्य रूप से हिंदू शामिल हैं—तेज़ी से उच्च-स्तरीय सार्वजनिक सेवा पदों पर नियुक्त हो रहे हैं। अमेरिकी आबादी में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ़ 1.5% होने के बावजूद, इन पदों पर उनकी भागीदारी 4.4% से ज़्यादा है। हाल के वर्षों में इस समुदाय का प्रभाव काफी बढ़ा है; इन्होंने आर्थिक विकास में योगदान दिया है, विभिन्न व्यवसायों में नेतृत्व की भूमिकाएँ निभाई हैं और संघीय खजाने के लिए सालाना लगभग 300 अरब डॉलर का टैक्स राजस्व जुटाया है।
अभी, भारतीय मूल के हिंदू अधिकारी 16 फॉर्च्यून 500 कंपनियों को लीड कर रहे हैं। इन कंपनियों में दुनिया भर में 25 लाख लोग काम करते हैं और इनसे लगभग 978 अरब डॉलर का रेवेन्यू आता है। ‘इंडियास्पोरा इम्पैक्ट रिपोर्ट’ में यह भी बताया गया है कि अमेरिका की 648 यूनिकॉर्न कंपनियों में से 72 को भारतीय मूल के हिंदू एंटरप्रेन्योर लीड कर रहे हैं। ये देश की कुल यूनिकॉर्न कंपनियों का 11% से ज़्यादा हिस्सा हैं और 55,000 से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देते हैं। रिपलिंग (Rippling) और लेसवर्क (Lacework) जैसे जाने-माने स्टार्टअप्स, तंत्रज्ञान की समझ रखने वाले भारतीय समुदाय की उद्योजकता में सफलता को दिखाते हैं।
विदेशों में भारतीय प्रतिभा और तकनीकी नेतृत्व
भारत, अपनी बड़ी हिंदू आबादी के साथ, प्रतिभा का शुद्ध निर्यातक बन गया है, जबकि अमेरिका ऐतिहासिक रूप से अवसरों की भूमि रहा है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि अमेरिकी महाविद्यालयों में पढ़ने वाले आंतरराष्ट्रीय विद्यार्थीओ में से 25% भारतीय हैं। भारत के नामी संस्थानों से आए लगभग 2,70,000 विद्यार्थी अपने विचार और शैक्षणिक जानकारी को आगे ला रहे हैं।
विदेशों में बसे भारतीयों के नवाचार कौशल्य और तंत्रज्ञान में महारत का उनके मेजबान देशों को बहुत फ़ायदा हुआ है। खासकर सिलिकॉन वैली के IT सेक्टर में, जहाँ सत्य नडेला और सुंदर पिचाई जैसी हस्तियाँ गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों को लीड कर रही हैं। भारतीय उद्योगपतियों ने अमेरिका और यूरोप में भी व्यापार के माहौल को आकार दिया है और एक मज़बूत राष्ट्रीय पहचान बनाने में योगदान दिया है। लक्ष्मी मित्तल और हिंदुजा ब्रदर्स जैसे जाने-माने भारतीय उद्योगपतियों ने दुनिया भर में बड़े निवेश किए हैं और रोज़गार पैदा किए हैं। साथ ही, टाटा ने ब्रिटिश ऑटोमोटिव ब्रांड जगुआर और लैंड रोवर को खरीदा है।
भारत के विकास मॉडल पर वैश्विक बहस
आखिर में, भारत द्वारा पेश किए गए आर्थिक और विकास के ढांचे भरोसेमंद साबित हुए हैं। इन मॉडल्स को खारिज करने या इनका मज़ाक उड़ाने के बजाय, दुनिया को भलाई के लिए ऐसे तरीकों और शासन की बहुत ज़रूरत है, जो सतत विकास को अपनाएं और एक स्वस्थ माहौल को बढ़ावा दें।













